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चिंतन: असम को विकास के डोर में बांधने की बड़ी चुनौती

सम में इस बार भाजपा को सत्ता भी कांग्रेस के 15 साल के शासन को उखाड़ कर ही मिली है।

चिंतन: असम को विकास के डोर में बांधने की बड़ी चुनौती
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असम में पहली भाजपा सरकार के शपथ लेते ही पूर्वोत्तर राज्यों में पार्टी के विस्तार का द्वार खुल गया है। इसी के साथ असम के 14वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले सर्बानंद सोनोवाल के सामने चुनाव के समय किए गए वादों को पूरा करने की चुनौती भी शुरू हो गई है। कांग्रेस मुक्त भारत के भाजपा के अभियान के लिए पूवरेत्तर के सेवन सिस्टर्स स्टेट (असम, मिजोरम, मणिपुर, मेघालय, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम) बेहद अहम हैं।

इन सभी राज्यों में अधिकांश समय कांग्रेस का ही शासन रहा है। कभी कभार ही क्षेत्रीय पार्टियां सत्ता में रही हैं। इसलिए पूवरेत्तर राज्यों में कांग्रेस की जड़ें मजबूत हैं। असम में इस बार भाजपा को सत्ता भी कांग्रेस के 15 साल के शासन को उखाड़ कर ही मिली है। ऐसे में पूवरेत्तर में भाजपा के लिए अपनी जमीन तैयार करना कठिन चुनौती से कम नहीं है। इस चुनौती को असम में सर्बानंद सरकार का प्रदर्शन कम कर सकता है। भाजपा ने सोच-समझ कर ही सर्बानंद को कमान सौंपी है।

चुनाव से पहले भाजपा ने असम गण परिषद और बोडो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के साथ गठबंधन किया था। इसलिए पार्टी पर अपने दोनों सहयोगियों को साथ लेकर चलने का दबाव है। सोनोवाल के पक्ष में खास बात यह है कि वे असम गण परिषद (अगप) में पांच साल रहे हैं। इसलिए उन्हें अगप नेताओं से तालमेल बिठाने में दिक्कत नहीं होगी। उसी तरह बीपीएफ विचारधारा के स्तर पर भाजपा के करीब है। दोनों ही दल बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ हैं।

असम में बोडो समुदाय की 28 फीसदी आबादी है और वे खुद को असम के मूलनिवासी मानते हैं। इस चलते उसकी आदिवासियों व घुसपैठिए मुस्लिमों से तकरार चलती रहती है। इस चुनाव में भाजपा गठबंधन ने बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठ को मुख्य मुद्दा बनाया था। सर्बानंद सोनोवाल को राज्य में प्रसिद्धि भी 1983 में 1951 से 1971 के बीच भारत आने वाले बांग्लादेशियों को नागरिकता देने के तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ने के चलते मिली। इसमें सोनोवाल इंदिरा सरकार के विवादास्पद कानून को रद करवाने में सफल हुए थे।

इसलिए आज जब वे सत्ता में आए हैं, हो उन पर बांग्लादेशी घुसपैठ को रोकने का नैतिक दबाव भी है। इसके अलावा असम उग्रवाद से प्रभावित राज्य रहा है। यहां उल्फा व कई बोडो उग्रवादी संगठन हिंसा में सक्रिय रहे हैं। सोनोवाल के सामने राज्य को उग्रवाद की छाया से मुक्ति दिलाने की भी चुनौती रहेगी। इतना ही सीमावर्ती स्टेट के चलते यहां सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा रहेगा। प्राकृतिक संसाधनों और चाय उत्पादन में सिरमौर होने के बावजूद अभी तक असम का उचित विकास नहीं हो पाया है। बेरोजगारों की बड़ी फौज है। नेशनल हाईवे के सिवा लिंक सड़कों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।

चाय मजदूरों की हालत दयनीय है, जिसके जीवन स्तर में सुधार की जरूरत है। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में काफी सुधार की आवयकता है। बोडो और आदिवासी के बीच जारी संघर्ष को भी सुलझाने की जरूरत है। इसलिए पहली भाजपा सरकार के समक्ष असम को विकास के डोर से बांधने के साथ-साथ सामाजिक समरसता कायम करने की महती चुनौती होगी। असम में भाजपा को इस बात के लिए भी सावधान रहना होगा कि यहां मंदिर और गोहत्या जैसे मसले नहीं चलेंगे। यहां बड़ी तादाद में जनजातीय हिंदू आबादी गोमांस खाती है। सांस्कृतिक रूप से संपन्न अहोम (असम) को भूपेन हजारिका के सपनों का खुशहाल राज्य बनाने के लिए भाजपा गठबंधन सरकार को कड़ी मेहनत और सूझबूझ से काम करना होगा।

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