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मनमोहन सच्चाई बताएं, कांग्रेस सवालों के घेरे में

पूरी कांग्रेस सवालों के घेरे में आ गई है कि आखिर क्यों कांग्रेस इतना बेचैन है।

मनमोहन सच्चाई बताएं, कांग्रेस सवालों के घेरे में
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इसमें कोई शक नहीं कि सरदार मनमोहन सिंह एक भले आदमी हैं, उनकी छवि ईमानदार राजनेता की है और वे चुप्पा हैं। पर इससे यह तो साबित नहीं होता कि मनमोहन सिंह को कोर्ट समन भेजे नहीं। कोर्ट साक्ष्यों और सीबीआई द्वारा पेश की गई रिपोर्ट के आधार पर ही किसी अभियुक्त को अदालत में पेश होने का आदेश देती है और अगर साक्ष्य मनमोहन सिंह के खिलाफ हैं तो उन्हें क्यों नहीं समन भेजा जाना चाहिए? हमारे देश में न्यायपालिका फ्री है और उसकी निगाह में हर व्यक्ति बराबर है। भले वह देश का प्रधानमंत्री रहा हो अथवा कोई सामान्य जन।
यूपीए प्रथम की सरकार में झारखंड मुक्ति मोर्चा के शिबू सोरेन के हटने के बाद कोयला मंत्रालय खुद उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ले लिया था और उनके ही कायर्काल में कुमार मंगलम बिड़ला को कोल ब्लाक आवंटन हुआ। यह सच्चाई कांग्रेस को स्वीकार कर लेनी चाहिए। मनमोहन सिंह सीबीआई की विशेष अदालत के समक्ष खुलासा करें कि क्यों उन्होंने कुमार मंगलम बिड़ला को कोल ब्लाक दिया।
दरअसल तीन साल पहले भारत के सीएजी ने आरोप लगाया था कि सीमेंट व स्टील उद्योग से जुड़े कुछ घरानों को कोल ब्लाक आवंटित किए गए और आश्चर्यजनक रूप से भारत सरकार के कई नौकरशाहों ने ये कोल ब्लाक बहुत कम कीमत पर आवंटित किए। सरकार के कोयला मंत्रालय की इस बिक्री में रहस्यमय चुप्पी रही। पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि कोल ब्लाक आवंटन में कुछ गड़बड़िय़ां हुई जरूर थीं। बाद में इसे कोलगेट घोटाले का नाम दिया गया। भारत में 90 के दशक में आर्थिक सुधारों व उदारीकरण का जो दौर बतौर वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने शुरू किया था उसे अमली जामा उन्होंने 2004 से 2014 के बीच पूरा किया जब वे प्रधानमंत्री रहे।
माना जाता है कि आर्थिक उदारीकरण की अपनी थ्योरी को अमल में लाने के लिए वे इतनी जल्दी में थे कि उन्होंने नियम-कायदों की अवहेलना की और इसका लाभ नौकरशाहों ने उठाया। अब भले ही इस घोटाले में मनमोहन सिंह का हाथ न रहा हो लेकिन नौकरशाहों ने जो किया उसका भुगतान तो उन्हें करना ही पड़ेगा। इसीलिए सिंह को गत बुधवार 11 मार्च को दिल्ली की सीबीआई कोर्ट ने समन भेजकर बुलाया। उनके साथ ही उद्योगपति और हिंडाल्को के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला तथा तत्कालीन कोयला सचिव पारेख को भी बुलाया। यह कोल आवंटन साल 2005 में हुआ था। हालांकि कुमार मंगलम बिड़ला का कहना है कि इस कोल ब्लाक आवंटन में नियमों की अनदेखी नहीं हुई लेकिन सवाल उठता है कि कुमार मंगलम बिड़ला को कोयले की यह खदान आवंटन के लिए वही वक्त क्यों चुना गया जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास कोयला मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार था। तमाम ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब लोग चाहते हैं।
कांग्रेस ने मनमोहन सिंह को बचाने के लिए जिस तरह से मौजूदा केंद्र सरकार और कोर्ट के बारे में टिप्पणियां शुरू की हैं उससे पूरी कांग्रेस सवालों के घेरे में आ गई है कि आखिर क्यों कांग्रेस इतना बेचैन है। कहीं ऐसा तो नहीं इस कोल घोटाले के तार कांग्रेस के आला नेतृत्व से जुड़े हुए हों। बारह मार्च को कांग्रेस ने देश भर में चक्काजाम किया लेकिन वह इस बात का जवाब नहीं दे सकी कि उनके इस आंदोलन का मकसद मनमोहन को बचाना है या घोटाले को सही ठहराना है। कांग्रेस के आला नेतृत्व को यह तो डर है कि कहीं पूर्व पीएम मनमोहन सिंह अपना मुंह न खोल दें।
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