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सशक्त और समर्थ न्याय तंत्र समय की मांग

एक सशक्त और समर्थ न्यायपालिका ही एक समृद्ध लोकतंत्र का निर्माण कर सकती है।

सशक्त और समर्थ न्याय तंत्र समय की मांग
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एक सशक्त और समर्थ न्यायपालिका ही एक समृद्ध लोकतंत्र का निर्माण कर सकती है। यदि इसमें कोई खामी आ जाए तो लोकतंत्र के दूसरे अंग भी ठीक से काम नहीं करते हैं। भारतीय न्यायिक तंत्र में भी समय के साथ तमाम ऐसी कमियां आ गई हैं, जिसे समय रहते सुधारने की जरूरत है। इन खामियों के प्रभाव दिन प्रतिदिन के न्यायिक कार्यों में भी देखे जा रहे हैं। आज न्याय तंत्र में सबसे बड़ी खामी न्याय मिलने में देरी है। मामलों की धीमी सुनवाई का आलम ऐसा हैकि लोगों को बीस-तीस साल तक न्याय के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। देश में अलग-अलग अदालतों में करीब तीन करोड़ केस लंबित हैं। इनके त्वरित निपटारे की जरूरत है, क्योंकि न्याय में देरी का मतलब एक तरह से अन्याय ही है।

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न्यायपालिका के मुकदमों के बोझ से दबने की एक बड़ी वजह जरूरी संसाधनों का अभाव है। जिस कदर मामलों में इजाफा हो रहा है, उस अनुपात में इसके पास जज, अदालत, अभियोजन आदि जरूरी संसाधन नहीं हैं। इस कमी को जितनी जल्दी हो सके पूरी करनी चाहिए। हालांकि तमाम खामियों-कमियों के बावजूद लोगों का न्यायिक व्यवस्था में विश्वास है। आम आदमी निराशा में जजों की ओर देखता है। न्याय व्यवस्था ने लोगों में अपनी जगह खुद बनाई है। इस भरोसे को और कैसे मजबूत किया जाए उस पर विचार करने के लिए मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में देश के जज और मुख्यमंत्री मंथन कर रहे हैं। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी न्यायिक सुधार की दिशा में कई अहम सुझाव दिए हैं।

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आज आपराधिक गतिविधियों का विस्तार होने लगा है। आर्थिक व साइबर आदि नए किस्म के अपराध के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। जाहिर है, न्यायपालिका को भी इन क्षेत्रों में विशेष दक्षता की दरकार है। इसके लिए देश में नए संस्थान खड़ा करने की जरूरत है, जहां इन उभरते क्षेत्रों की बारीकियों से जज भी अवगत हो सकें। वहीं मामलों को तेजी से निपटाने के लिए लोक अदालत की व्यवस्था पर बल देने की जरूरत है। देश में ट्रिब्युनल व्यवस्था की भी समीक्षा करने और कानून के ड्राफ्टिंग के लिए अलग से मैन पावर खड़ा करने का जरूरत है, क्योंकि ट्रिब्युनल व्यवस्था से चीजें सुलझने की बजाय उलझती प्रतीत हो रही हैं। कानूनी शब्दों की परिभाषा को लेकर विधायिका व न्यायपलिका के कई बार आमने-सामने आ जाने से अवरोध पैदा होता है। वहीं मोदी सत्ता में आने के बाद से ही गैरजरूरी कानूनों को खत्म करने पर जोर देते रहे हैं। कानून जितने सरल होंगे, उतना बेहतर होगा।

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आज देश तेजी से विकास कर रहा है। आने वाले कुछ सालों में भारत की जीडीपी दस फीसदी की दर से बढ़ेगी। हम दुनिया में एक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर हैं। ऐसे में देश में एक सशक्त व गतिमान न्यायिक तंत्र की दरकार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिन सुधारों की ओर ध्यान दिलाया है उन पर काम करने की जरूरत है। हालांकि उनकी सरकार इस दिशा में काम कर भी रही है। इस सरकार से लोगों की अपेक्षाएं हैं, खासकर नरेंद्र मोदी से। इसीलिए अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ न्यायपालिका में सुधार की प्रक्रिया तेज कर देनी चाहिए, तभी देश में एक सशक्त और समर्थ न्यायिक व्यवस्था का सपना पूरा होगा।

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