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बिहार में सियासी संकट के लिए जिम्मेदार कौन, नीतीश कुमार बनना चाहते हैं मुख्यमंत्री

गत वर्ष लोकसभा चुनावों में हुई दुर्गति के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

बिहार में सियासी संकट के लिए जिम्मेदार कौन, नीतीश कुमार बनना चाहते हैं मुख्यमंत्री
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लंबे समय से विकास और सुशासन का इंतजार कर रहे बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल चिंता की बात है। वहां इस साल नवंबर में विधानसभा के चुनाव होने हैं, लेकिन उससे पहले ही मुख्यमंत्री पद को लेकर सत्ताधारी दल जनता दल यूनाइटेड (जदयू) में फूट पड़ गई है। नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, लेकिन मौजूदा मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी उनके लिए पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं। अब दोनों के समर्थक बिहार की सड़कों पर अपना दमखम दिखा रहे हैं। शनिवार को संकट तब और गहरा गया जब मांझी ने कैबिनेट बैठक बुलाकर विधानसभा भंग करने की सिफारिशकी।

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हालांकि इस प्रस्ताव को सिर्फ सात मंत्रियों का समर्थन मिल पाया और शेष 21 मंत्रियों ने इसका विरोध किया। वहीं दूसरी तरफ जदयू ने जीतन राम मांझी को बर्खास्त करते हुए नीतीश कुमार को विधायक दल का नया नेता चुन लिया। अब नीतीश कुमार 130 विधायकों के समर्थन के साथ फिर से सरकार बनाने का दावा पेश करने की बात कर रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ मांझी वैधानिक रूप से अभी भी मुख्यमंत्री हैं। मांझी और नीतीश के अपने-अपने रुख पर अड़े रहने से राज्य सरकार मझधार में है। संविधान विशेषज्ञों के अनुसार बिहार की राजनीति किस करवट बैठेगी यह अब पूरी तरह से राज्यपाल पर निर्भर है। क्योंकि भले ही बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को जदयू पार्टी ने बर्खास्त कर दिया है, लेकिन पार्टी मांझी को मुख्यमंत्री पद से नहीं हटा सकती है। उन्हें सिर्फ राज्यपाल ही हटा सकते हैं। इसके लिए विरोधी दलों को सदन में उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना होगा। बहुमत साबित नहीं करने की स्थिति में ही मांझी को मुख्यमंत्री पद से हटाया जा सकेगा। लिहाजा, जब तक मांझी सदन में बहुमत नहीं खो देते वह राज्य का मुख्यमंत्री बने रहेंगे। राज्यपाल के पास दूसरा विकल्प यह है कि वे नीतीश कुमार को सरकार बनाने का न्यौता दें। और तब उनको भी विश्वास मत प्राप्त करना होगा। तीसरे विकल्प के रूप में राज्यपाल राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश कर सकते हैं। हालांकि इनमें से वे कौन-सा विकल्प अपनाते हैं यह राज्यपाल के विवेक पर निर्भर करेगा। देखा जाए तो बिहार में राजनीति संकट के लिए बहुत हद तक पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं ही जिम्मेदार हैं।

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गत वर्ष लोकसभा चुनावों में हुई दुर्गति के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। तब उन्होंने कहा था कि जनता ने उनके कामकाज के विरोध में मत दिया है, लिहाजा नए जनादेश के बाद ही वे फिर मुख्यमंत्री बनेंगे। तब तक के लिए उन्होंने जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया था। तब उन्होंने खुद को त्याग की मूर्ति की तरह पेश कियाथा, लिहाजा यह सवाल पैदा होता है कि अब उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी से लगाव क्यों हो गया है? एक तरफ वे जनता परिवार के बिखरे हुए कुनबे को एकजुट करने का प्रयास कर रहे हैं, दूसरी तरफ उनके अपने ही घर में फूट पड़ गई है, जिसे वे रोकने में नाकाम हैं। वे आज उस लालू प्रसाद यादव के साथ हैं जिसके विरोध में उन्होंने राज्य में जनादेश प्राप्त किया है। बिहार की जनता इसे निश्चित रूप से देख रही है। वह उनकी कथनी और करनी में आए इस अंतर को ध्यान में रखकर ही चुनावों में मतदान करेगी!

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