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चिंतन: बॉन्ड भरवाना कांग्रेस में भारी घबराहट के संकेत

विधानसभा चुनाव की हार से परेशान कांग्रेस इस कदर घबरा गई है कि पार्टी को अब अपने वफादार सिपाहियों पर भी भरोसा नहीं रहा।

चिंतन: बॉन्ड भरवाना कांग्रेस में भारी घबराहट के संकेत
लोकसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद विधानसभा दर विधानसभा चुनावों में मिल रही हार से परेशान कांग्रेस इस कदर घबरा गई है कि पार्टी को अब अपने वफादार सिपाहियों पर भी ऐतबार नहीं रहा है। पश्चिम बंगाल विस चुनावों में वाम दलों से अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस अपने वहां के विधायकों से वफादारी का बॉन्ड साइन करवा रही है।
बंगाल प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने हाल के इलेक्शन में जीते सभी 44 विधायकों से स्टांप पेपर पर साइन कराए हैं। दो पेज के स्टांप में लिखा है, ‘मैं बिना शर्त कांग्रेस के प्रति अपना विश्वास रखता हूं, जिसकी बिना शर्त अगुवाई सोनिया और राहुल गांधी कर रहे हैं। इसे एक तरह से सोनिया और राहुल गांधी के प्रति वफादारी बनाए रखने का बॉन्ड माना जा रहा है। दूसरे प्वाइंट में लिखा है, असेंबली में पार्टी का हिस्सा रहते मैं पार्टी के खिलाफ होने वाली किसी भी एक्टीविटी में शामिल नहीं रहूंगा। पार्टी के लिए नेगेटिव बात नहीं कहूंगा। ऐसे किसी काम को करने से पहले अपने पद से इस्तीफा दे दूंगा।
मीडिया में खबर आने के बाद कांग्रेस को बगलें झांकने पर मजबूर होना पड़ है। देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी के लिए यह स्थिति उसके भविष्य के लिए कहीं से भी उम्मीद नहीं जगाती है। यह हो सकता है कि अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में कांग्रेस विधायकों ने जिस तरह बगावत की, उससे डर कर कांग्रेस के सिपहसलार अपने विधायकों से बॉन्ड भरवाए हों, लेकिन पार्टी के प्रति किसी की निष्ठा विचारधारा और नेता से होती है। अगर किसी को कांग्रेस में नहीं रहना है या उससे बगावत करना है तो वह बॉन्ड भरने के बाद भी कर सकता है।
राजनीतिक रूप से परिपक्व पार्टी कांग्रेस के नेतृत्व से इतनी तो उम्मीद की जाती है कि वे इस बात को समझ रहे होंगे। फिर भी अगर पार्टी के अंदर बॉन्ड भरवाने की बात हो रही है, तो इससे पता चलता है कि कांग्रेस न केवल राजनीतिक पराजय के दौर से गुजर रही है, बल्कि भरोसे के संकट से भी गुजर रही है। पहले भी कांग्रेस के नेताओं में अनेक बार मतभेद उभरे हैं। अभी हाल ही में दिग्विजय सिंह, शशि थरूर और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जब पांच में से चार राज्यों में मिली हार पर पार्टी में कड़ी सर्जरी की बात उठाई तो सत्यव्रत चतुर्वेदी ने दिग्गी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।
यूपीए की सरकार के समय भी कांग्रेस नेता जयराम रमेश के सुर पार्टी नेतृत्व से जुदा रहे हैं। बटला हाउस एनकाउंटर मामले भी दिग्विजय सिंह इसे फर्जी बताकर अलग राग अलापते रहे हैं, जबकि कांग्रेस के दिग्गज नेता शिवराज पाटिल इसे सही करार दे रहे हैं। हार दर हार के बाद भी कांग्रेस जिस तरह सबक नहीं ले रही है और उसके नेता मुंडे मुंडे मति भिन्ना की राह पर चल रहे हैं, उससे भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना पूरा होते देर नहीं लगेगी।
2013 के बाद से अब तक कांग्रेस कर्नाटक, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, पुडुचेरी, मेघालय तक सिमट कर रह गई है। कहा जाए तो पार्टी अब तक सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चाहिए वे पार्टी को एकजुट रखने की कोशिश करें, अपने नेताओं में आत्मविश्वास भरें और अपने नेताओं पर भरोसा करें। बॉन्ड भरवाने जैसे कदम से कांग्रेस मजबूत नहीं होगी, बल्कि देशहित में सहयोग करने से पार्टी में लोगों का भरोसा बढ़ेगा। वरना अतीत बन कर रह जाएगी।
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