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वर्तमान का 'विषाद' भेदने कांग्रेस गांडीव पर धरे अतीत का गौरव

कांग्रेस कार्यसमिति के इस सर्वसम्मत फैसले ने तात्कालिक रूप से नेतृत्व के संकट को टाल तो दिया है लेकिन खत्म नहीं किया है, जबकि तमाम चुनौतियां पार्टी के सामने हैं। जेहन में यदि अतीत की उपलब्धियों का गौरव बना रहता है तो वह वर्तमान की चुनौतियों से जूझने में साहस और भविष्य को लेकर उम्मीद जगाए रखने में सहायक होता है, लेकिन समूची कांग्रेस मानो इस अहसास को भुला ही बैठी है।

वर्तमान का

अब यह कोई द्वापर युग तो है नहीं कि युद्ध आरंभ होने से पहले महान धनुर्धर अर्जुन मोहग्रस्त हो अपना गांडीव धरा पर धर दे तो कर्तव्य का बोध कराने भगवान कृष्ण गीता का संदेश लेकर उपस्थित हो जाते। कलियुग का दौर है और राहुल गांधी ने गांडीव उठाने से इंकार भी युद्ध के बीच में ही कर दिया। एक तो करेला और ऊपर से नीम चढ़ा की सूक्ति भी यूं फिट बैठ रही है कि देश की बहुसंख्यक जनता वर्तमान में कांग्रेस को कौरव मान नरेंद्र मोदी-अमित शाह के भाल पर कृष्ण-अर्जुन की भांति तिलक करने पर आमादा है। लिहाजा 25 मई से 10 अगस्त तक चली ढाई माह की मशक्कत के बाद 134 वर्षीय मरणासन्न भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के प्राण बचाए रखने की जिम्मेदारी एक बार फिर बहत्तर वर्षीय सोनिया गांधी के कंधों पर डाल दी गई है। जो फैसला ढाई घंटे में लेना संभव था, वह ढाई महीने में लिया गया। बेहतर होता कि ढाई घंटे में अंतरिम अध्यक्ष की यह व्यवस्था कर ढाई माह में स्थायी तौर पर नेतृत्व का संकट हल कर लिया जाता तो न तो संसद में पार्टी की तीन तलाक से लेकर धारा 370 के मुद्दे पर छीछालेदार ही होती और न ही देशभर में पार्टी को छोड़कर जाने वालों की कतार ही लगती।

कांग्रेस कार्यसमिति के इस सर्वसम्मत फैसले ने तात्कालिक रूप से नेतृत्व के संकट को टाल तो दिया है लेकिन खत्म नहीं किया है, जबकि तमाम चुनौतियां पार्टी के सामने हैं। जेहन में यदि अतीत की उपलब्धियों का गौरव बना रहता है तो वह वर्तमान की चुनौतियों से जूझने में साहस और भविष्य को लेकर उम्मीद जगाए रखने में सहायक होता है, लेकिन समूची कांग्रेस मानो इस अहसास को भुला ही बैठी है।

कांग्रेस के सम्मुख आज जनता के बीच साख बचाने और बढ़ाने से पहले चुनौती अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं की पार्टी के प्रति निष्ठा बनाए रखने की है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जिस कदर पार्टी छोड़ने को लेकर होड़ मची हुई है, उसे देखकर ही अजीत जोगी जैसे दीर्घ अनुभवी राजनेता भी महात्मा गांधी के कांग्रेस को समाप्त करने जैसे कथन को अमल में लाने की सलाह व्यंग्य के रूप में सार्वजनिक मंचों से देने लगे हैं।

सोनिया गांधी कांग्रेस पार्टी के इतिहास में सबसे लंबा कार्यकाल बतौर अध्यक्ष निभा चुकी हैं। अनौपचारिक रूप से वह अध्यक्षीय दायित्व से वर्ष 2013 'जब राहुल गांधी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया था'। और औपचारिक रूप से वर्ष 2017 में मुक्त खराब सेहत के चलते ही हो गई थीं। गत कई वर्षों से वह अपनी खराब सेहत को लेकर चर्चा में भी रही हैं, यहां तक कि अभी हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में भी वह अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली को छोड़कर और कहीं चुनाव प्रचार के लिए नहीं जा सकीं।

सवाल यह है कि जब उनकी अपनी सेहत ही ठीक नहीं रहती है तो वह पार्टी की खस्ताहाल सेहत को कैसे ठीक कर पाएंगी। ऊपर से बढ़ती उम्र की अपनी सीमाएं भी हैं। दरअसल, कांग्रेस को इस इस समय ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो उसके कार्यकर्ताओं को विचार, विश्वास और व्यवहार दे सके। ऐसा नेतृत्व जिसमें दिन के चौबीस घंटे में अड़तालीस घंटे के बराबर काम करने का माद्दा हो। नेतृत्व ऐसा चाहिए जो आमजनता के दिलों-दिमाग में अपनी पार्टी के नजरिए को स्पष्टता के साथ संप्रेषित कर सके।

वह नेतृत्व जो जनता को बता सके कि कांगेस महज किसी राजनीतिक अवसरवाद का नहीं बल्कि आजादी की लड़ाई में बेतहाशा बलिदान और आजादी के बाद देश का नव निर्माण करने वाली संस्था है। जो यह समझा सके कि पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल के परस्पर रिश्ते नरेंद्र मोदी-अमित शाह जैसे भले ही नहीं रहे हों, लेकिन अटल विहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी जैसे जरूर थे।

ऐसा नेतृत्व दरकार है जो कांग्रेस के एक-एक कार्यकर्ता को इस बात के लिए तैयार कर सके जो जनता को बताए कि आजादी के बाद देश की जो कुछ तस्वीर बदली है वह उनकी पार्टी के खून पसीने से ही बदली है। अगर पुलवामा की बहादुरी पर देश का मौजूदा राजनैतिक नेतृत्व गर्व कर सकता है तो कांग्रेसियों को सन 1971 के बांग्लादेश के निर्माण में योगदान पर दहाड़ने से किसने रोक रखा है।

नरेंद्र मोदी आज अपने राजनैतिक कौशल और व्यक्तित्व के बूते विश्व पटल पर चमकते दिखाई दे रहे हैं, तो इससे एक-एक भाजपाई गर्वित है। कांग्रेसी क्यूं इस बात पर सीना फुलाने में संकोच कर रहे हैं कि इससे भी बढ़ी शख्सियत विश्व राजनीति में जवाहरलाल नेहरू ने हासिल करके दिखाई थी। वह देश जो दो-चार साल पहले सदियों की गुलामी से आजाद हुआ हो, उसके नेता का यह मुकाम हासिल करना क्या किसी अजूबे से कम नहीं था?

जो विश्व इतिहास के छात्र रहे हैं वह जानते हैं कि पचास और साठ के दशक में विश्व राजनीति में टीटो, नासिर और नेहरू के नाम की अलग ही हनक थी। शीतयुद्ध के दौर में रूस अमेरिका का पुछल्ला बनने की जगह गुट निरपेक्ष समूह बनाने का करिश्मा दुनिया के सामने पंडित नेहरू ने ही कर दिखाया था। स्मरण रहे त्याग राजा का स्तुत्य होता है भिखारी का नहीं। तभी कहा गया है कि क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो। सोने की चम्मच लेकर पैदा हुए थे पंडित नेहरू।

चाहते तो रेशमी रजाइयों को ओढ़कर शाही जिंदगी व्यतीत करते। लेकिन नहीं, देश की आजादी की खातिर अपनी जवानी के दस साल उन्होंने जेल की दीवारों में बिताए। यह उनकी विद्वता थी कि जेल के दौरान अपनी बेटी को लिखे उनके पत्र तक विश्व साहित्य की धरोहर हो गए। पंडित नेहरू किसी एडविना के प्यार में पागल आशिक का नाम नहीं था, यह वो शख्स था जिसके प्यार में हमारे पूर्वज पागल थे।

इस देश की जनता ने तीन-तीन बार उन्हें और उनकी पार्टी को अपना भाग्य निर्माता चुना था। ठीक वैसे ही जैसे अभी नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी को चुना हुआ है। क्या यह अपने आप में दुखद नहीं है कि आप ऐसे महान व्यक्तित्व को लेकर ऐतिहासिक तथ्य तक संसद में नहीं रख पाते। धारा 370 के प्रावधान को जो लोग नेहरू की शेख अब्दुला के प्रति मोहब्बत का नतीजा बताते हैं, उन्हें कांग्रेसी क्यों नहीं बता पाते कि शेख अब्दुल्ला को जेल में दस साल तक डाले रखने का फौलादी फैसला भी पंडित नेहरू का ही था। और जब उन्होंने यह फैसला लिया तब सरदार पटेल इस दुनिया में नहीं थे।

कांग्रेस को ऐसे नेतृत्व कर्ता की आज जरूरत है जो जनभावना को समझते हुए देश हित के साथ पार्टी की रीति-नीति का निर्धारण कर सके। विगत दो तीन दशक में कांग्रेस को अहसास ही नहीं हुआ कि कब वह धर्म निरपेक्षता का लबादा छोड़ मुस्लिम परस्त पार्टी की छवि में तब्दील हो गई। नतीता यह हुआ कि देश का बहुसंख्यक वर्ग इस सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी से बुरी तरह किनारा कर गया। केंद्र में सत्ता बनाए रखने की चाह में सहयोगी दलों के कदाचार और भ्रष्टाचार के सामने घुटने टेकने की नीति ने और बेढ़ा गर्क कर दिया।

इन पस्त हाल परिस्थितियों में राहुल गांधी की पार्ट टाइम राजनीति की बदौलत अगर किसी चमत्कार की उम्मीद कांग्रेसी कर रहे थे तो यह कसूर कांग्रेसियों का है, जनता का नहीं। दरअसल राहुल गांधी स्वभावत: राजनीतिज्ञ हैं ही नहीं। वह मूलत: ऐसे सीधे साधे व्यक्ति हैं जो राजनीति के खेल में भी दो और दो योग चार ही करते हैं जबकि उनके प्रतिद्वंदी बाइस बनाने का हुनर रखते हैं। जो कुछ अच्छा करने की चाह तो रखते हैं लेकिन वह कैसे हो, इसको लेकर दृष्टि दे पाने में नाकाम रहते हैं।

उनकी चुनौती तब और बढ़ जाती है जब मुकाबले में नरेंद्र मोदी जैसा करिश्माई व्यक्तित्व सामने आ जाता है। सच तो यह है कि अभी कांग्रेसियों के लिए यह समय नरेंद्र मोदी और अमित शाह को कोसने का नहीं,उनसे सीखने का है। अपने विचार को व्यवहार में कैसे क्रियान्वित किया जाता है यह जोड़ी उसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। कार्यसमिति का कल का फैसला आम जनता में भले ही बहुत सराहा नहीं जा रहा है, लेकिन उनके पास इससे बेहतर विकल्प अभी कोई नहीं था।

इस फैसले ने कांग्रेस के उस संभावित विखंडन को कुछ समय के लिए टाल ही दिया है जो गैर गांधी अध्यक्ष चुने जाने की अवस्था में तय था। लेकिन आगे की चुनौती इससे कहीं ज्यादा बढ़ी है क्योंकि आंतरिक व्यवस्था के स्थायी में तब्दील होने के हालात नहीं हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि अतीत के अनुभव से सबक ले कांग्रेस और सोनिया गांधी दोनों ही परिवार के मोह से बाहर निकल ऐसा नेतृत्व पार्टी में खोज पाएंगे जो देश को सत्ता का विकल्प ना सही पर कम से कम मजबूत विपक्ष की भूमिका में तो अपने आपको दिखा पाएगा। देश की लोकतांत्रिक पहिचान बनाए रखने के लिए यह आज की सबसे बड़ी जरूरत भी है।

(हरिभूमि ग्रुप के प्रधान संपादक श्री डा. हिमांशु द्विवेदी जी)

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