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नीलम महाजन सिंह : कांग्रेस का आत्मघाती फैसला

राजनीतिक रूप से आजकल कांग्रेस 'पार्टी इन क्राइसिस' बन गई है। कर्नाटक में कांग्रेस गठबंधन नहीं निभा सकी और सत्ता चली गई। मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह के चक्कर में कांग्रेस की बनी बनाई सरकार चली गई। राजस्थान में कांग्रेस के अंदर कलह जगजाहिर है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस लड़ी ही नहीं। बिहार में भी कांग्रेस के अंदर खींचतान जारी है। असम में कांग्रेस के पास मौका था, पर अपनी कमजोरियों की वजह से हार गई। ले-देकर छत्तसीगढ़ के बाद पंजाब एक ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस मजबूत हुई, वह भी कैप्टन अमरिंदर सिंह के सियासी बूते। पंजाब में कैप्टन को दरकिनार कर कांग्रेस ने आत्मघाती फैसला कर साबित किया है कि जीत की रणनीति बनाने में वह कितनी कच्ची है।

नीलम महाजन सिंह : कांग्रेस का आत्मघाती फैसला
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नीलम महाजन सिंह 

नीलम महाजन सिंह

जीती बाजी कैसे हारी जाती है, यह कांग्रेस से सीखना चाहिए। पंजाब में कांग्रेस ने आत्मघाती फैसला कर साबित किया है कि जीत की रणनीति बनाने में वह कितनी कच्ची है। पंजाब में कांग्रेस की बनी बनाई जमीन को केवल एक 'राहुल' फैसले से ध्वस्त कर दिया गया है। अब राजनीति के जानकारों को अच्छे से समझ आ रहा है कि सियासी ट्रैक पर कांग्रेस क्यों दिनोंदिन डिरेल होती जा रही है। पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को अनदेखा करते हुए कांग्रेस की कमान राजनीतिक रूप से अस्थिर व्यक्तित्व के बड़बोले नेता नवजोत सिंह सिद्धू को देकर कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी राजनीतिक अदूरदर्शिता का ही परिचय दिया है। 1984 के घटनाक्रम के बाद पंजाब कांग्रेस में जान फूंकने वाले और 2017 में जब पूरे देश में कांग्रेस का सफाया हो गया था, तब पंजाब में अपने बूते पर कांग्रेस की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ पार्टी हाईकमान ने मौजूदा मामले में जैसा सलूक किया है, वह किसी भी सम्मानित नेता के लिए नागवार गुजरने वाला है। कैप्टन अमरिंदर सिंह अलग राह अपना लें तो कोई भारी बात नहीं। कैप्टन अपने दम पर बाजी पलटने वाले नेता हैं और भाजपा बहुत करीब से पंजाब कांग्रेस की राजनीति को देख रही है। पीएम नरेंद्र मोदी व कैप्टन अमरिंदर सिंह की दोस्ती जगजाहिर है। अगले साल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को यह फैसला भारी पड़ने वाला है।

कैप्टन के पक्ष में गत रविवार को दस विधायकों ने हाईकमान से आग्रह किया था कि पार्टी कैप्टन को अनदेखा न करे व सिद्धू जब तक कैप्टन से सार्वजनिक तौर पर माफी नहीं मांगते तब तक उनकी नियुक्ति का एलान न किया जाए। लेकिन हाईकमान ने कैप्टन खेमे की कोई बात नहीं सुनी और देर शाम सिद्धू की नियुक्ति का पत्र जारी कर दिया गया। कैप्टन ने हाईकमान के फैसले का सम्मान करते हुए सिद्धू को प्रधान बनाने पर सहमति जता दी थी और एक मामूली शर्त यही रखी थी कि सिद्धू उन पर की गई अभद्र टिप्पणियों के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी मांगें, तभी वे सिद्धू से बात करेंगे। कैप्टन और सिद्धू के कद का अंतर समझें तो यह शर्त बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन हाईकमान ने कैप्टन को बहुत ही हल्के में लिया है। अब जहां तक कैप्टन की जैसी सियासी शख्सियत है, उसमें उन्हें सिद्धू किसी भी कीमत पर पार्टी अध्यक्ष के रूप में मंजूर नहीं होगा। कांग्रेस हाईकमान के अपने प्रति इस बर्ताव को कैप्टन अपने अपमान के रूप में ले सकते हैं।

कांग्रेस ने न सिर्फ सिद्धू को बहुत ज्यादा तरजीह दे दी है, बल्कि अब तक प्रदेश कांग्रेस की बागडोर संभाल रहे नेताओं को सिरे से दरकिनार कर दिया है। हाईकमान ने सिद्धू के साथ जिन नेताओं को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है, वे भी सिद्धू के पक्षधर रहे हैं। ये हैं कुलजीत नागरा, पवन गोयल, सुखविंदर सिंह डैनी और संगत सिंह। इस तरह प्रदेश कांग्रेस में अब कैप्टन और पुराने कांग्रेसियों का दबदबा खत्म सा हो गया है। ताजा घटनाक्रम के बाद पंजाब कांग्रेस के अनेक विधायकों की मानें तो पार्टी हाईकमान ने 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के सारे दरवाजे बंद कर लिए हैं। इन विधायकों का मानना है कि पंजाब में कांग्रेस का एकमात्र चेहरा कैप्टन अमरिंदर सिंह ही हैं और उनके नेतृत्व में ही कांग्रेस अगले चुनाव में पूरे विश्वास के साथ उतर कर जीत हासिल कर सकती थी। विधायकों का यह भी कहना है कि सिद्धू प्रकरण के कारण राज्य कांग्रेस की जो छिछालेदार आम जनता के बीच अब तक हो चुकी थी, उसे भी कैप्टन ही सुधार सकते थे, लेकिन नवजोत सिद्धू को कमान सौंपकर हाईकमान ने पार्टी को पटरी से उतार दिया है। दशकों से पंजाब में कांग्रेस के लिए तन-मन से समर्पित रहे नेता आलाकमान के इस फैसले के बाद खुद को ठगा महसूस कर रहे होंगे।

राजनीतिक रूप से आजकल कांग्रेस 'पार्टी इन क्राइसिस' बन गई है। कर्नाटक में कांग्रेस गठबंधन नहीं निभा सकी और सत्ता चली गई। मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह के चक्कर में कांग्रेस की बनी बनाई सरकार चली गई। राजस्थान में कांग्रेस के अंदर कलह जगजाहिर है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस लड़ी ही नहीं। बिहार में भी कांग्रेस के अंदर खींचतान जारी है। असम में कांग्रेस के पास मौका था, पर अपनी कमजोरियों की वजह से हार गई। ले-देकर छत्तसीगढ़ के बाद पंजाब एक ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस मजबूत हुई, वह भी कैप्टन अमरिंदर सिंह के सियासी बूते। 2014 के लोकसभा चुनावों में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अमृतसर में भाजपा के भारी भरकम नेता अरुण जेटली को करारी शिकस्त दी। पंजाब के 17वें सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह पटियाला राजपरिवार से हैं, वे इंदिरा गांधी के समय से ही कांग्रेस के वफादार राजनीतिज्ञ हैं। कैप्टन अमरिंदर पूर्व पीएम राजीव गांधी के साथ डून स्कूल में सीनियर थे। ऐसा कोई भी उदाहरण नहीं है, जब कांग्रेस के राजनैतिक संकट में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पी.वी. नरसिम्हा राव, सोनिया गांधी, डा. मनमोहन सिंह समेत सभी नेताओं को पूर्ण सहयोग न दिया हो। पार्टी के प्रति वफादारी का यह सिला तो नहीं होना चाहिए था। अमरिंदर खुद इसे अपना आखिरी चुनाव कह चुके थे, कांग्रेस उन्हें सम्मानजनक विदाई दे सकती थी। 2022 विस के चुनाव की कमान देकर। उसके बाद अगर किसी नेता को कांग्रेस कमान सौंपती तो उसे कैप्टन की जनाधार विरासत हासिल होती। किसान आंदोलन में जिस प्रकार कैप्टन ने सूझबूझ से पंजाब में कांग्रेस की सियासी जमीन मजबूत की थी, उसमें कांग्रेस को ही लाभ होता। अभी प्रताप सिंह बाजवा, सुनील जाखड़, मनप्रीत बादल राणा गुरमीत सिंह, ब्रह्म मोहिंद्रा, ओम प्रकाश सोनी, चरण जीत सिंह चन्नी समेत अनेक दिग्गज वरिष्ठ कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ हैं। कैप्टन को 'पिपलज़ कैप्टन' उनकी जन मानस में लोकप्रियता के कारण कहा जाता है। यह भी स्मरणीय है कि मार्च 2021 में पंचायत और जिला परिषद चुनावों में कांग्रेस को, कैप्टन की अध्यक्षता में ही दो-तिहाई से पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। पंजाब कांग्रेस में नया नेतृत्व 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद तैयार करना चाहिए था।

अकाली नेता सुखबीर बादल ने सिद्धू को 'मिसगाइडेड मिसाइल' कहा था। कांग्रेस को यह बात समझनी चाहिए थी। सिद्धू को लेकर भाजपा भी 'कम्फोर्ट ज़ोन' में नहीं थी। 2017 में ही तो सिद्धू ने कांग्रेस का हाथ पकड़ा है। पंजाब की जैसी राजनीति है, उसमें 'ठोको' नेता की सर्व स्वीकार्यता नहीं है। पंजाब संवेदनशील राज्य है, वहां ड्रग्स माफिया के साथ भारत विरोधी खालिस्तानी ताकतें भी एक्टिव हैं, ऐसे में पाक सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा संग मंच साझा करने वाले सिद्धू कांग्रेस की हानि कर सकते हैं। वे पंजाब में मंत्री के रूप में खास नहीं कर पाए हैं। पंजाब की जनता ने काम के आधार पर उन्हें नहीं देखा है। उनका समस्त पंजाब में जनाधार व जनसंपर्क नहीं है। उन्होंने कांग्रेस को संगठनात्मक मज़बूती देने का कोई कार्य नहीं किया है। 'सिक्सर सिद्धू' के रन आउट होने की संभावना प्रबल हो गई है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)

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