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विशालतम लोकतंत्र के इतिहास का काला दिन

आज कुछ नेताओं की इन्हीं अर्मयादित आचरण के कारण आम आदमी के बीच उनकी साख कमजोर हुई है।

विशालतम लोकतंत्र के इतिहास का काला दिन
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नई दिल्ली. संसद को लोकतंत्र के मंदिर का दर्जा दिया जाता है, उसकी गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने की जिम्मेदारी देश के विभिन्न क्षेत्रों से चुनकर आए जनता के प्रतिनिधियों की होती है, परंतु जब वही उसे कलंकित, शर्मसार करने पर अमादा हो जाएंगे तो एक लोकतांत्रिक देश के लिए इससे दुखद बात और क्या हो सकती है। अलग राज्य के रूप में तेलंगाना का विरोध कर रहे आंध्र प्रदेश के सांसदों ने बृहस्पतिवार को संसद में कुछ ऐसे ही शर्मनाक कारनामे को अंजाम दिया जो कि दुनिया के सबसे बड़े गणतंत्र माने जाने वाले हमारे देश के संसदीय इतिहास में काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है।
जैसे ही लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने यह घोषणा की कि तेलंगाना संबंधी बिल पेश किया जाये, उसी समय आंध्र प्रदेश के सीमांध्र क्षेत्र के सांसद ने कुछ स्प्रे कर दिया, जिससे अध्यक्ष सहित कई सांसद खांसने लगे। मीरा कुमार सहित कई लोगों की तबीयत खराब हो गई। आपात स्थिति में एंबुलेंस बुलाये गये और बीमार सांसदों को अस्पताल ले जाया गया। संसद में किसी न किसी मुद्दे पर हंगामा व विरोध होते देखा जाता रहा है, परंतु विरोध का यह अर्मयादित तरीका पहली बार देखा गया है। आखिर सांसद इस तरह के व्यवहार से क्या संदेश देना चाहते हैं।
आज कुछ नेताओं की इन्हीं अर्मयादित आचरण के कारण आम आदमी के बीच उनकी साख कमजोर हुई है। उसे बहाल करने की कोशिश करनी चाहिए, न कि बचे खुचे इकबाल को भी खत्म करने वाले काम किए जाएं। संसद में ऐसा माहौल पैदा होने देने में कांग्रेस के रणनीतिकारों की अदूरदर्शिता भी बहुत हद तक जिम्मेदार है, क्योंकि विरोध करने वाले अधिकतर सासंद उसी के हैं। संसद के पिछले दोनों सत्र तेलंगाना विरोध की भेंट चढ़ गए थे और मौजूदा सत्र की दशा हमारे सामने है। जब पहले से अंदेशा था कि संसद में ऐसा दृश्य उत्पन्न हो सकता है तो इस गतिरोध को दूर करने के लिए कांग्रेस को संसद के बाहर ही कोई रास्ता निकालना चाहिए था पर वह विफल रही।
संसद में जो भी हुआ वह शर्मनाक है। इससे ज्यादा अनुशासनहीनता और कुछ नहीं हो सकती है। हम लोकतंत्र व संसद को किस राह पर ले आए हैं, उसका यह जीता जागता उदाहरण है। वर्ष 2012 में जब संसद ने 60 वर्ष पूरे किए थे तब तमाम दलों के सदस्यों ने कसम खाई थी कि सदन में अप्रिय घटना नहीं होने देंगे, अति महत्वपूर्ण प्रश्नकाल के महत्व को कम नहीं होने देंगे, लेकिन देखने में आ रहा है कि राज्यों के मुद्दों पर भी संसद को आए दिन ठप किया जाता है।
अब तक के संसदीय इतिहास में 15वीं लोकसभा में सबसे कम विधायी कार्य हुए हैं, उसके अधिकतर कामकाजी घंटे सदस्यों के शोरगुल की भेंट चढ़ गए हैं पर उसके आखिरी सत्र में यह नजारा देखने को मिलेगा किसी ने नहीं सोचा था। ऐसा लग रहा है कि अपने सांसदों पर से पार्टियों का लगाम खत्म हो गया है। वे बेलगाम होकर लोकतंत्र की र्मयादा को खत्म करने पर अमादा हो गए हैं। किसी भी दल के सांसद हों, जिसने भी लोकतंत्र के मंदिर को कलंकित करने का काम किया है, उसको सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए, जो कि एक नजीर बन जाए जिससे आगे से संसद में ऐसे दृश्यों की पुनरावृत्ति न हो।
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