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अगली पीढ़ी के हाथों में भाजपा की कमान

विशेषज्ञ मान रहे हैं कि पार्टी में हुए इस पीढ़ीगत बदलाव के बाद कुछ बुनियादी फेरबदल भी देखने को मिल सकते हैं।

अगली पीढ़ी के हाथों में भाजपा की कमान
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नई दिल्‍ली. शनिवार को केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय परिषद ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के रूप में अमित शाह के नाम पर मुहर लगा दी। इसके साथ ही पार्टी की कमान अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और राजनाथ सिंह के बाद अब अगली पीढ़ी के नेता के हाथों में आ गई है। पार्टी में इस परिवर्तन की झलक भी साफ दिखाई पड़ रही है। अपने पहले संबोधन में ही अमित शाह ने साफ कर दिया कि भाजपा का पूरे देश में विस्तार करना और हर स्तर पर संगठन को मजबूत कर देश को पूरी तरह से कांग्रेस मुक्त करना उनका लक्ष्य होगा। वहीं उन्होंने सुझाव भी रखा कि भाजपा की नीतियों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए पार्टीको पंचायत से लेकर लोकसभा स्तर का चुनाव लड़ना चाहिए।

आम चुनावों में देखा गया कि भाजपा को दक्षिण और उत्तर-पूर्व के राज्यों में वोट तो मिले पर उतने नहीं थे कि वे सीटों में तब्दील हो सकें। इसकी वजह वहां संगठन का अभाव था। अभी भी कईऐसे हिस्से हैं जहां तक पार्टी नहीं पहुंच पायी है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि पार्टी में हुए इस पीढ़ीगत बदलाव के बाद कुछ बुनियादी फेरबदल भी देखने को मिल सकते हैं। उम्मीद की जा रही है कि एक तरफ सरकार और संगठन के बीच तालमेल बेहतर होने के साथ-साथ उनका दायरा बढ़ेगा तो वहीं दूसरी तरफ युवाओं को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। बेहतर कामकाज के बावजूद भी राजग 2004 में सत्ता से बाहर हो गई थी तो इसकी एक वजह सरकार और पार्टी कार्यकर्ताओं में आ गई दूरी थी। जिससे सरकार के प्रति लोगों में भरोसा कम हो गया था। लगता है,अब भाजपा उस गलती को दोहराना नहीं चाहती। अमित शाह ने यह जोर देकर कहा कि पार्टी के कार्यकर्ताओं को जनता और सरकार के बीच कड़ी बनना होगा। सरकार के कामकाज को जनता तक और जनता की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभानी होगी।

तभी भाजपा पार्टी विद डिफरेंस की अपनी पहचान कायम रख पाएगी। वहीं बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सरकार संगठन से तालमेल बैठा कर काम करेगी। इस प्रकार संगठन के मुखिया और सरकार के मुखिया के बीच यह आपसी विश्वास और भरोसा भाजपा को आने वाले दिनों में कई मुश्किलों से बचा सकता है। अमित शाह के अध्यक्ष बनने से एक यह भी संदेश गया है कि भाजपा में खुद को साबित करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए पार्टी के सभी दरवाजे खुले हैं। अब आने वाले कुछ सालों में दर्जन भर राज्यों में चुनाव होने हैं। इस कड़ी में अमित शाह की पहली अग्नि परीक्षा हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में होगी। हालांकि चुनाव पूर्व हुए एक ओपिनियन पोल में हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा बड़ी पार्टी के रूप में उभरती दिख रही है। महाराष्ट्र में कांग्रेसी नेताओं का भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है तो हरियाणा कांग्रेस में गुटबाजी चरम पर है।

ये दोनों परिस्थितियां इन राज्यों में अमित शाह का काम आसान कर सकती हैं। बहरहाल, उत्तर प्रदेश में रणनीतिक कौशल का परिचय देने वाले अमित शाह क्या इन राज्यों को इस साल कांग्रेस से मुक्ति दिला पाएंगी? और क्या समूचे देश में उनकी रणनीति पार्टी को सफलता दिला पाएगी? यह तो आने वाले समय में ही साफ होगा, परंतु यदि वे सत्ता और संगठन दोनों को एक गाड़ी के दो पहियों की तरह चला सके तो उनकी राह काफी आसान हो जाएगी।

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