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बड़ा खुलासा: पाकिस्तान की सेना भारत से अच्छे संबंध चाहती है

ब्रिटेन के थिंक टैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की सेना भारत से अच्छे संबंध चाहती है। वहां की रायल यूनाइट्स सर्विसेज इंस्टीट्यूट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा मानते हैं कि शांति और स्थिरता के लिए भारत का सहयोग बहुत जरूरी है।

बड़ा खुलासा: पाकिस्तान की सेना भारत से अच्छे संबंध चाहती है
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ब्रिटेन के थिंक टैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की सेना भारत से अच्छे संबंध चाहती है। वहां की रायल यूनाइट्स सर्विसेज इंस्टीट्यूट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा मानते हैं कि शांति और स्थिरता के लिए भारत का सहयोग बहुत जरूरी है। पाक सेना प्रमुख की इस चाहत और ब्रिटिश थिंक टैंक की रिपोर्ट पर आप हंस भी सकते हैं और इसकी पड़ताल के लिए उन कारणों की गहरायी में भी जा सकते हैं,

जिनके चलते पाक सेना प्रमुख की ओर से इस तरह की इच्छा जाहिर की गयी है। हंस इसलिये सकते हैं कि भारत को बेवकूफ बनाने के लिए शांति, सदभावना और स्थिरता के नाम पर पहले भी पाकिस्तान की ओर से इसी तरह के झांसे दिये जा चुके हैं। भारत ने जब-जब सदभावना और शांति के लिए सहयोग का हाथ बढ़ाया, तब-तब पाक सेना ने आतंकियों के जरिये पीठ में छुरा घोंपने का काम किया है।

वह चाहे अटल जी की लाहौर यात्रा के बाद करगिल में घुसपैठ रही हो या नरेन्द्र मोदी की लाहौर यात्रा के बाद उड़ी सेक्टर में सैन्य कैंप में सो रहे जवानों पर हमला हो या पठानकोठ एयरबेस पर सबसे बड़ा आतंकी हमला। ऐसे में पाकिस्तान की सेना जो कहती है, उस पर सहज रूप में यकीन कर लेना संभव नहीं है। सब जानते हैं कि पाक सेना बुजदिल भी है और धोखेबाज भी।

इतनी गैर पेशेवर चालबाज फौज शायद ही कोई दूसरी हो। 1947 के बाद से वह चार बार भारतीय सेना से भिड़ी है। चारों बार उसे मुंह की खानी पड़ी है। वह जानती है कि सीधे युद्ध में वह नहीं जीत सकती। इसलिये उसने भारत के खिलाफ आतंक के रूप में छद्म युद्ध का सहारा लिया। पाक सेना का शिखंडी वाला यह रूप सिर्फ भारत के प्रति ही नहीं है।

वह अफगानिस्तान और ईरान के खिलाफ भी इसी प्रकार का द्वेष रखती है। उनकी सरहदों पर भी उसने इसी तरह की साजिशों के तार बिछा रखे हैं। वह पाकिस्तान के भीतर भी पख्तूनों का दमन कर रही है। सिंधियों को कुचल रही है। गिलगित बालटिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों की आवाज दबा रही है। बलूचिस्तान के उन असंख्य आंदोलनकारियों को बूटों के तले मसल रही है।

पाक सेना ने वहां लोकतंत्र भी नहीं पनपने दिया। रक्षा और विदेश मामले वह खुद तय करती रही है। सेना की इजाजत के बिना चुनी हुई सरकार कोई फैसला नहीं कर पाती। हिंदुस्तान से दोस्ती और शांति के पक्षधर माने जाने वाले नवाज शरीफ को किस तरह पाक सेना और वहां की सुप्रीम कोर्ट ने बेइज्जत करके प्रधानमंत्री पद और पार्टी प्रमुख के पद से चलता किया है, यह पूरी दुनिया ने देखा है।

पाक सेना नियंत्रण रेखा पर आये दिन युद्ध विराम का उल्लंघन करती है। भारतीय सेना इसका मुंहतोड़ जवाब देती है। नतीजतन दोनों तरफ भारी तबाही जारी है। पूरी दुनिया अब यह जान चुकी है कि घाटी के साढ़े तीन जिलों को कौन सुलगा रहा है। हर सप्ताह जुमे की नमाज के बाद पत्थरबाजी क्यों होती है और किसके इशारे पर होती है। सीमा पार से भेजी जा रही रकम को भारतीय एजेंसियां पकड़ चुकी हैं।

वह जिनको भेजी जा रही थी, वह गिरफ्त में आ चुके हैं। अलगाववादी नेताओं पर एजेंसियों का पहली बार इस कदर अंकुश है कि वे अपने आकाओं से मिलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। बुरहान वानी से लेकर उनके तमाम गुर्कों का सेना सफाया कर चुकी है। पिछले साल दो सौ से अधिक आतंकवादी घाटी में मौत के घाट उतारे गये हैं। अब तक इन चार महीनों में ही पचास से ज्यादा उग्रवादी मारे गये हैं।

सेना को खुली छूट दी गई है कि वह सीमा पार से होने वाली किसी भी कार्रवाई का दोगुने जोश से जवाब दे। पाकिस्तानी सेना भले ही इंकार करती रहे, परंतु इस सच को दुनिया जान चुकी है कि उड़ी और पठानकोट की वारदात के बाद भारतीय सेना ने सीमा पार करके सर्जिकल स्ट्राइक की थी और कई आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद किया था।

नियंत्रण रेखा पर युद्ध विराम उल्लंघन का भी उसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा है। इसकी उसे कई गुणा कीमत चुकानी पड़ी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नवाज शरीफ की तरफ सहयोग, शांति, सदभावना और विश्वास बहाली के लिए दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। इसके लिए वह बिना किसी ताम-झाम के अफगानिस्तान से दिल्ली लौटते हुए कुछ घंटों के लिए लाहौर रुके थे,

परंतु पाक सेना, आईएसआई और आतंकी जमातों ने इन प्रयासों में पलीता लगाने के लिए पठानकोट एयरबेस पर अटैक कराया और उड़ी सेक्टर में सोते हुए सैनिकों की फिदायीन हमले में जान ले ली। मोदी चाहते थे कि टकराव का रास्ता छोड़कर दोनों देश गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के मोर्चे पर ध्यान फोकस करें परंतु तब वहां की सेना को यह मंजूर नहीं था।

वह नवाज शरीफ को बतौर प्रधानमंत्री विफल करना चाहती थी। इसलिए सरहद पर लगातार युद्धविराम उल्लंघन किए गए और बड़े पैमाने पर आतंकियों की घुसपैठ कराकर भारत में अशांति फैलाने की चेष्टा की गई। पठानकोट और उड़ी की घटना के बाद ही भारत का रुख कड़ा हुआ और उसने न केवल इस्लामाबाद में होने वाले सार्क सम्मिट को रद्द कराया बल्कि बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और अफगानिस्तान जैसे देशों को भी पाकिस्तान के खिलाफ खड़ा कर दिया।

आज हालत यह है कि पाकिस्तान के सभी पड़ौसी मुल्क भारत, अफगानिस्तान और ईरान उससे खफा हैं। अमेरिका उसे दी जानी वाली आर्थिक सहायता लगभग खत्म कर चुका है। सीपैक और ग्वादर पोर्ट के चलते चीन के आर्थिक हित उससे जुड़े हुए हैं परंतु वह भारत के साथ व्यापार को आगे बढ़ाने के प्रति गंभीर है। यह पहली बार है कि जिन इस्लामिक देशों के मुगालते में पाकिस्तान धौंस पट्टी देता रहता था, उन सबने उससे किनारा कर लिया है।

यहां तक कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात तक आतंकवाद की निंदा कर चुके हैं और जब भारतीय प्रधानमंत्री इन देशों की यात्रा पर गये, तब उन्हें वहां के सर्वोच्च सम्मान से नवाज चुके हैं। पाकिस्तान आर्थिक रूप से दिवालिया हो चुका है। उसकी अर्थव्यवस्था हिचकौले खा रही है। उसकी जीडीपी तीन और चार फीसदी के बीच अटकी हुई है। रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं। विकास अवरूद्ध हो गया है।

सेना लोकतंत्र को अगुआ किए हुए है। इन हालातों में लोगों की नाराजगी बढ़ रही है और पहली बार सेना के खिलाफ लोग खुलकर नाराजगी का इजहार कर रहे हैं। उनका मानना है कि कश्मीर कश्मीर चिल्लाते रहने से कुछ नहीं होगा। सेना की कश्मीर नीति ने पाकिस्तान को पूरी दुनिया में अलग-थलग कर दिया है।

इस माहौल के बीच अगर पाक सेना प्रमुख नई दिल्ली के साथ शांति और स्थिरता की बात करते हैं तो हमें निश्चित रूप से थोड़ा चौकन्ना हो जाना चाहिए। यह सोचने की *जरूरत है कि जनरल बाजवा का एकाएक ह्रदय परिवर्तन क्यों हो रहा है।

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