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धर्म के नाम पर महिलाओं से भेदभाव गलत

केवल पवित्रता के नाम पर महिलाओं का किसी मंदिर में प्रवेश को प्रतिबंधित करना संविधान का उल्लंघन है, नागरिक स्वतंत्रता पर कुठाराघात है, धार्मिक स्वतंत्रता का हनन है और यह ‘धर्म के आगे सभी समान'' की भावना का भी अनादर है।

धर्म के नाम पर महिलाओं से भेदभाव गलत

केवल पवित्रता के नाम पर महिलाओं का किसी मंदिर में प्रवेश को प्रतिबंधित करना संविधान का उल्लंघन है, नागरिक स्वतंत्रता पर कुठाराघात है, धार्मिक स्वतंत्रता का हनन है और यह ‘धर्म के आगे सभी समान' की भावना का भी अनादर है। आज 21वीं सदी में जब महिलाएं अंतरिक्ष में जा रही हैं, फाइटर प्लेन उड़ा रही हैं, विज्ञान, राजनीति, खेल, शिक्षा, स्वास्थ्य, कला से लेकर सुरक्षा-प्रशासन तक करियर के हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं, हर क्षेत्र में पुरुषों से कमतर नहीं हैं।

देश की तरक्की में बढ़चढ़ कर अपना योगदान कर रही हैं, आध्यात्मिक चेतना में अपनी श्रेष्ठता साबित कर रही हैं, तब किसी मंदिर में मासिक धर्म जैसे तर्क के आधार पर महिलाओं के प्रवेश को बाधित करना सचमुच दकियानूस सोच है। ऐसी सोच रखने वाले निश्चित ही किसी भी धर्म के रक्षक नहीं हो सकते। कोई भी धर्म हो, उसके सभी अनुयायियों को समान रूप से अराधना का अधिकार है। धर्म लिंग के आधार पर विभेद नहीं करता है। सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की स्त्रीलिंग के प्रवेश पर रोक लगाए रखना धार्मिक कूपमंडूकता है।

समय बदलने व ज्ञान का विकास होने के साथ-साथ धार्मिक चेतनाओं में प्रगतिशीलता आनी चाहिए। धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों को किसी भी धार्मिक अनुष्ठान की रीति तय करने का अधिकार नहीं है। ईश्वर के दरबार सबके लिए समान रूप से खुले हैं। मंदिर-मस्जिद-दरगाह आदि जगहों पर पहले से अगर कोई त्रुटिपूर्ण नियम-परंपरा है, तो इसे उनके संचालकों व संबंधित धर्म के विद्धानों को सुधार करना चाहिए। यह चिंता की बात है कि किसी भी पूजा-इबादत स्थल पर प्रवेश के लिए अदालत को हस्तक्षेप करना पड़े।

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अब सबरीमाला मंदिर को लेकर कहा है कि इसमें प्रवेश व पूजा-अर्चना करना महिलाओं का संवैधानिक अधिकार है। किसी भी तर्क के आधार उनके साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। मंदिर निजी संपत्ति नहीं है बल्कि सार्वजनिक संपत्ति है और इस नाते यदि पुरुष वहां जा सकते हैं, तो किसी भी उम्र की महिला भी जा सकती हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को खत्म किया था। 400 साल बाद उस मंदिर में महिलाओं को अदालत के हस्तक्षेप के बाद प्रवेश मिला था।

अजमेर व चरारे शरीफ जैसे कुछ दरगार भी हैं, जिनके गर्भगृह में महिलाओं का प्रवेश नियंत्रित है। सुप्रीम कोर्ट के एक मंदिर को लेकर आए फैसले के बाद ही जिन मंदिरों व दरगाहों में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है, वह खत्म हो जानी चाहिए थी। बार-बार शीर्ष अदालत को एक ही प्रकार के विषय पर सुनवाई करनी पड़े, यह ठीक नहीं है। तीन तलाक, हलाला जैसी महिला विरोधी कुप्रथा की सुनवाई भी सुप्रीम कोर्ट में हो रही है।

कभी धार्मिक रीति के नाम पर, कभी कर्मकांड के नाम पर और कभी धर्मग्रंथ के नाम पर महिलाओं के साथ भेदभाव करना, महिला विरोधी कृत्यों को धर्म का जामा पहनाना और महिलाओं को मानसिक प्रताड़ना देना सर्वथा गलत है। ऐसा करना धर्म की गलत व्याख्या है और यह अधार्मिक है। ईश्वर की नजर में उनके सभी मानने वाले समान है, किसी को भी विशिष्टता हासिल नहीं है।

आज देश में हिंदू, मुस्लिम दोनों ही धर्म में अनेक आडबंर, अवैज्ञानिक रीतियां और महिलाओं के साथ भेदभूर्ण रवायतें हैं, इनका अंत जरूरी है। स्वयंभू धार्मिक ठेकेदारों के चलते हिंदू, इस्लाम, ईसाई समेत अधिकांश धर्मों की प्रतिष्ठा तेजी से क्षरण हुई है। महिलाओं को मंदिर में रोक एक प्रकार से छुआछूत ही है। देश में आज भी कई मंदिर हैं, जहों दलितों के प्रवेश पर पाबंदी है।

जातिगत छुआछूत, ऊंच-नीच और लिंग के आधार पर भेदभाव संविधान का उल्लंघन है। किसी भी पूजा स्थल, धार्मिक स्थल व इबादत स्थल पर महिलाओं समेत किसी के प्रवेश पर रोक नहीं होना चाहिए। धर्म रक्षा के नाम पर महिलाओं से भेदभाव गलत है, अनुचित है। यह बंद होना चाहिए।

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