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पटरी पर लौटती भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौती

अर्थव्यवस्था के सामने कई ऐसी चुनौतियां हैं जिनसे वित्त मंत्रालय और रिर्जव बैंक को समय रहते पार पाना होगा।

पटरी पर लौटती भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौती
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क्या भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है? केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) द्वारा जारी वित्त वर्ष 2013-14 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) के आंकड़ों के अनुसार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर 4.8 फीसदी रही और चालू खाते का घाटा जीडीपी का 1.2 फीसदी रहा। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) की तुलना में निश्चित रूप से ये आंकड़े उत्साह पैदा करते हैं और बदहाली के दौर से निकलने की एक उम्मीद जताते हैं, परंतु अभी भी अर्थव्यवस्था के सामने कई ऐसी चुनौतियां हैं जिनसे वित्त मंत्रालय और रिर्जव बैंक को समय रहते पार पाना होगा। दरअसल, पहली तिमाही में जीडीपी की विकास दर 4.4 फीसदी रही थी, जो चार वर्ष के दौरान सबसे कम थी, वहीं चालू खाते का घाटा जीपीडी का 4.9 फीसदी के
खतरनाक स्तर तक पहुंच गया था। जिसके बाद से सरकार के हाथ-पांव फूलने लगे थे।
डॉलर की तुलना में रुपये की ऐतिहासिक कमजोरी ने स्थिति को और भयावह बना दिया। ऊपर से रेटिंग एजेंसियों के डर ने नीति निर्माताओं को मौद्रिक सहित नीतिगत उपायों को अपनाने को विवश किया। विदेशी मुद्रा का देश से बाहर जाने का आंकड़ा जब आने वाले से बड़ा होता है तो चालू खाते में घाटा होता है। भारत निर्यात से ज्यादा आयात करता है, वहीं सोने और कच्चे तेल का भी बड़ा आयातक है। ऐसे में कमजोर रुपये की वजह से चालू खाते में घाटा खतरनाक स्तर पर पहुंच गया था। सोने के आयात को कम करने के सरकारी उपायों से स्थिति कुछ संभली है। साथ ही इस दौरान रुपये के अवमूल्यन से निर्यात में तेजी आई है। दरअसल रुपये के अवमूल्यन से निर्यात बढ़ता है।
जिससे एक तरफ डॉलर की निकासी पर थोड़ी पाबंदी लगी और दूसरी तरफ डॉलर आने से चालू खाते का घाटा कम करने में मदद मिली पर सरकार को ध्यान रखना होगा कि यह स्थाई स्थिति नहीं है। वर्ष 2012-13 में विकास दर गिर कर एक दशक के निचले स्तर यानी पांच फीसदी पर पहुंच गया था वहीं चालू खाते में घाटा भी जीडीपी का पांच फीसदी हो गया था। विकास दर में इस वृद्धि की वजह कृषि सेक्टर है। इस वर्ष मानसून बेहतर रहा है। सरकार को इसमें निरंतरता बनाए रखने के लिए उद्योग, विनिर्माण, खनन सहित सर्विस सेक्टर की चुनौतियों से भी निपटना होगा। हालात यह है कि कंपनियां ने नीतिगत अपंगता की वजह से निवेश योजनाओं पर रोक लगा रखी हैं और उपभोक्ता महंगे ऋण के कारण अपने खचरें में कटौती कर रहे हैं। जिससे एक तरफ उत्पादन तो दूसरी तरफ मांग प्रभावित हो रही है।
सुस्ती तोड़ लंबित परियोजनाओं और नये प्रोजेक्ट को मंजूरी देने में तेजी लानी होगी। वहीं मुद्रास्फीति की ऊंची दर ने भी उपभोग को कम किया है। इससे भी बचत और निवेश प्रभावित हो रहे हैं। सरकार के लिए राजकोषीय घाटा अभी भी सर दर्द बना हुआ है। सरकार इसे जीडीपी का 4.8 फीसदी से कम रखने के लिए मशक्कत कर रही है। विनिवेश से राजस्व जुटाने की बात हो रही है परंतु निजी उद्यमी आगे नहीं आ रहे, क्योंकि देश में अविश्वास का माहौल व्याप्त है। कर वसूली के मोच्रे पर भी सरकार लक्ष्य से काफी दूर है।
तमाम संस्थाएं अनुमान लगा रही हैं कि देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर इस वर्ष पांच फीसदी से कम रहेगी। वित्त मंत्री अपने बजट भाषण में इसे पांच फीसदी तक पहुंचाने की बात कह चुके हैं, लेकिन इसके लिए आगामी छमाही में जीडीपी विकास दर 5.4 फीसदी रहनी चाहिए। चुनावी साल में ऐसा होना कठिन प्रतीत होता है।

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