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दंगों में क्यों झुलसी राजधानी

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल उतरे तो उसे लेकर भी राजनीति और मीडिया में दूसरा कर्मकांड शुरू हुआ। कर्मकांड यह कि दिल्ली के दंगे रोक पाने में नाकामी के चलते अमित शाह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नाराज है। यही वजह है कि अजीत डोभाल को मैदान में उतारा गया।

दंगों में क्यों झुलसी राजधानीदिल्ली दंगे

दंगे की आग में झुलसते रहे राजधानी दिल्ली के दंगाग्रस्त इलाके में हालात नियंत्रण में हैं। कहने के लिए शांति भी है, लेकिन यह शांति सतह की है, अंदरखाने में अब भी आग धधक रही है। हालात सामान्य करने की दिशा में दिल्ली का प्रशासन लगा हुआ है, लेकिन लोगों के जेहन में एक सवाल यह जरूर अभी तक गूंज रहा है कि जब दिल्ली दंगों की आग में झुलस सकती है तो दूसरे इलाकों में क्या होगा? सवाल यह भी है कि आखिर दंगे शुरू होने के दिन यानी 25 फरवरी को देश की बेहतर मानी जाने वाली पुलिस क्या करती रही?

दंगे कैसे हुए, इस पर तमाम तरह की चर्चाएं चल रही हैं। चूंकि दिल्ली पुलिस सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में आती है, लिहाजा दंगों के लिए केंद्र सरकार पर सवाल उठने ही थे और उठे भी, लेकिन मीडिया और राजनीति का एक कर्मकांड है। दंगों के लिए किसी को बलि बनाना। जिस तरह का आज का राजनीति एवं मीडिया का विमर्श है, उसमें दंगों के लिए अमित शाह को बलि का बकरा बनाने की कोशिश शुरू हो गई। कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेस मुख्यालय में प्रेस कांफ्रेंस करके और राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान अमित शाह का इस्तीफा मांगकर इस विमर्श को मंच दे दिया। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या अतीत में कांग्रेसी शासन में हुए दंगों में कभी किसी गृहमंत्री से इस्तीफे मांगे गए।

27 और 28 फरवरी को दंगाग्रस्त इलाके में जब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल उतरे तो उसे लेकर भी राजनीति और मीडिया में दूसरा कर्मकांड शुरू हुआ। कर्मकांड यह कि दिल्ली के दंगे रोक पाने में नाकामी के चलते अमित शाह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नाराज है। यही वजह है कि अजीत डोभाल को मैदान में उतारा गया। सवाल यह भी उछला कि दिल्ली चुनावों के दौरान घर-घर पर्चा बांटने वाले गृहमंत्री दंगों के बीच लोगों के बीच क्यों नहीं गए। हालांकि यह सवाल ही बेमानी है, क्योंकि आज के दौर में जिस तरह का माहौल है, दुनिया में कहीं का भी राष्ट्राध्यक्ष, शासनाध्यक्ष या वैसा ही दूसरा जिम्मेदार व्यक्ति दंगाइयों के बीच नहीं उतर सकता। आज दंगाइयों की मानसिकता और हथियार दोनों बदल गए हैं। रही बात अमित शाह और मोदी के बीच मतभेदों की तो इसका जवाब अजित डोभाल ने खुद ही दिया। अजित डोभाल ने कहा कि वे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की सलाह पर लोगों के बीच आए हैं। सवाल तो यह भी उठता है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम मैदान में क्यों नहीं उतरी?

बात केजरीवाल की हो रही है तो उनके ही पार्षद ताहिर हुसैन का नाम आना स्वाभाविक है। दंगों का मास्टरमाइंड उसे ही माना जा रहा है। ताहिर के बारे में कहा जा रहा है कि दंगे वाले दिन उसने पचास बार आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान से बात की। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया से अठारह और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से नौ बार बात की। हकीकत यह है कि उसके घर की छत से भारी संख्या सल्फ्यूरिक एसिड, पेट्रोल बम और पत्थर पाए गए। कहा तो यहां तक जा रहा है कि उसके यहां से एक किशोर बच्ची के कपड़े और उसकी लाश नाले में पाई गई। सवाल यह है कि ताहिर ने इतनी तैयारी की तो दिल्ली का खुफिया तंत्र क्या करता रहा है और दंगे वाले दिन उसने अपने तीन नेताओं से इतनी लंबी बातें क्या की? जब आम आदमी पार्टी ने ताहिर को निलंबित किया तो उसके ठीक नौ मिनट बाद अमानतुल्लाह खान ने उसे निर्दोष बताने वाला ट्वीट कर दिया। ताहिर को निर्दोष बताने की कोशिश में तो जावेद अख्तर भी शामिल हो गए। ताहिर हुसैन को मुसलमान और पीड़ित बताकर उसे बचाने की कोशिश हो रही है।

दंगों को भड़काने के लिए मीडिया और राजनीति के एक वर्ग ने बीजेपी के नेता कपिल मिश्र को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन लोग यह भूल गए कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस ने संविधान बचाओ के नाम से जो रैली की थी, उसमें खुद सोनिया गांधी ने लोगों से कहा था कि अब आर-पार का वक्त है और घरों से लोगों को निकलना होगा। वैसे भी नागरिता संशोधन कानून को संसद से 13 दिसंबर को राज्यसभा से मंजूरी मिली। 14 दिसंबर को दिल्ली के जामिया इलाके में ओखला के विधायक अमानतुल्लाह खान ने विरोध प्रदर्शन किया और वह हिंसक हुआ। शाहीन बाग में कुछ विपक्षी दलों की शह पर महिलाएं इस कानून को रद्द करने के लिए धरने पर बैठीं। जाफराबाद में भी फरवरी में महिलाएं धरने पर बैठीं, उसके खिलाफ कपिल मिश्रा ने प्रदर्शन किया। इसके बाद ही दंगों की रणनीति बनी। शाहीन बाग को चाहे जितना भी शांत और प्रभावी आंदोलन बताया जाए, लेकिन एक बात तय है कि 1984 के बाद के दिल्ली के सबसे भयावह दंगों की कालिख इस आंदोलन पर लग चुकी है।

बहरहाल दिल्ली पुलिस की दो टीमें दंगों की जांच कर रही है। दंगों के असल दोषियों को जांच टीम सामने लाने में कामयाब रहेगी। यह भी सच है कि दिल्ली के दंगों को लेकर जिन राजनीतिक दलों में सवाल उठे हैं, उनके दामन पर लगी कालिख को कोई भी रिपोर्ट साफ नहीं कर पाएगी।

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