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न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता की उम्मीद

न यदि आयोग पुनर्विचार के बाद सर्वसम्मति से फिर सिफारिश करता है तो राष्ट्रपति को उसके अनुरूप नियुक्ति करनी होगी।

न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता की उम्मीद
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नई दिल्‍ली.न्‍यायाधिशों की नियुक्ति से जुड़ा न्यायिक नियुक्ति विधेयक बुधवार को लोकसभा में सर्वसम्मति से पास हो गया। अब यह विधेयक राज्यसभा में पारित होने के लिए जाएगा। इस विधेयक में कहा गया है कि कॉलेजियम प्रणाली के बदले छह सदस्यों वाला आयोग सुप्रीम कोर्टऔर हाईकोर्ट में जजों को नियुक्ति करेगा। कॉलेजियम व्यवस्था को सुप्रीम कोर्टके ही एक जजमेंट के तहत 1993 में लागू किया गया था। इसके तहत मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन न्यायाधीशों का एक समूह जजों की बहाली करता है। इससे पहले इनकी नियुक्ति में केंद्र सरकार का दखल होता था। इन दोनों प्रणालियों में खामियां रही हैं। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जज ही जजों को नियुक्त करें इसका कोई औचित्य नहीं है।

कॉलेजियम प्रणाली के स्थान पर नई व्यवस्था का निर्माण इसलिए भी आवश्यक हो गया है। इस विधेयक के अनुसार न्यायिक नियुक्ति आयोग में मुख्य न्यायाधीश, दो वरिष्ठ न्यायाधीश, कानून मंत्री और कानून जगत के दो हस्ती शामिल होंगे। इसके अगुआ मुख्य न्यायाधीश होंगे। यह आयोग सुप्रीम कोर्ट और सभी हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले के लिए राष्ट्रपति से सिफारिश करेगा। यदि आयोग में शामिल दो व्यक्तियों को किसी नाम पर आपत्ति होगी तो नियुक्ति की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी। इसके साथ ही राष्ट्रपति जरूरत पड़ने पर आयोग को उसकी सिफारिश पर पुनर्विचार करने के लिए भी कह सकते हैं, लेकिन यदि आयोग पुनर्विचार के बाद सर्वसम्मति से फिर सिफारिश करता है तो राष्ट्रपति को उसके अनुरूप नियुक्ति करनी होगी। दो प्रमुख हस्तियों का चयन प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता मिलकर करेंगे।

हालांकि कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने स्पष्ट किया है कि सरकार न्यायपालिका का पूरी तरह सम्मान करती है और यह विधेयक लाकर न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा रहा है। यह नई व्यवस्था कॉलेजियम प्रणाली की खामियों और उसमें पारदर्शिता की कमी को दूर करने के तर्क के तहत लायी जा रही है। वैसे भी एक भ्रष्ट नौकरशाह को तो कानून के दायरे में लाकर हटाया जा सकता है। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भी उनके किये की सजा अदालतें या हार पांच साल में जनता दे देती है, परंतु एक भ्रष्ट जज की बहाली हो जाए तो उसे हटाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसीलिए भ्रष्ट जजों की नियुक्ति के खतरनाक प्रभावों को हम समझ सकते हैं।

नईव्यवस्था के बारे में सरकार ने दावा किया है कि नियुक्त किए जाने वाले जजों के बारे में हर तरह से संतुष्ट होने के बाद ही आयोग उनके नामों की सिफारिश करेगा। बहरहाल, अब यह सबकी जिम्मेदारी हैकि वे नई बनने वाली व्यवस्था को पेशेवर तथा पारदर्शी तरीके से काम करने देने में मददगार बनें, उसमें जोड़तोड़ न हो, जिससे उचित व्यक्ति जज बन सके। और हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के जजों की नियुक्ति में हर किसी को समान अवसर मिले। हालांकि आज संपूर्ण न्यायिक सुधार की जरूरत है। ताकि अदालतों को लंबित मुकदमों के बोझ से मुक्ति मिले और लोगों को त्वरित न्याय मिल सके।

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