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आर्थिक जीवन से जुड़े इन तथ्यों पर भी बहस हो

सामाजिक-राजनीतिक जीवन के विरोधाभासों से प्राय: हमारा सामना होता रहा है

आर्थिक जीवन से जुड़े इन तथ्यों पर भी बहस हो

सामाजिक-राजनीतिक जीवन के विरोधाभासों से प्राय: हमारा सामना होता रहा है और उन पर चर्चा भी होती रही है, परंतु अब आर्थिक जीवन में भी विरोधाभास खुलकर सामने आ रहे हैं। दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवेलपमेंट (आईएचडी) के ‘दी इंडिया लेबर एंड इंप्लॉयमेंट रिपोर्ट-2014’ में यह बात सामने आई है कि वर्ष 2011-12 में देश की आधी से अधिक (58.50 फीसदी) कामकाजी आबादी की आय प्रतिदिन दो डॉलर से कम थी।

अर्थात उनकी आमदनी गरीबी की मानक रेखा से कम रही। संस्था ने नेशनल सैंपल सर्वे के एक दशक के आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है। अध्ययन दिखाता है कि देश में रोजगार से होने वाली आय भी गरीबी की एक बड़ी वजह है। ये आंकड़े इस बात की ओर भी इशारा कर रहे हैं कि देश में पढ़े-लिखे लोगों के लायक नौकरियों का सृजन नहीं हो पा रहा है। साथ ही हमारी शिक्षा प्रणाली उस स्तर की नहीं है, जिसे ग्रहण करने के बाद डिग्रीधारी गुणवत्तापूर्ण कामकाज की तलाश कर सकें। अधिकतर पढ़े-लिखे युवा कम आय वाली नौकरी करने को विवश हैं।

इस प्रकार ये आंकड़े भारतीयों के कामकाज की गुणवत्ता से जुड़े गंभीर प्रश्न की ओर इशारा कर रहे हैं। प्राय: किसी देश में ऐसी स्थिति तभी उत्पन्न होती है जब उसकी कामकाजी आबादी का शैक्षणिक और कौशल स्तर निम्न होते हैं। गत दिनों ही र्शम मंत्रालय के एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई थी कि देश में उच्च शिक्षा के प्रसार के साथ ही स्नातकों में बेरोजगारी बढ़ी है। अर्थात उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में बेरोजगारी दर, निरक्षरों की तुलना में ज्यादा है।

सर्वेक्षण के अनुसार स्नातक या स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्राप्त कर चुके हर तीन नौजवान (15-25 आयुवर्ग) में एक बेरोजगार है, जबकि इसी आयु वर्ग के अनपढ़ व्यक्तियों में बेरोजगारी की दर सबसे कम (3.7 फीसदी) है। अभी देश में तीन में से एक कामगार निरक्षर है, वहीं प्रत्येक दो में से एक महिला कामगार पढ़ी-लिखी नहीं है। रोजगार से कम आय होने की एक वजह यह भी हैकि हम शिक्षितों के लायक रोजागार का सृजन नहीं कर पा रहे हैं और जब कम पढ़े-लिखे व अकुशल लोगों को रोजगार ज्यादा मिला हुआ है तो जाहिर है उनकी आय भी उनकी योग्यता के अनुसार होगी।

लिहाजा कुछ बुनियादी पहल करनी होगी। निरक्षर कामकाजी लोगों को उचित प्रशिक्षण देनी चाहिए। युवाओं को कौशल आधारित शिक्षा के प्रावधान होने चाहिए। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में उद्योगों की मांग के अनुसार बदलाव करनी चाहिए, परंतु इन मामलों में हमारा अभी तक का रिकॉर्ड ठीक नहीं है। वहीं देश में उच्च शिक्षा के स्तर पर भी गुणवत्ता का व्यापक अभाव है और मौजूदा प्रणाली रोजगार की नयी स्थितियों के अनुरूप स्नातक तैयार कर पाने में एक हद तक असफल साबित हो रही है। हम भारत हो आर्थिक महाशक्ति बनाने की बात भले ही कर रहे है परंतु यह बुनियादी तौर पर रोजगारविहीन विकास की स्थिति है। चुनावी माहौल में ये दोनों आंकड़े भले ही बहस का मुद्दा न बन पाएं, लेकिन यह हमारी नीतिगत खामियों को उजागर कर रहे हैं।

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