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सतीश सिंह का लेख: पटरी पर लौटती अर्थव्यवस्था

ताजा आंकड़ों के अनुसार कार्यस्थलों पर लोगों की मौजूदगी तकरीबन 70 प्रतिशत हो गई है, जो कमोबेश सामान्य दिनों के मुताबिक है। हालांकि, पार्क, खुदरा दुकानों, शापिंग माल आदि में लोगों की मौजूदगी अभी भी 50 प्रतिशत से कम है, लेकिन जल्द ही इसमें बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। सिनेमाघरों पर अभी भी प्रतिबंध लगा हुआ है, लेकिन इसके खुलने से इस पर निर्भर उद्योगों की गतिविधियों में तेजी आएगी।

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प्रतीकात्मक तस्वीर

सतीश सिंह

धीरे-धीरे लॉकडाउन को अनलॉक किया जा रहा है। हालांकि कुछ राज्यों में कोरोना वायरस के तेज आक्रमण की वजह से लॉकडाउन को दोबारा लगाया जा रहा है, लेकिन समग्र रूप से अनलॉक की प्रक्रिया अगले चरण की ओर बढ़ रही है। आर्थिक गतिविधियों के शुरू होने से अर्थव्यवस्था से जुड़े कुछ संकेतक सकारात्मक परिदृश्य की ओर इशारा कर रहे हैं। उदहारण के तौर पर रेलवे की ढुलाई से कमाई में इजाफा हो रहा है। अगस्त, 2020 के पहले पखवाड़े में वर्ष 2019 के सामान अवधि के मुकाबले ढुलाई से कमाई ज्यादा रही है।

मुंबई में रोज यात्रा करने वालों की संख्या में भी जून महीने से उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और इसमें लगातार वृद्धि हो रही है। खास करके ऑफिस जाने और ऑफिस से लौटने के समय में। नई दिल्ली में भी यातायात सामान्य स्तर के 68 प्रतिशत पर पहुंच गया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार कार्यस्थलों पर लोगों की मौजूदगी तकरीबन 70 प्रतिशत हो गई है, जो कमोबेश सामान्य दिनों के मुताबिक है। हालांकि, पार्क, खुदरा दुकानों, शापिंग माल आदि में लोगों की मौजूदगी अभी भी 50 प्रतिशत से कम है, लेकिन जल्द ही इसमें बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। सिनेमाघरों पर अभी भी प्रतिबंध लगा हुआ है, लेकिन इसके खुलने से इस पर निर्भर उद्योगों की गतिविधियों में तेजी आएगी।

बिजली उत्पादन में भी वृद्धि हो रही है। आंकड़ों से पता चलता है कि बिजली उत्पादन 2019 के स्तर को प्राप्त कर चुका है। हालांकि, लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में इसमें लगभग 30 प्रतिशत की कमी आई थी। उद्योग और दफ्तर पूरी तरह से बंद हो गए थे, जिससे बिजली की जरूरत कम हो गई थी। औद्योगिक गतिविधियों और वाहनों के आवागमन में वृद्धि से प्रदूषक तत्वों का उत्सर्जन होता है। फिलहाल, इसका स्तर मुंबई की तुलना में दिल्ली में ज्यादा है। मुंबई में प्रदूषक तत्वों का उत्सर्जन 2019 की समान अवधि के मुकाबले कम है, लेकिन जैसे-जैसे आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी, इसमें और वृद्धि होगी।

कोरोना महामारी के दौरान डिजिटल भुगतान, उद्योग एवं आम लोगों के लिण् आपदा में अवसर साबित हुई है। नोटबंदी में भी डिजिटल भुगतान को इतनी रफ्तार नहीं मिली थी, जितनी इस महामारी के कारण पिछले पांच महीनों में मिली है। सूक्ष्म, छोटे व मझोले उद्यमियों का रुझान ऑनलाइन भुगतान की ओर तेजी से बढ़ रहा है। अब बड़े भुगतान भी ऑनलाइन किए जाने लगे हैं।

इस मामले में कुछ चुनौतियां जरुर हैं, लेकिन सकारात्मक प्रयासों से उन्हें दूर किया जा सकता है। महामारी के दौरान ग्राहक खुद डिजिटल भुगतान के उपयोग की वकालत करने लगे हैं। फोनपे से कोरोना महामारी में बड़ी संख्या में नए ग्राहक जुड़े हैं। व्हाट्सऐप भी डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में आने के लिए तैयार है। एक अनुमान के अनुसार जल्द ही, इसकी सेवाएं देश में शुरू हो सकती है। शहरी क्षेत्रों में डिजिटल भुगतान की दिशा में सहज बदलाव हुआ है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में अभी भी इस दिशा में बहुत काम करने की जरुरत है। माना जा रहा है कि यूपीआई पर ऋण सुविधा शुरू होने के बाद ग्रामीण इलाकों में डिजिटल भुगतान में तेजी आएगी, क्योंकि इसके जरिये छोटी-मोटी जरूरतों के लिए ऋण लेना आसान होगा।

इसमें दो राय नहीं है कि कोरना महामारी के दौरान मजदूरों एवं कामगारों को सबसे ज्यादा परेशानी हुई है, लेकिन उद्योगों के मालिकों को भी मजदूरों एवं कामगारों के महत्व का पता चल गया है। वे जान गए हैं कि उनके बिना उद्योग-धंधों को नहीं चलाया जा सकता है। लॉकडाउन को अनलॉक करने की प्रक्रिया में मजदूरों एवं कामगारों को काम पर वापस बुलाने के लिए शिद्दत से प्रयास किए जा रहे हैं। विनिर्माण क्षेत्र में मजदूरों एवं कामगारों का भरोसा जीतने के लिए कार्यक्षेत्रों में फेस रीडर, रेटिना स्कैनर और स्वाइप कार्ड से उपस्थिति दर्ज करने वाली बायोमेट्रिक प्रणाली आदि का इंतजाम किया जा रहा है। श्रमिकों को अपने कार्यस्थल पर ही भोजन करने की अनुमति दी गई है। उद्योगों के मालिकों को इस बात का अहसास हो गया है कि मजदूरों एवं कामगारों के साथ स्वस्थ संबंध बनाने से ही उनके उद्योग चल पाएंगे। मारुति सुजूकी अपनी इन-हाउस मोबाइल ऐप के जरिये करीब 50,000 कर्मचारियों की रियल टाइम आधार पर निगरानी कर रही है, जिसमें स्वाद, गंध तथा कोरोना वायरस के अन्य संभावित लक्षणों को पहचानने की क्षमता है।

आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार बढ़ने से लघु वित्त बैंक एवं अन्य बैंकों के पास ऋण की किस्तें आने लगी हैं। ऋण की किस्तें जमा करने वालों में कमजोर तबके के लोग अधिक हैं। वे लोग खुद ही ऋण की किश्त एवं ब्याज चुका रहे हैं ताकि चक्रवृधि ब्याज लगने से उन पर ज्यादा आर्थिक बोझ नहीं पड़े। वे जान गए हैं कि मॉरेटोरियम कर्ज माफी नहीं है। समय पर ऋण की किश्त एवं ब्याज का भुगतान नहीं करने पर उन्हीं को नुकसान होगा। ऋण की करीब 90 प्रतिशत की अदायगी लॉकडाउन की वजह से मार्च महीने से बंद थी, लेकिन जुलाई महीने से ऋण के किस्तों एवं ब्याज का भुगतान कर्जदार करने लगे हैं। मौजूदा माहौल में उम्मीद है कि अगस्त महीने में मॉरेटोरियम की अवधि खत्म होने के बाद ऋण की किस्तें आने में और भी तेजी आएगी। अभी आम लोग नए ऋण लेने से बच रहे हैं। वे समझ गए हैं ज्यादा ऋण लेने से उनकी ही मुश्किलें बढ़ेगीं। अधिकांश ऋणी ईमानदार हैं। अगर बैंक उनकी परेशानी समझेंगें तो ऋण की वसूली भी होगी। शुरू में लगभग 90 प्रतिशत लोगों ने मॉरेटोरियम की सुविधा ली थी, लेकिन अब इसमें करीब 50 प्रतिशत की कमी आई है। जिनके पास पैसे हैं या जो फिर से काम करने लगे हैं वे ऋण की किस्तों एवं ब्याज की अदायगी प्राथमिकता से कर रहे हैं।

कहा जा सकता है कि लॉकडाउन को आहिस्ता-आहिस्ता अनलॉक करने से आर्थिक गतिविधियों में तेजी आ रही है। लोग काम पर वापस लौटने लगे हैं। बदले माहौल में आमलोग बचत की महत्ता समझ गए हैं। इसलिए लोग फिजूलखर्ची से बच रहे हैं। जिन्होंने बैंक से ऋण ले रखा है, वे ऋण की किस्तों एवं ब्याज को सबसे पहले चुकाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए लोग डिजिटल भुगतान पर जोर दे रहे हैं। इन सब के साथ-साथ अधिकांश लोग अपने स्वास्थ को बेहतर रखने के लिए कोरोना वायरस से बचने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं, जो अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत हैं।

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