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प्रमोद जोशी का लेख: कोरोना युद्ध के सबक

हमारी व्यवस्था नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड देशों जैसी कल्याणकारी और पारदर्शी नहीं है। अमेरिका और यूरोप जैसी साधन-संपन्न भी नहीं। चीन जैसी तानाशाही भी नहीं। कोरोना-दौर में अपनी व्यवस्था के प्रदर्शन का ठंडे दिमाग से विवेचन करें तो अनेक रोचक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। इस दौरान क्रूर और मन को विचलित करने वाले परिदृश्य देखने को मिले हैं, तो मानवीय धरातल पर आश्वस्त करने वाले भी। कहते हैं कि युद्ध केवल तबाही छोड़कर जाते हैं। यह देखने का तरीका है। वस्तुतः युद्ध का एक और पहलू भी है। हम हर क्षण लड़ते हैं। युद्ध आसुरी और अमानवीय शक्तियों के खिलाफ लड़ा जाता है। कोरोना एक प्रतीक है, जो हमसे कहकर गया है, न दैन्यं, न पलायनं।

प्रमोद जोशी का लेख:  कोरोना युद्ध के सबक

प्रमोद जोशी

लॉकडाउन दो हफ्ते के लिए बढ़ा दिया गया। या आप कह सकते हैं कि हटा लिया गया, पर कोरोना वायरस के कारण देश के अलग-अलग इलाकों में प्रतिबंध लगाए गए हैं। सिर्फ समझने की बात है कि गिलास आधा भरा है या आधा खाली है। कोरोना के खिलाफ वैश्विक लड़ाई को देखें तो वहां भी यही बात लागू होती है। सवाल है कि क्या हम हालात से निराश हैं? कत्तई नहीं। यह नई चुनौती है, जिस पर हमें जीत हासिल करनी है। हमारे पास आशा या निराशा के विकल्प नहीं हैं। सकारात्मक सोच अकेला एक विकल्प है।

वैश्विक दृष्टि से हटकर देखें तो भारत से संदर्भ में हमारे पास संतोष के अनेक कारण हैं। चीन को अलग कर दें तो शेष विश्व में करीब 34 लाख लोग कोरोना के शिकार हुए हैं। इनमें से दो लाख 40 हजार के आसपास लोगों की मौत हुई है। इस दौरान भारत में करीब 37 हजार लोगो कोरोना के शिकार हुए हैं और 1200 के आसपास लोगों की इसके कारण मृत्यु हुई है। एक भी व्यक्ति की मौत दुखदायी है, पर तुलना करें। भारत की आबादी करीब एक अरब 30 करोड़ है, जिसमें 37 हजार को यह बीमारी लगी है। समूचे यूरोप और अमेरिका की आबादी भारत से कम ही होगी, पर बीमार होने वालों और मरने वालों की संख्या का अंतर आप देख सकते हैं।

इस अंतर के अनेक कारण हैं। कुछ लोग कहते हैं कि अमेरिका और यूरोप में टेस्ट ज्यादा होते हैं। भारत में कम होते हैं। हो सकता है कि बीमारों की संख्या ज्यादा हो। यह तर्क भी पक्का नहीं है। यह तर्क तीन-चार हफ्ते पहले उछाला गया था। तब भारत में प्रति 10 लाख लोगों में करीब सवा सौ टेस्ट हो रहे थे। शनिवार की सुबह यह औसत 654 था। यह भारत का औसत है, दिल्ली में तो यह 2400 के आसपास है। हम जब औसत निकालते हैं तो समूचे भारत की जनसंख्या के आधार पर निकालते हैं, जबकि देश के एक बड़े इलाके में वायरस का प्रभाव है ही नहीं। यकीनन हमारे पास साधन कम हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है, पैसा नहीं है। पर जज्बा तो है। थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि काफी लोग और बीमार हुए हैं, जिनकी संख्या आधिकारिक आंकड़ों में शामिल नहीं हैं। तब उनका हो क्या रहा है? क्या वे अपने आप ठीक हो जा रहे हैं? बड़ी संख्या में मौतें होने की खबरें तो हैं नहीं। अस्पतालों, श्मशानों और कब्रिस्तानों में भीड़ तो नहीं लगी है। यकीनन हमने इस लड़ाई को बेहतर तरीके से लड़ा है। हमें अपनी व्यवस्थाओं से शिकायत है, पर इस अपने योद्धाओं पर गर्व भी है।

कोरोना के खिलाफ देश की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण पहलू है, करोड़ों प्रवासी कामगारों की जिंदगी। उनके सामने केवल बीमारी का खतरा नहीं है। उनके सामने रोजी-रोजगार और रोटी की समस्या है। शुक्रवार को मई दिवस था। यह कहा जा रहा था कि इस बार के मई दिवस पर देश का मजदूर परेशान है। महानगरों में, राजमार्गों और सरकारी कैम्पों में लाखों की तादाद में प्रवासी कामगार अपने घर जाने का इंतजार कर रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग पैदल ही चल निकले हैं। शुक्रवार को अचानक खबर आई कि तेलंगाना के लिंगमपल्ली स्टेशन से सुबह के पांच बजे 1200 प्रवासी कामगारों को लेकर स्पेशल ट्रेन हटिया के लिए रवाना हो गई है।

लिंगमपल्ली के अलावा केरल के अलुवा से भुवनेश्वर, महाराष्ट्र के नाशिक से लखनऊ और भोपाल, जयपुर से पटना और कोटा से हटिया ट्रेनें चलने की खबर भी आई। अगले कुछ दिनों में ऐसी अनेक ट्रेनें चलने वाली हैं। ये नॉन स्टॉप गाड़ियां हैं। प्रशासन ने इन गाड़ियों की योजना बनाकर उन्हें चलाने के बाद घोषणा की है। इसके दो अर्थ हैं। पहले से घोषणा करने पर भारी भीड़ उमड़ने का खतरा था। इन ट्रेनों में सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करना होगा। जिस डिब्बे में 72 यात्री बैठते हैं उसमें 54 बैठेंगे। रास्ते में इन्हें भोजन और पानी भी दिया जाएगा। टिकट का पैसा राज्य सरकारें देंगी। इन गाड़ियों के अलावा बसें भी चलाई जा रही हैं।

करीब चालीस दिन से ठहरे हुए जीवन को फिर से ढर्रे पर वापस लाना भी आसान नहीं है। कोरोना वायरस कहीं चला नहीं जाएगा। हमें उसका सामना करना है, पर उसके लिए नई जीवन शैली को अपनाना होगा। इसके लिए जीवन में नए किस्म के अनुशासन की जरूरत है। सोमवार से गतिविधियां बढ़ेंगी। श्रमिकों की विशेष रेलगाड़ियां चली हैं, तो फिर सामान्य गाड़ियां भी चलेंगी। उसका यह पूर्वाभ्यास है। अभी सामान्य अंतर राज्य परिवहन शुरू नहीं हुआ है। वह भी होगा। हवाई सेवाएं भी शुरू होंगी। बाजार खुलेंगे, डाक सेवा शुरू होगी, ऑनलाइन कारोबार शुरू होगा। सब कुछ स्थगित करना आसान था, उसे फिर से शुरू करना इतना आसान नहीं है, वह भी ऐसे समय में जब बीमारी का खतरा सिर पर है।

यह कोरोना-दौर हमें प्रशासनिक, कारोबारी और स्वास्थ्य से जुड़े कई तरह के सबक सिखा गया है। इतने बड़े देश का संचालन आसान नहीं है। वह भी ऐसे देश का संचालन, जहां की व्यवस्था चीन की तरह बंद नहीं है। यहां एक स्वतंत्र मीडिया और राजनीतिक व्यवस्था है। व्यवस्थापिका पर नजर रखने वाली न्यायपालिका है। नागरिकों के पास जानकारी पाने का अधिकार है। इन सारी बातों के राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। अंततः राजनीतिक दलों को अपने वोटर के पास जाना है। उस पर गलत-सलत सूचनाओं का एक फेकतंत्र भी सक्रिय है, जिसके भी स्वार्थ हैं।

हमारी व्यवस्था नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों जैसी कल्याणकारी और पारदर्शी नहीं है। अमेरिका और यूरोप जैसी साधन-संपन्न भी नहीं। चीन जैसी तानाशाही भी नहीं। पर अपेक्षाएं टॉप क्लास हैं। कोरोना-दौर में अपनी व्यवस्था के प्रदर्शन का ठंडे दिमाग से विवेचन करें, तो अनेक रोचक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। इस दौरान क्रूर और मन को विचलित करने वाले परिदृश्य देखने को मिले हैं, तो मानवीय धरातल पर आश्वस्त करने वाले भी। कहते हैं कि युद्ध केवल तबाही छोड़कर जाते हैं। यह भी देखने का एक तरीका है। वस्तुतः युद्ध का एक और पहलू भी है। हम हर क्षण लड़ते हैं। युद्ध आसुरी और अमानवीय शक्तियों के खिलाफ लड़ा जाता है। कोरोना एक प्रतीक है, जो हमसे कहकर गया है, न दैन्यं, न पलायनं।

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