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स्वास्थ्य सेवा को सुलभ बनाने की चुनौती

भारत में प्रति दस हजार आबादी पर सिर्फ नौ बेड और सात डॉक्टर ही उपलब्ध हैं।

स्वास्थ्य सेवा को सुलभ बनाने की चुनौती
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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा मंगलवार को जारी नेशनल हेल्थ प्रोफाइल-2015 से देश में स्वास्थ्य सेवा की एक बार फिर बदहाल तस्वीर सामने आई है। आंकड़ों से स्पष्ट हो रहा है कि आबादी के हिसाब से सुविधाएं नदारद हैं। इसमें कहा गया है कि देश में करीब 61 हजार लोगों पर सिर्फ एक सरकारी अस्पताल है। वहीं 1833 लोगों पर सिर्फ एक बिस्तर उपलब्ध है। राज्यों में देखें तो पता चलता है कि अविभाजित आंध्र प्रदेश में प्रत्येक सरकारी अस्पताल पर करीब तीन लाख लोग निर्भर हैं। जबकि बिहार में करीब नौ हजार लोगों पर सिर्फ एक बेड है। डॉक्टरों की उपलब्धता भी संतोषजनक नहीं है। प्रत्येक सरकारी एलोपैथिक डॉक्टर पर ग्यारह हजार लोग निर्भर हैं। देश में करीब 16.75 लाख डॉक्टर हैं। वहीं हर साल करीब 47 हजार डॉक्टर ही विभिन्न मेडिकल कॉलेजों से निकलते हैं। देखा जाए तो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय मानकों से हम कहीं पीछे हैं। उसके अनुसार प्रति दस हजार आबादी पर पचास बेड और 25 डॉक्टर होने चाहिए, तभी कोईदेश अपने नागरिकों की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा कर सकता है। जबकि भारत में प्रति दस हजार आबादी पर सिर्फ नौ बेड और सात डॉक्टर ही उपलब्ध हैं।

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जाहिर है, आज देश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की सबसे ज्यादा जरूरत है। प्रति व्यक्ति डॉक्टरों की उपलब्धता, अस्पताल में बिस्तरों की उपलब्धता, धन की कमी और व्यवस्था में व्याप्त खामियों के कारण स्वास्थ्य के मोर्चे पर हमारा प्रदर्शन बेहतर नहीं है। केवल विकसित देशों की तुलना में ही नहीं, विकासशील देशों की तुलना में भी हमारे देश में स्वास्थ्य संबंधित मूलभूत संरचना और संसाधनों की कमी है। विशेषज्ञों ने माना है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर सार्वजनिक खर्च कम से कम जीडीपी का तीन फीसदी जरूर होना चाहिए। फिलवक्त भारत में सार्वजनिक तौर पर जीडीपी का करीब एक फीसदी ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाता है। इसमें से 63 फीसदी हिस्सा मजदूरी और वेतन देने में ही चला जाता है। इसके बाद कम ही पैसा दवा, उपकरण और मूलभूत संरचना के लिए बच पाता है।

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जबकि देश की आधी आबादी गरीबी में जीवन-यापन कर रही है। उसकी निजी अस्पतालों तक पहुंच नहीं है। जाहिर है, भारत का एक बहुत बड़ा तबका ऐसा है जिसकी जिंदगी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर करती है। आज पुराने रोगों के साथ नई-नई जानलेवा बीमारियां चुनौती पेश कर रही हैं। वहीं अन्य देशों की अपेक्षा महिलाओं और बच्चों की मृत्यु दर भी काफी अधिक है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना होगा कि हर किसी को सस्ता, सुलभ और आसानी से इलाज मिल सके। यह विडंबना है कि आज देश में इलाज इस कदर महंगा हो गया है कि एक बड़ी आबादी स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च के बोझ के कारण गरीबी रेखा से नीचे पहुंच जाती है। स्वास्थ्य के मोर्चे पर स्थिति चिंताजनक है। इलाज में कमी से वे असमय कालग्रस्त हो रहे हैं। कहा गया है कि स्वास्थ्य ही धन है। यदि देश के नागरिक स्वस्थ होंगे तभी वे देश के विकास में भागीदार बन सकेंगे। ऐसे में सरकार को स्वास्थ्य सेवा को बेहतर बनाने के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए।

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