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योगेश कुमार सोनी का लेख : अर्थव्यवस्था भी होगी प्रभावित

किसानों के आंदोलन की वजह से कच्चे माल और तैयार उत्पादों की ढुलाई में भारी परेशानी हो रही है। देश के दो प्रमुख उद्योग संगठन सीआईआई और एसोचैम का कहना है कि यदि यही हाल रहा तो आर्थिक स्थिति के समीकरण बहुत बिगड़ जाएंगे। राजधानी को सबसे ज्यादा पदार्थ सप्लाई करने वाले हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश व जम्मू-कश्मीर की संयुक्त अर्थव्यवस्था लगभग बीस लाख करोड़ है। दिल्ली में सुचारू रूप से सप्लाई न होने की वजह से इन तीनों राज्यों की इकोनॉमी भी प्रभावित होनी शुरू हो गई है। देश की रफ्तार के लिए अब सरकार व किसान संगठनों को गंभीरता से सोचते हुए कोई हल निकालने की जरूरत है।

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किसान आंदोलन

योगेश कुमार सोनी

देश की राजधानी को घेरे हुए किसानों के आंदोलन की वजह से कच्चे माल और तैयार उत्पादों की ढुलाई में भारी परेशानी हो रही है। व्यापारियों के अनुसार ढुलाई की लागत 10 से 15 प्रतिशत बढ़ गई है। देश के दो प्रमुख उद्योग संगठन सीआईआई और एसोचैम का कहना है कि यदि यही हाल रहा तो आर्थिक स्थिति के समीकरण बहुत बिगड़ जाएंगे। हर रोज करीब 3500 करोड़ का नुकसान हो रहा है। दोनों संगठनों ने सरकार व किसानों से आग्रह किया है कि हल निकालकर आंदोलन को खत्म किया जाए। यदि ऐसा नहीं होता तो इकोनॉमी को उबारने में बड़े स्तर पर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।

अर्थशास्त्रियों के अनुसार छोटे व्यापारियों की सप्लाई चेन प्रभावित होने की वजह से पूरे उद्योग जगत प्रभावित हो रहा है। आंदोलन की वजह से दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान के कई क्षेत्रों में माल आने में बहुत कठिनाई हो रही है। इसके अलावा देश के अन्य राज्यों से पंजाब व हरियाणा के अलावा दिल्ली में सामान पहुंचाने में समय बहुत अधिक लग रहा है, जिसकी वजह से ट्रांसपोर्टरों का किराया चार से पांच गुणा बढ़ गया है। इस मामलें में ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि आंदोलन की वजह से हमारा ईधन ज्यादा लग रहा है व इसके अलावा जहां महीने में पन्द्रह चक्कर लगते थे वहां अब मात्र तीन-चार रह गए। कुछ ट्रांसपोर्टर के डर की वजह से अपने वाहन भेजने में हिचकिचा रहे हैं।

यदि कृषि उत्पादों की विपणन पर गौर करें तो देश के कई राज्यों के किसानों को भारी नुकसान हो रहा है। चूंकि कुछ खाद्य पदार्थों व वस्तुएं चेन सिस्टम से आती है। दिल्ली से दूर कुछ राज्यों में जो माल आता है वो दूसरे राज्यों से होकर आता है जिस वजह से लगभग पूरा भारत प्रभावित हो रहा है। कोरोना की वजह से धीरे-धीरे संकट से निकला जा रहा है जिससे पर्यटन राज्यों को भी कुछ उम्मीद जगी थी, लेकिन दिल्ली के बार्डर बंद होने की वजह से वो फिर प्रभावित हो गए। जैसा कि मार्च से पर्यटन क्षेत्र बिल्कुल ठप पड़ा था, लेकिन अब शुरुआत हुई ही थी कि आंदोलन की वजह से फिर स्थिति दयनीय व चिंताजनक हो गई। पर्यटक स्थल की हालात सबसे ज्यादा खराब इसलिए हो रही है, चूंकि कोई भी व्यक्ति घूमने-फिरने तब ही जाता है जब उस पर बुनियादी खर्च से अधिक पैसा हो जिसके लिए लोगों ने थोड़ी शुरुअात भी कर ली थी, लेकिन मामला फिर शून्य पर आ गया। इसके अलावा सबसे ज्यादा पर्यटन स्थल पर दिल्ली-एनसीआर के लोग जाते हैं।

एक सर्वे के अनुसार पूरे भारत के पर्यटन स्थलों से कुल आय में लगभग 40 प्रतिशत आय दिल्ली के लोगों से होती है। आकडों से स्पष्ट हो जाता है राजधानीवासी सबसे ज्यादा घूमते हैं।इसमें कॉर्पोरेट जगत की यात्राएं भी शामिल हैं। दिल्ली-एनसीआर में देश की सभी बडी कंपनियां है जिसकी वजह से व्यापारिक व कॉर्पोरेट जगत को बहुत ज्यादा बाहर आना-जाना पड़ता है। एक तो पहले से ही कोरोना की वजह से लोग बाहरी राज्यों में आन-जाने से परहेज कर रहे थे और अब साथ में आंदोलन की वजह से निकलने में परेशानी महसूस कर रहे हैं। होटल इंडस्ट्री की हालात खराब होने के कारण कई लोगों की नौकरी जा चुकी हैं। वेटर से शेफ तक इस क्षेत्र से निराश होकर अन्य क्षेत्रों में जा रहे हैं।

किसान और सरकार की बीच बात न बनने से एक बार फिर इकोनॉमी पर इस तरह इतना बड़ा संकट आ जाएगा इसका किसी को अंदाजा नही था। पिछले दिनों से देखा जा रहा है दोनों पक्षों के बीच कोई हल नहीं निकल पा रहा। दरअसल इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी देखा जा रहा है सभी विपक्षी दल किसानों को भड़काने काम कर रहे हैं। हमारे देश में किस तरह समस्याओं को भी बेचा जा सकता है वो एक बार फिर इस आंदोलन में देखने मिल रहा है। जिस राजनीतिक पार्टी को इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है वो भी अपनी रोटी सेंकने का प्रयास कर रही हैं। आंदोलन करना किसी भी व्यक्ति, संगठन या पार्टी का अधिकार है, लेकिन कुछ कामों में अपने विवेक का इस्तेमाल जरूरी है। यदि आपकी वजह से वो नुकसान सबको झेलना पड़े वो गलत है और अब इस आंदोलन की वजह से भी अब कुछ ऐसा हो रहा है। आंदोलन का प्रभाव अब पूरे देश पर पड़ने लगा है। यह अब दिल्ली से सटे राज्यों तक सीमित नहीं रह गया। इसका प्रभाव कई राज्यों में पहुंच गया। लगभग बीस दिनों से चल रहे इस आंदोलन से अर्थव्यवस्था पर भारी असर देखने को मिल रहा है। अपने शक्ति प्रदर्शन व वर्चस्व की लड़ाई में सरकार व किसान यह भूल रहे हैं कि इस लड़ाई का अप्रत्यक्ष रूप से कौन लोग फायदा उठा रहे हैं व किसको नुकसान हो रहा है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि अन्नदाताओं के लिए देशवासियों की भावनाएं हमेशा सर्वोपरि हैं, लेकिन आंदोलन का अर्थ आंदोलन तक ही रहे तब...। वहीं दूसरी ओर सरकार को अब किसी निर्णायक दिशा की ओर जाना चाहिए। अब तक हल न निकलना तानाशाही की झलक दिखा रहा है। पहले से ही कोरोना काल में नौकरी से लेकर व्यापारी वर्ग की क्या स्थिति है। जहां एक ओर प्राइवेट कंपनियों में काम करने वालों लोगों को तनख्वाह बढ़ने का इंतजार था, लेकिन कोरोना की वजह से बढ़ने की बजाय घट गई। यदि अब भी स्थिति संभलने में नहीं आई तो इसका दुष्परिणाम बड़े स्तर जल्द ही देखने को मिलेगा।

बहराहल, आंदोलन से टैक्सलटाइल, फार्म मशीनरी, खाद्य पदार्थ व ऑटोमाेबाइल के साथ खेती से जुड़े उद्योग ज्यादा प्रभावित होने लगे हैं। राजधानी को सबसे ज्यादा पदार्थ सप्लाई करने वाले हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश व जम्मू-कश्मीर की संयुक्त अर्थव्यवस्था लगभग बीस लाख करोड़ है। दिल्ली में सुचारू रूप से सप्लाई न होने की वजह से इन तीनों राज्यों की इकोनॉमी भी प्रभावित होनी शुरू हो गई है। इसके अलावा दिल्ली में बाहरी राज्यों से आने वाले खाद्य पदार्थ व वस्तुएं भी लगातार महंगी हो रही हैं। मौसमी सब्जियां महंगी होने से आम आदमी की जेब पर प्रभाव पड़ने लगा। सर्दी के सीजन में मटर, गाजर व गोभी के अलावा जितनी भी सब्जियां सस्ती होती थी अब वो पकड़ से बाहर हो रही हैं।

राष्ट्रीय राजधानी रुकने से खुद तो महंगाई की शिकार हो रही है, लेकिन बाकी राज्यों की भी स्थिति प्रभावित होने लगी है। देश की रफ्तार के लिए अब सरकार व किसान संगठनों को गंभीरता से सोचते हुए कोई हल निकालने की जरूरत है। किसी भी चीज की अति बुरी होती है और शायद अब आंदोलन में भी ऐसा ही हो रहा है। दोनों पक्षों को अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए देश की तरक्की के बारे में सोचने की जरूरत है। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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