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गौरीशंकर राजहंस का लेख : चीन को सबक सिखाना है

भविष्य (Future) में क्या होगा यह कहना मुश्किल है। परन्तु चीन को सबक (lesson) सिखाना जरूरी है। भारत ने जिस तरह चीन को दो टूक कह दिया है कि गलवान घाटी हमारी है और गलवान की तरफ वह तांक झांक न करे। इससे लगता है कि चीन बहुत दिनों तक भारत के खिलाफ टिक नहीं पाएगा। भारत में सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों ने प्रधानमंत्री को आश्वस्त (Convinced) किया है कि भारत की सेना चीन का मुकाबला करने के लिए हर तरह से तैयार है। देखना यह है कि चीन होश में आता है अथवा नहीं।

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नेपाल चीन सीमा विवाद

गौरीशंकर राजहंस। अभी हाल में प्रधानमंत्री ने चीन के साथ हुई तनातनी (Tension) के बीच सर्वदलीय बैठक बुलाई, जिसमें कांग्रेस और वामदलों ने अपनी अलग राय रखी परंतु अन्य विपक्षी दलों ने सरकार के साथ एकजुटता (Solidarity) दिखाई। यहां तक कि ममता बनर्जी जो नरेन्द्र मोदी की नीतियों की कटु आलोचक रही है, उसने भी खुलकर कहा कि संकट की इस घड़ी में हम सरकार के साथ हैं। सारा झगड़ा गलवान घाटी को लेकर है। चीन इस घाटी के उत्तर में जम जाना चाहता है जिससे भारत इस क्षेत्र में शक्तिहीन (Powerless) हो जाए।

शरद पवार ने कहा कि गलवान घाटी हमेशा से भारत का क्षेत्र रहा है और चीन को उसे हर हाल में खाली करना पड़ेगा। शिव सेना के उद्वव ठाकरे ने कहा कि भारत जरूर शांति चाहता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हम कमजोर हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि यह राजनीति का समय नहीं है। प्रधानमंत्री देशहित में जो भी फैसला लेंगे हम उनके साथ हैं। बीजेडी प्रमुख के प्रतिनिधि पिनाकी मिश्रा ने कहा कि हम पूरी तरह सरकार के साथ खड़े हैं। कुल मिलाकर वामदल और कांग्रेस को छोड़कर सभी दलों ने सरकार को कंधे से कंधा मिलाकर साथ देते हुए कहा कि संकट की इस घड़ी में वे सरकार के साथ हैं।

भारत और चीन के बीच जो सीमा विवाद चल रहा है उस पर प्रधानमंत्री नेरन्द्र मोदी ने सभी दलों को स्पष्ट कर दिया कि न तो कोई हमारी सीमा में घुसा है और न ही हमारी कोई पोस्ट दुश्मन के कब्जे में है। प्रधानमंत्री ने सभी दलों को आश्वस्त किया कि देश की सेनाएं सक्षम हैं और सरकार की और से उन्हें यथोचित कार्रवाई की पूरी छूट दे दी गई है। कांग्रेस की सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने बार-बार पूछा कि जो सैनिक चीनी सेनाओं को हटाने के लिए गए उन्होंने गोली क्यों नहीं चलाई। इस पर शरद पवार ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संधियों में यह जिक्र था कि कोई मुठभेड़ होने पर दोनों और से कोई गोली नहीं चलाएगा। अब खबर आई है कि भारत सरकार ने सेना को आदेश दे दिया है कि यदि चीन की तरफ से फिर कोई मुठभेड़ हो तो हमारे सैनिक गोली चलाने में संकोच न करें। चीन के इतिहास को यदि पढ़ा जाए तो यह समझ में आ जाएगा कि चीन विस्तारवादी है। वो अपनी सीमाएं बढ़ाने के लिए वह कुछ भी कर सकता है।

चीन ने पंडित नेहरू को बेवकूफ बना तिब्बत को हड़प लिया। तिब्बत सदा से भारत का प्रोक्टोरेट था। वहां भारत की मुद्रा चलती थी, भारत का डाकघर था, पुलिस की एक टुकड़ी संरक्षण के लिए थी और सेना की एक टुकड़ी भी वहीं तैनात रहती थी। जैसे भारत अंग्रेजों का गुलाम था वैसे ही चीन के विभिन्न भागों पर पश्चिमी देशों का दखल था। भारत को आजादी 1947 में मिली और माओ-त्से-तुंग के नेतृत्व में चीन की सेना जिसे पीएलए या पिपुल लिबरेशन आर्मी कहते हैं, ने 1950 में चीन की मुख्य भूमि पर कब्जा कर लिया और चीन के तत्कालीन शासक केएमटी या क्यू मिन तांग को फारमोसा भगा दिया। तब से चीन कह रहा है कि फारमोसा चीन का ही अंग है। परन्तु अमेरिका ने चीन को चेताया है कि यदि उसने फारमोसा को हड़पने की कोशिश की तो उसे इसकी भारी कीमत चुकानी होगी।

पड़ोस के कई देशों के क्षेत्रों को चीन ने हड़प लिया है। परन्तु उसे मुंह की तो तब खानी पड़ी जब उसने वियतनाम को हड़पने की कोशिश की। वियतनाम के बहादुर सैनिकों ने चीन के छक्के छुड़ा दिए। अब चीन कह रहा है कि गलवान घाटी उसकी है जबकि भारत जोर शोर से कहता रहा है कि गलवान घाटी उसकी है और चीन का उस पर कोई हक नहीं, चीन का दावा बिल्कुल फर्जी है। चीन 1962 की घटनाओं को जिक्र करते हुए भारत को धमकाता रहता है कि चीन गलवान घाटी पर कब्जा कर लेगा। परन्तु भारत ने चीन को इसका मुंहतोड़ जवाब देते हुए कहा है कि आज का भारत 1962 का भारत नहीं है। वह सामरिक दृष्टि से अत्यन्त ही सशक्त है और यदि चीन ने अपनी जिद नहीं छोड़ी तो उसे इसका भारी मूल्य चुकाना पड़ेगा।

आज की तारीख में पाकिस्तान और उत्तर कोरिया को छोड़कर चीन का कोई दोस्त नहीं है। अतः चीन चाहे जितनी भी बन्दर घुड़की दे, वह युद्व के झमेले में नहीं पड़ेगा। चीन ने कभी किसी समझौते को नहीं माना है। अंग्रेजों के समय में शिमला के एडमिनिस्ट्रेटर मैकमोहन थे। उन्होंने चीन और तिब्बत को बुलाया था कि भारत की सीमा तय कर दी जाए। तिब्बत के प्रतिनिधि तो आए थे, परन्तु चीन का प्रतिनिधि नहीं आया। साफ है कि चीन दादागिरी में भरोसा करता है, किसी कायदे कानून में नहीं।

जब चीन ने तिब्बत को हड़प लिया और दलाई लामा को कैद कर बीजिंग ले जाना चाहा तो दलाई लामा अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ भारत की सीमा में प्रवेश कर गए। नेहरू ने दलाई लामा को राजनीतिक शरण दी और संसद में वक्तव्य दिया कि वे सुरक्षित रूप से भारत पहुंच गए हैं। यह जानकर चीन बहुत क्रोधित हुआ। उसने पंडित नेहरू को कहा कि दलाई लामा को चीन के हवाले कर दिया जाए परन्तु पंडित नेहरू तैयार नहीं हुए। अन्त में गुस्सा कर 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया। चीन का मुख्य दैनिक पत्र ग्लोबल टाइम्स बार बार कह रहा है कि भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि 1962 में उसकी कैसी हार हुई थी। इसके जवाब में भारतीय मीडिया बार बार कह रही है कि आज का भारत 1962 का भारत नहीं है। संसार के प्रसिद्ध जानकार कहते हैं कि भारत की पर्वतीय सेना संसार में सबसे मजबूत है और यदि युद्ध हुआ तो चीन को मुंह की खानी पड़ेगी। पूरे भारत में चीन के खिलाफ बहुत रोष है और जगह जगह चीनी सामान की होली जलाई जा रही है। चीन के साथ भारत के आर्थिक संबंध बहुत अधिक हैं। यदि भारत की जनता ने चीन के सामान का बहिष्कार कर दिया तो चीन की अर्थव्यवस्था ठप होने लगेगी। हमें याद रखना होगा कि महात्मा गांधी ने जब यह महसूस किया कि भारत की जनता मानचेस्टर के कपड़ों का अधिक उपयोग करती है तब उन्होंने जनता को समझाया कि वह अंग्रेजी वस्त्रों का त्याग कर उनकी होली जलाएं और चरखा कातकर भारत में नए और सस्ते कपड़े बनवाएं। जब अंग्रेजी वस्त्रों का विरोध होने लगा तब अंग्रेज कांप गए और उन्हें भारत छोड़ना पड़ा। उसी तरह यदि चीनी सामान का पूरा देश विरोध करने का प्रण कर ले कि वह चीनी सामान नहीं खरीदेगा तो साल, दो साल में चीन की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। भविष्य में क्या होगा यह कहना मुश्किल है। परन्तु भारत ने जिस तरह चीन को दो टूक कह दिया है कि गलवान घाटी हमारी है और गलवान की तरफ वह ताक झांक नहीं करे। इससे लगता है कि चीन बहुत दिनों तक भारत के खिलाफ टिक नहीं पाएगा। भारत में सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों ने प्रधानमंत्री को आश्वस्त किया है कि भारत की सेना चीन का मुकाबला करने के लिए हर तरह से तैयार है। देखना यह है कि चीन होश में आता है अथवा नहीं।

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