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निरंकार सिंह का लेख: चीन की बढ़ती दादागिरी

कोरोना वायरस के मामले में चारों तरफ से घिरने के बाद चीन दादागिरी पर उतारू हो गया है। कई देशों को वह धमका रहा है। अब वह भारत से लद्दाख सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण बंद करने को कह रहा है। भारत पर दबाव बनाने के लिए चीन ने सीमा पर 5000 सैनिक तैनात कर दिए हैं। भारत ने भी उसी पैमाने पर वहां सैनिक तैनात किए हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच तनाव कम होता नहीं दिख रहा। यह सवाल उठ रहा है कि क्या दोनों देशों में युद्ध जैसे हालात बनते दिख रहे हैं?

निरंकार सिंह का लेख: चीन की बढ़ती दादागिरी
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चीन की विस्तारवादी और अति महत्वाकांक्षी नीति पूरी दुनिया के लिए खतरा बन गई है। कोरोना वायरस के मामले में चारों तरफ से घिरने के बाद चीन दादागिरी पर उतारु हो गया है। कई देशों को वह धमका रहा है। अब वह भारत से लद्दाख सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण बंद करने को कह रहा है। भारत पर दबाव बनाने के लिए चीन ने सीमा पर 5000 सैनिक तैनात कर दिए हैं। भारत ने भी उसी पैमाने पर वहां सैनिक तैनात किए हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच तनाव कम होता नहीं दिख रहा। यह सवाल उठ रहा है कि क्या दोनों देशों में युद्ध जैसे हालात बनते दिख रहे हैं? रक्षा मामलों के जानकार पीके सहगल ने तनाव का कारण बताते हुए कहा कि चीन ने भारत के सामने 5000 सैनिक तैनात कर दिए हैं। चीन दबाव डाल रहा है कि भारत इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण बंद करे। भारत ने साफ मना कर दिया है क्योंकि चीन ने अपनी तरफ से बहुत बड़ा कंस्ट्रक्शन किया है, भारत तो बस सीमाओं की रक्षा करने की कोशिश कर रहा है।

हाल के दिनों में लद्दाख और उत्तरी सिक्किम में भारत और चीन की सेनाओं ने अपनी उपस्थिति काफी हद तक बढ़ाई है। करीब 3,500 किलोमीटर लंबी एलएसी दोनों देशों के बीच वस्तुत सीमा का काम करती है। सीमा पर लगातार तनाव बढ़ा रहे चीन का भारत ने डटकर मुकाबला करने की तैयारी की है। सेना को सीमा पर चल रहे निर्माण कार्य को जारी रखने का निर्देश दिया गया है। भारत और चीन के वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सैनिकों की बढ़ती गतिविधियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को देश के शीर्ष सैन्य नेतृत्व के साथ पूरे हालात की समीक्षा की। प्रधानमंत्री की तरफ से बुलाई गई इस तरह की पहली बैठक से यह साफ हो गया है कि सैन्य बल के सहारे दबाब बनाने की चीन की रणनीति को नाकाम किया जाएगा। साथ ही इससे यह भी पता चलता है कि दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व की तरफ से मौजूदा तनाव पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं किए जाने के बावजूद सीमा पर हालात बिगड़ रहे हैं। दरअसल भारत चीन सीमा विवाद जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री कार्यकाल से ही चला आ रहा है। उस समय चीन ने भारत के 43,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था। इसके अतिरिक्त 2 मार्च 1963 को चीन तथा पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित तथाकथित सीमा करार के तहत पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर के 5180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अवैध रूप से चीन को दे दिया था।

जम्मू कश्मीर राज्य भारत का अभिन्न और अटूट हिस्सा है। चीन के वन बेल्ट, वन रोड को लेकर भी दोनों देशों के रिश्ते तनावपूर्ण हैं। यह गलियारा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजरता है। इसी कारण भारत ने चीन के वन बेल्ट, वन रोड पर आयोजित सम्मेलन का बहिष्कार किया। साल 1996 में चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति च्यांग चेमिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने एलएसी पर सैन्य क्षेत्र में विश्वास बहाली के कदम के बारे में समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। जून 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के दौरान दोनों पक्षों में से प्रत्येक ने इस बारे में विशेष प्रतिनिधि नियुक्त करने पर सहमति जताई थी। इस विषय पर अब तक दोनों पक्षों की कई बैठकें हो चुकी है लेकिन सीमा विवाद पर कोई प्रगति होती नहीं दिख रही है।

सूचना के अधिकार के तहत विदेश मंत्रालय से यह पूछा गया था कि चीन ने भारत के कितने क्षेत्र पर कब्जा कर रखा है और इस बारे में सरकार ने क्या पहल की है। रक्षा मामलों के विशेषज्ञ राहुल के भोंसले ने कहा कि पिछले 30 साल से सीमा मुद्दे पर चर्चा चल रही है। लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला और एक बड़ा क्षेत्र चीन के कब्जे में है। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण की घटनाएं भी जारी है। उन्होंने कहा कि वास्तव में चीन की ऐसी गतिविधियों से सचेत होने की जरूरत है और उसका इरादा बिल्कुल स्पष्ट है। हमें चीन के संदर्भ में 1962 के बाद की स्थिति में सामरिक परिपेक्ष में अपनी नीति को देखना होगा। पिछली सरकारों की नीति काफी रक्षात्मक रही है और चीन इसी का फायदा उठाता है।

भारत चीन के साथ 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है। ये सीमा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश से होकर गुजरती है।ये तीन सेक्टरों में बंटी हुई है। पश्चिमी सेक्टर यानी जम्मू-कश्मीर, मिडिल सेक्टर यानी हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड और पूर्वी सेक्टर यानी सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश। हालांकि दोनों देशों के बीच अबतक पूरी तरह से सीमांकन नहीं हुआ है, क्योंकि कई इलाकों को लेकर विवाद है। चीन पश्चिमी सेक्टर में अक्साई चीन पर अपना दावा करता है, जो फिलहाल उसी के नियंत्रण में है। भारत के साथ 1962 के युद्ध के दौरान चीन ने इस पूरे इलाके पर कब्जा कर लिया था। वहीं पूर्वी सेक्टर में चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता है। चीन तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश के बीच की मैकमोहन रेखा को भी नहीं मानता है। वह कहता है कि 1914 में जब ब्रिटिश भारत और तिब्बत के प्रतिनिधियों ने ये समझौता किया था, तब वह वहां मौजूद नहीं था। तिब्बत उसका हिस्सा रहा है इसलिए वह ख्ुाद कोई फैसला नहीं ले सकता।

दरअसल 1914 में तिब्बत स्वतंत्र लेकिन कमजोर मुल्क था, लेकिन चीन ने तिब्बत को कभी स्वतंत्र मुल्क नहीं माना। 1950 में चीन ने तिब्बत को पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लिया। सरदार पटेल की चेतावनी के बावजूद नेहरु ने उस समय कोई ध्यान नही दिया। उनकी गलतियों को आज देश खामियाजा भुगत रहा है। इन विवादों की वजह से दोनों देशों के बीच कभी सीमा निर्धारण नहीं हो सका। हालांकि यथास्थिति बनाए रखने के लिए लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी टर्म का इस्तेमाल किया जाने लगा। पर अभी ये भी स्पष्ट नहीं है। दोनों देश अपनी अलग-अलग लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल बताते हैं। इस लाइन ऑफ एक्चुएल कंट्रोल पर कई ग्लेशियर, बर्फ के रेगिस्तान, पहाड़ और नदियां पड़ते हैं। एलएसी के साथ लगने वाले कई ऐसे इलाके हैं जहां अक्सर भारत और चीन के सैनिकों के बीच तनाव की खबरें आती रहती हैं। 134 किलोमीटर लंबी पैंगोंग त्सो झील हिमालय में करीब 14,000 फुट से ज्यादा की ऊंचाई पर स्थित है। इस झील का 45 किलोमीटर क्षेत्र भारत में पड़ता है, जबकि 90 किलोमीटर क्षेत्र चीन में आता है। वास्तविक नियंत्रण रेखा इस झील के बीच से गुजरती है। पश्चिमी सेक्टर में चीन की तरफ से अतिक्रमण के एक तिहाई मामले इसी पैंगोंग त्सो झील के पास होते हैं। इसकी वजह ये है कि दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर सहमति नहीं है। दोनों ने अलग-अलग एलएसी तय की हुई है।भारत की पिछली सरकारों की नीति काफी रक्षात्मक रही है और चीन इसी का फायदा उठाता है।

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