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मायावती के इस्तीफे से दलित राजनीति को मिलेगी नई धार!

मायावती ने यह नाटक दलित राजनीति को उकसाने के लिए किया है।

मायावती के इस्तीफे से दलित राजनीति को मिलेगी नई धार!

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने राज्यसभा में आक्रामक भाषण देने के साथ राज्यसभा की सदस्यता से तीन पृष्ठीय इस्तीफा दे दिया। त्याग-पत्र देकर उन्होंने यह जताने की कोशिश की है कि वह अब अपनी छीज रही दलित राजनीति को नई धार देंगी। दरअसल राष्ट्रपति चुनाव के प्रत्याशियों को लेकर जिस तरह से राजग और सप्रंग गठबंधनों ने दलित राजनीति का खेल खेला है, उसमें मायावती की मुट्ठी से दलित नेतृत्व रेत की मानिंद फिसलता अनुभव हो रहा है।

इस लिहाज से दलित उत्पीड़न तो एक बहाना है, दरअसल इस बूते वह अपनी गिरती राजनीतिक हैसियत उभारना चाहती हैं, इसीलिए जब उन्हें तीन मिनट बोलने के बाद राज्यसभा के उपसभापति पीजे कुरियन ने घंटी बजाकर टोका तो वह बिफर पड़ीं और कहा कि ‘अगर मैं सदन में दलितों के हितों की बात नहीं उठा सकती तो मुझे सदन में रहने का कोई अधिकार नहीं है। मैं सदन की सदस्यता से आज इस्तीफा दे रही हूं।‘

मायावती ने यह नाटक दलित राजनीति को उकसाने के लिए किया है, लेकिन हकीकत में यह है खीझ और गुस्सा उनकी कुंठा का नतीजा है। दरअसल मायवती का राज्यसभा में कार्यकाल अप्रैल 2018 में समाप्त हो रहा है। 403 सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में उनके पास सिर्फ 19 विधायक हैं। इनके बूते वह फिर से राज्यसभा की सदस्य नहीं चुनी जा सकती हैं। इस कारण इस्तीफे की यह पहल दलितों के मुद्दे पर शहादत दिखाने की रणनीति दिख रही है।

हालांकि उन्होंने जो तीन पृष्ठीय इस्तीफा दिया है, उसमें भी एक पेंच है। दरअसल नियमानुसार सदन में त्याग-पत्र केवल एक वाक्य में देने का प्रावधान है, लेकिन मायावती ने सोची-समझी कुटिल रणनीति के तहत तीन पृष्ठीय इस्तीफा इसलिए दिया है, जिससे उपसभापति इसे खारिज करने को विवश हो जाएं। ऐसा इसलिए भी उन्होंने किया है कि वे सत्ता में बने रहने के लिए इतने बेमेल गठबंधन करके इतनी साख दलित व अन्य समाजों में गंवा चुकी हैं कि अब उनके पास खोने को बहुत ज्यादा कुछ रह ही नहीं गया है।

यह लोकतंत्र की ही महिमा है कि देश का कोई भी दलित नागरिक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न देख सकता है। संविधान में प्रदत्त ऐस प्रावधानों के चलते आम आदमी सक्रिय राजनीति में बढ़-चढ़कर भागीदारी कर रहा है। वह समाज और राजनीति मे ंनए परिवर्तन लाने का माद्दा भी रखता है। अलबत्ता यहां संकट वह नेतृत्व है, जो जन-आकांक्षाओं पर खरा उतरने की बजाय स्वयं की आकांक्षा पूर्ति की जल्दबाजी में अपना धीरज खो देता है।

परिणामस्वरूप वास्तविक दायित्व को नजरअंदाज कर असमाजिक तत्वों के अनैतिक गठजोड़ की गोद में जा बैठता है। अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह मायावती ने भी यही किया, वे बहुजन के उभार से मिली उस शक्ति को आत्मसात नहीं कर पाईं, जो राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के बाद तीसरे अखिल भारतीय दल के रूप में राष्ट्रीय विकल्प बन सकता था? इसी विकल्प की केंद्रीय धुरी से दलित प्रधानमंत्री अवतरित होता?

इस जनभावना को आत्मसात करने के लिए मायावती को कांशीराम से विरासत में मिली बहुजन हितकारी विचारधारा को ईमानदारी से धरातल पर क्रियान्वित करने की जरूरत थी, लेकिन वे असफल रहीं। अंबेडकर ने दलितों को संवैधानिक अधिकार दिए। कांशीराम ने इन अधिकारों के प्रति आंदोलनरत रहते हुए चेतना जगाई, किंतु मायावती ने इन्हें भुनाकर केवल सत्ता हथियाने का काम किया।

अपने हितों पर चोट न पहुंचे, इसलिए उन्होंने पार्टी का न तो संगठनात्मक ढांचा खड़ा किया और न ही नया दलित नेतृत्व उभरने दिया। उद्यानों पर खर्च की गई धन राशि को यदि बंुदेलखंड की गरीबी दूर करने अथवा दलितों के लिए उत्कृष्ट विद्यालय व अस्पताल खोलने में खर्च की गई होती तो एक तरफ खेती-किसानी की माली हालत निखरती तो दूसरी तरफ वंचितों को निशुल्क शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएं मिलती, किंतु मायावती की अब तक की कार्य संस्कृति में मानक व आदर्श उपायों का सर्वथा अभाव रहा।

इसके उलट सवर्ण और पिछड़ों को लुभाने के लिहाज से मुख्यमंत्री रहते हुए ऐसे 22 कानून शिथिल किए थे, जो उत्तर-प्रदेश अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत आते थे। आरक्षण की सुविधा के चलते चिकित्सा और उच्च तकीनीकी संस्थानों में प्रवेश पा लेने वाले दलित छात्रों का जातीय और अंग्रेजी में पारंगत न होने के कारण उत्पीड़न झेलना पड़ रहा है।

नतीजतन छात्र लगातार आत्महत्याएं कर रहे हैं। इसके अलावा देश में 13 लाख से भी ज्यादा दलित महिलाएं सिर पर मैला ढोने के काम में लगी हैं, लेकिन मायावती ने कभी इस समस्या से निजात के लिए राज्यसभा में हुंकार भरी हो, कानों में गूंजी नहीं? बहुजन समाजवादी पार्टी को वजूद में लाने से पहले कांशीराम ने लंबे समय तक दलितों के हितों की मुहिम डीएस-4 के माध्यम से लड़ी थी।

कांशीराम के वैचारिक दर्शन में अंबेडकर से आगे जाने की सोच तो थी। यही कारण रहा कि बसपा दलित संगठन के रूप में सामने आई, लेकिन मायावती की धन व पद लोलुपता ने बसपा के बुनियादी सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ किया।

नतीजतन कालांतर में बसपा सवर्ण और दलित तथा शोषक और शोषितों का बेमेल समीकरण बिठाने में लगी रही। बसपा के इन संस्करणों में कार्यकर्ताओं की भूमिका नगण्य रही। ऐसी ही कुछ अन्य वजहें हैं कि मायावती ने उन को महत्व नहीं दिया जो सामाजिक विषमताएं दूर करने वाली साबित होतीं।

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