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निरंकार सिंह का लेख : खुद सवाल बन गई कांग्रेस

सरकार (Government) से सवाल पूछते-पूछते कांग्रेस खुद सवाल बन गई है। हालांकि देश की आजादी के बाद से ही जवाहरलाल नेहरू ने जो गलतियां की थीं, आज देश उनका खामियाजा भुगत रहा है। अपने 55 साल के शासनकाल में कांग्रेस पाकिस्तान और चीन से एक इंच भी जमीन वापस नहीं ले पाई। आज दुनिया में भारत की हैसियत (status) बढ़ी है और विश्व जनमत देश के साथ है। इसलिए डोकलाम के बाद दूसरी बार चीन को एलएसी से पीछे हटना पड़ा है तो काग्रेस नेता बेचैन हो रहे हंै।

निरंकार सिंह का लेख : खुद सवाल बन गई कांग्रेस
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कांग्रेस के कुछ नेताओं ने आज देश की राजनीति (Politics) को पतन की जिस पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया है उसकी कोई मिसाल नहीं मिलती है। सरकार से सवाल पूछते-पूछते कांग्रेस खुद सवाल बन गई है। हालांकि देश की आजादी के बाद से ही जवाहरलाल नेहरू ने जो गलतियां की थीं, आज देश उनका खामियाजा भुगत रहा है।

जम्मू कश्मीर में जब हमारी सेनाएं पाकिस्तानियों, कबिलाइयों को खदेड़ रही थी उसी समय नेहरू ने एकतरफा युद्ध (War) विराम की घोषणा कर दी और संयुक्त राष्ट्र में जाकर मामले को उलझा दिया। इसी तरह हमसे जुड़े तिब्बत पर चीन ने कब्जा कर किया। इसके बाद 1962 के चीन भारत युद्ध में लद्दाख के 38 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र पर चीन ने कब्जा कर लिया। नेहरू देखते ही रह गए।

अपने 55 साल के शासनकाल में कांग्रेस पाकिस्तान और चीन से एक इंच भी जमीन वापस नहीं ले पाई। आज दुनिया में भारत की हैसियत बढ़ी है और विश्व जनमत देश के साथ है। इसलिए डोकलाम के बाद दूसरी बार चीन को एलएसी से पीछे हटना पड़ा है तो काग्रेस नेता बेचैन हो रहे हंै।

देश आज जब चीन से कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर मुकाबला कर रहा है और दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं तो ऐसे नाजुक समय पर कांग्रेसी नेता सवाल पूछ रहे हैं। चीन की आलोचना करने की बजाय अपने ही देश की सरकार को घेरने में लगे हैं। इतना ही नहीं भारत की जमीन पर चीन के कब्जे का भी मिथ्या दुष्प्रचार कर रहे हैं। जबकि खुद वे किसी सवाल का जवाब नहीं देते हैं।

अपने लंबे शासनकाल में वह चीन भारत की सीमाएं भी नहीं तय नहीं कर पाए। पर आज वह चीन के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं। यह कोई पहला मौका नहीं है, जब कांग्रेस ने ऐसा किया है। भारत-चीन के बीच डोकलाम विवाद के समय भी जब दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी हुई थीं, तब भी राहुल गांधी गुपचुप चीनी राजदूत से मिलने पहुंच गए थे। उरी और बालाकोट एयर स्ट्राइक पर भी सवाल उठाकर कांग्रेस देश को शर्मसार कर चुकी है।

आजाद भारत के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल ने 1950 में ये चेतावनी दी थी कि चीन भारत के लिए बड़ी मुसीबत बनने जा रहा है। उन्होंने कहा था कि भारत को पाकिस्तान के अलावा चीन को लेकर भी सख्त रणनीति अपनाने की जरूरत है, लेकिन उनकी बात उस समय नेहरू ने नहीं सुनी। इसका सबसे बड़ा खामियाजा 1950 में तब उठाना जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया और फिर 1962 में चीन ने भारत को जंग के मैदान में शिकस्त दी।

पटेल ही नहीं, इसके दो साल पहले भारत में रह रहे सेना के जनरल ब्रिटेन ने भी कहा था कि चीन तिब्बत पर कब्जा करे, उसके पहले भारत को इस पठार पर कब्जा करने की तैयारी कर लेने की जरूरत है। उस समय तक भारत और तिब्बत का संबंध नई दिल्ली और ल्हासा के बीच हुए समझौतों से संचालित होता था। दलाई लामा उस समय 15 साल के थे। तिब्बत उत्तर में भारत को बड़ी सुरक्षा दे रहा था।

इतिहासकार केएम पणिक्कर उस समय चीन में भारत के राजदूत थे। मई में पणिक्कर को माओत्से तुंग से मिलने की अनुमति मिल गई। पणिक्कर ने पाया कि माओ सहृदय व्यक्ति हैं और उनके आंखों से करुणा झलकती है। उनकी आंखों और चेहरे पर कहीं कोई निर्दयता नहीं है। विदेश मंत्री के रूप में नेहरू के चीन के बारे में विचार और उनके प्रतिनिधि पणिक्कर की माओ से मुलाकात के महज 5 महीने बाद चीन ने तिब्बत पर धावा बोलकर कब्जा कर लिया।

नेहरू के प्रिय राजदूत को कब्जे की जानकारी तब मिली, जब ऑल इंडिया रेडियो ने समाचार दिया। हिन्दुओं सबसे बड़ा तीर्थस्थल कैलाश मानसरोवर भी तिब्बत में ही है। आठवीं शताब्दी तक यहां बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार शुरू हो चुका था। 19वीं शताब्दी तक तिब्बत ने अपनी स्वतंत्रता को बरकरार रखा था। लेकिन इस पर धोखे से चीन ने कब्जा कर लिया है। पटेल उस समय अहमदाबाद में थे और अपना 75वां जन्मदिन मना रहे थे।

उन्होंने अहमदाबाद में कहा कि चीन ने एक देश के खिलाफ आक्रामकता दिखाई है। कैबिनेट मंत्री सी राजगोपालाचारी और विदेश सचिव गिरिजा शंकर वाजपेयी भी चीन के खिलाफ थे। दिल्ली लौटने के बाद पटेल ने नेहरू को 7 नवंबर 1950 को खत लिखकर कहा, चीन ने हमें शांतिपूर्ण रुख दिखाकर धोखा दिया है। मेरे विचार से चीन की अंतिम कार्रवाई विश्वासघात है। इसमें त्रासद यह है कि तिब्बत हम पर पूरा भरोसा करता है। वह हमसे संचालित होते हैं। हम उन्हें चीन के प्रभाव से निकालने में पूरी तरह विफल हुए हैं।

पिछले दिनों देश को चौंकाने वाली बात मालूम हुई है। देश की सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल हुई है जिसमें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ कांग्रेस के समझौते को सार्वजनिक नहीं करने का मसला उठाते हुए उस समझौते की एनआईए या सीबीआई से जांच की मांग की गई है। यह याचिका वकील शशांक शेखर झा और पत्रकार आईआर रोड्रिग्स ने दाखिल की है।

याचिका में कांग्रेस पार्टी के अलावा सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी को भी प्रतिवादी बनाया गया है। याचिका में कहा गया है कि 07 अगस्त 2008 को यूपीए सरकार के कार्यकाल में कांग्रेस और सीपीसी के बीच बीजिंग में एक समझौता हुआ था जिसमें दोनों पक्षों के बीच उच्च स्तरीय इनफाॅरमेशन और कोआॅपरेशन एक्सचेंज का करार हुआ था। याचिका में कहा गया है कि चीन के साथ खराब रिश्ते होने के बावजूद कांग्रेस ने गठबंधन सरकार में रहने के दौरान यह समझौता साइन किया था।

चूंकि सूचना कानून राजनीतिक पार्टी पर लागू नहीं होता इसलिए समझौते की जांच एनआईए से करवाई जाए या फिर कोर्ट की निगरानी में सीबीआई इसकी जांच करे गौरतलब है कि मौजूदा वक्त में यह राजनीतिक मसला बना हुआ है जिस पर भाजपा लगातार कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर रही है। मनमोहन सिंह पर चीन को हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन समर्पित करने के हमले के बाद भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इसके लिए कांग्रेस और सीसीपी के बीच हुए समझौते को जिम्मेदार बताया था।

पिछले दिनों जेपी नड्डा ने 2008 में कांग्रेस पार्टी और सीसीपी के बीच समझौते और उसके बाद मनमोहन सिंह सरकार और कांग्रेस के बदले रवैये से जुड़े फैसलों को ट्वीट किया। भाजपा अध्यक्ष के अनुसार समझौते के बाद ही तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने चीन के सामने हजारों किलोमीटर जमीन समर्पित कर दी। जब डोकलाम हुआ तो राहुल गांधी भारत में चीनी राजदूत से मिलने चीनी दूतावास में चले गए।

यह बात उन्होंने छुपाने की भी कोशिश की। भाजपा का कहना है कि अब जब चीन के साथ एक बार फिर तनाव है तो राहुल गांधी सेना का मनोबल गिरा रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष ने पूछा कि क्या ये समझौते का असर है? बहरहाल इस पर कांग्रेस ने चुप्पी साध रखी है।

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