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चिंतन: ब्रिटेन के चलते ग्लोबल इकोनॉमी पर असर होगा

2014 तक यूरोपीय महादेशों के 51 देशों में से 28 देश ईयू के सदस्य बने।

चिंतन: ब्रिटेन के चलते ग्लोबल इकोनॉमी पर असर होगा
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नई दिल्ली. आखिरकार 43 साल बाद ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन (ईयू) से बाहर हो गया। वह 1973 से इसका सदस्य था। यूरोपीय संघ बनाने बनने की नींव 1957 में रोम संधि से पड़ी थी, लेकिन मौजूद स्वरूप में यह 1993 में मॉस्ट्रिच संधि से आया। 2014 तक यूरोप महादेश के 51 देशों में से 28 देश ईयू के सदस्य बने। ईयू से ब्रिटेन के अलग होने का ग्लोबल अर्थव्यवस्था समेत भारत पर भी व्यापक असर पड़ना तय है।
तात्कालिक वैश्विक असर तो यही पड़ा है कि दस देशों की मुद्रा में गिरावट दर्ज की गई। ब्रिटिश पाउंड में ही 31 साल की सबसे बड़ी गिरावट आई। यूरो और रुपये भी गिरे। ऑस्ट्रेलियन डॉलर, न्यूजीलैंड डॉलर, मेक्सिकन पेसो, साउथ अफ्रीका के रेंड, स्विट्जरलैंड के फ्रेंक, नॉर्वे के क्रोन और पोलैंड की करंसी जोल्टी में भी गिरावट देखी गई। भारत में तो सेंसेक्स भी धड़ाम हो गया है। दिन में कारोबार के दौरान 1000 अंक तक लुढ़क गया था, लेकिन अंत में संभल कर 604 अंक पर बंद हुआ।
निफ्टी में करीब दो सौ अंक की गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों के चार लाख करोड़ रुपये डूब गए। आने वाले समय में भी पाउंड और रुपये में गिरावट आने की संभावना है। डॉलर और मजबूत होगा। डॉलर के महंगा होने से कच्चे तेल के दाम भी बढ़ेंगे। इससे पेट्रोल-डीजल महंगे हो जाएंगे। 800 भारतीय कंपनियों को परेशानी उठानी होगी। वह इसलिए कि अभी ये कंपनियां ब्रिटेन में अपना दफ्तर रखकर यूरोपीय यूनियन के सभी 28 देशों में अपना कारोबार कर रही थीं।
अब उन्हें अलग-अलग व्यापार केंद्र बनाने होंगे। उन्हें डालर पर भी निर्भर रहना पड़ सकता है। फायदा के तौर पर देखें तो अब भारत को ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार करने में और आसानी होगी। भारत के अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार में ब्रिटेन 12वें स्थान पर है। जिन 25 देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापारिक संतुलन भारत पक्ष में झुका हुआ है उनमें ब्रिटेन सातवें स्थान पर है। ब्रिटेन में निवेश करने के मामले में भारत तीसरा सबसे बड़ा निवेशक है।
बड़ा सवाल यह है कि आखिर ब्रिटेन अलग क्यों हुआ। वर्तमान में वह गहरे प्रवासी संकट का सामना कर रहा था। हर दिन करीब 500 प्रवासी वहां आ रहे थे। यूरोपीय यूनियन में बने रहने के लिए ब्रिटेन को फीस के रूप में 99 हजार 300 करोड़ रुपये सालाना देने पड़ते थे। इतनी बड़ी रकम को लेकर आर्थिक रूप से खस्ताहाल ब्रिटेन में असंतोष था। अब नहीं देने होंगे। ब्रिटिश जनता ईयू काउंसिल की अफसरशाही से भी परेशान थी। चंद लोगों के हाथ में समूचे देश की सत्ता थी। इनकी सैलरी ब्रिटेन के पीएम डेविड कैमरन से भी ज्यादा है।
उनकी सैलरी का बोझ भी ब्रिटिश जनता पर था। इसलिए यूके इंडिपेंडेंस पार्टी के नेता नीगेल फराज के ईयू से अलग होने के अभियान को जनसर्मथन मिला। द इकॉनामिस्ट ने ब्रिटेन के लोगों के इस फैसले को ट्रैजि़क स्पिल्ट (दुखद अलगाव) बताया है। ब्रिटिश पीएम डेविड कैमरन ने तीन महीने के बाद पद छोड़ने का ऐलान कर दिया है।
हालांकि अब ब्रिटेन के लिए दूसरे देशों के साथ फ्रीट्रेड के रास्ते जरूर खुल गए हैं, लेकिन ग्लोबल इकॉनोमी पर असर पड़ना तय है व उसके सामने ईयू के झटके से उबरने और खुद को आर्थिक शक्ति के रूप में फिर से स्थापित करने की महती चुनौती होगी।
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