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संपादकीय लेख : संसद को राजनीति का अखाड़ा न बनने दें

संसद में हंगामा करने के लिए किस तरह नित नए कारण तलाशे जाते हैं। अब नया कारण मिल गया है पेगासस। जासूसी को लेकर संसद के मानसून सत्र के दौरान दोनों सदनों में हंगामा जारी है। गुरुवार को विपक्षी सांसदों ने पेगासस जासूसी कांड समेत दूसरे कई मुद्दों को लेकर प्रदर्शन किया। पेगासस मामले को लेकर राज्यसभा में हंगामे के चलते सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव अपनी बात नहीं रख पाए और उन्हें अपना भाषण छोटा करना पड़ा। यहां तक कि मामला छीना-झपटी तक पहुंच गया।

संपादकीय लेख : संसद को राजनीति का अखाड़ा न बनने दें
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : संसद में हंगामा करने के लिए किस तरह नित नए कारण तलाशे जाते हैं। अब नया कारण मिल गया है पेगासस। जासूसी को लेकर संसद के मानसून सत्र के दौरान दोनों सदनों में हंगामा जारी है। गुरुवार को विपक्षी सांसदों ने पेगासस जासूसी कांड समेत दूसरे कई मुद्दों को लेकर प्रदर्शन किया। पेगासस मामले को लेकर राज्यसभा में हंगामे के चलते सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव अपनी बात नहीं रख पाए और उन्हें अपना भाषण छोटा करना पड़ा। यहां तक कि मामला छीना-झपटी तक पहुंच गया। मंत्री पेगासस मामले में अपनी बात रखने के लिए खड़े हुए तो ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल के सांसद शांतनु सेन ने उनके हाथ से उनके बयान का पर्चा छीनकर फाड़ दिया और हवा में उछाल दिया। इस दौरान हंगामे के बीच ही मंत्री ने बोलना जारी रखा, लेकिन पूरी तरह अपनी बात नहीं रख पाए। इसके बाद बीजेपी और तृमणूल के सांसदों में तीखी बहस शुरू हो गई और हालात संभालने के लिए मार्शल बुलाने पड़े। कायदे से तो ऐसी हरकत करने वाले सांसद के खिलाफ सख्त कार्यवाही होनी चाहिए। यह कतई संसदीय मर्यादा नहीं है कि कोई सांसद मंत्री के हाथ से दस्तावेज छीनकर फाड़ दे। यह भी विडंबना है कि जब भी ऐसी हरकत करने वाले किसी सांसद के खिलाफ कार्यवाही होती है तब हंगामा करके अपने निलंबन को निमंत्रण देने वाले सांसद यह रोना रोने लगते हैं कि उन्हें बोलने से रोका जा रहा है। इतने से भी संतोष नहीं होता तो आपातकाल लग जाने या फिर तानाशाही कायम हो जाने का शोर मचाया जाने लगता है।

इन दिनों ऐसा ही हो रहा है। हैरत नहीं कि हंगामा करके संसद न चलने देने वाले सांसद यह मानकर चल रहे हों कि वे अपने उद्देश्य में सफल हैं। बड़ी बात नहीं कि उनके नेताओं की ओर से उन्हें शाबाशी भी मिल रही हो। चूंकि राजनीतिक दल संसद में हंगामा करने को एक तरह की उपलब्धि मानने लगे हैं, इसलिए संसदीय कार्यवाही का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। यदि इस गिरावट को रोका नहीं गया तो ऐसी भी स्थिति बन सकती है कि संसद के चलने या न चलने का कोई महत्व नहीं रह जाएगा। क्या यह किसी से छिपा है कि प्रत्येक संसद सत्र के पहले होने वाली सर्वदलीय बैठकें निरर्थक ही साबित हो रही हैं। कोई भी राजनीतिक दल इस तरह की बैठक को गंभीरता से नहीं ले रहा है। यह तथ्य सही है कि अगर देश के राजनीतिक नेताओं, पत्रकारों की जासूसी हुई है तो उसकी जांच होनी चाहिए। इस बात की तह तक जाना चाहिए कि ऐसा किसने और किसके कहने पर किया। इसके पीछे उद्देश्य क्या था, लेकिन संसद में हंगामा करने से तो कुछ हासिल नहीं होने वाला। हालांकि केंद्र ने साफ कर दिया है कि सरकार ने किसी के भी फोन की जासूसी नहीं करवाई है।

इसके बावजूद इसकी अनदेखी भी नहीं की जा सकती कि सत्तापक्ष अपनी बात को सही तरह रेखांकित नहीं कर सका। इसका लाभ उठाकर विपक्ष लगातार माहौल बनाने में जुटा है। सत्तापक्ष को भी चाहिए कि सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाकर उन्हें संतुष्ट करे ताकि संसद में लगातार हो रहे हंगामे को खत्म किया जा सके। संसद को लोकतंत्र के मंदिर की संज्ञा दी गई है। हर छोटी-बड़ी बात पर देश की सबसे बड़ी पंचायत में हो-हल्ला होना न तो लोकतंत्र के लिए अच्छा है और न ही देश के लिए। जब भी संसद का सत्र शुरू होता है पूरे देश की निगाहें हमारे सांसदों पर होती है। देशवासी उम्मीद करते हैं कि संसद में सार्थक बहस होगी। देश के विकास और देशवासियों की उन्नति के लिए अहम फैसले लिए जाएंगे। जब सदन में बहस न होकर हो-हल्ला होता है तो हर देशवासियों को मायूसी होती है। देश का पैसा बर्बाद होता है सो अलग। ऐसे में जरूरी है कि सदन निर्बाध चले। यह इसलिए भी जरूरी है कि पूरी दुनिया कोरोना से त्रस्त है। हमारी अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है, बेकारी चरम पर है। इन सबके बाद भी महामारी की तीसरी लहर का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे हालात में देश की सबसे बड़ी पंचायत में कुछ सार्थक न होकर बेकार का शोरगुल हो तो देशवासियों पर क्या बीतेगी। ऐसे में सत्ता पक्ष और विपक्ष इस बात का ध्यान रखें कि संसद में देशहित में फैसले हों न कि उसे राजनीति का अखाड़ा बना दिया जाए।

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