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कानून के भय संग समाज में भी सुधार की जरूरत

महिलाओं की सुरक्षा खासकर, रात देर तक या रात्रि की पाली में काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा देने की मांग।

कानून के भय संग समाज में भी सुधार की जरूरत

दिल्ली के फास्ट ट्रैक कोर्ट ने धौलाकुआं अपहरण और सामूहिक बलात्कार मामले में दोषी ठहराए गए पांचों दोषियों को उम्रकैद की सजा सुना एक नजीर पेश किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इससे समाज में कानून का भय व्याप्त होगा और वे इस तरह का घृणित अपराध करने से बाज आएंगे। यह मामला 24 नवंबर, 2010 का है, जब दिल्ली के एक कॉल सेंटर में काम करने वाली पूर्वोत्तर राज्य की 30 वर्षीय युवती अपना शिफ्ट खत्म कर अपनी सहकर्मी के साथ धौलाकुआं स्थित अपने घर लौट रही थी। कॉल सेंटर की गाड़ी ने उसे घर की बजाय नजदीक ही रास्ते पर उतारकर चली गई थी। तभी रास्ते में पांचों आरोपी पीड़िता का अपहरण कर मंगोलपुरी ले गए, वहां उसके साथ दुष्कर्म कर उसे सड़क पर अकेला छोड़कर फरार हो गए थे। इस बीच पीड़िता की दोस्त ने पीसीआर को कॉल कर इस घटना की जानकारी दे दी थी। वह इस मामले में अहम गवाह भी है। बाद में छानबीन के दौरान पुलिस ने सभी आरोपियों को हरियाणा के मेवात जिले से गिरफ्तार किया था। उस समय इस घटना के खिलाफ काफी विरोध हुआ था।

महिलाओं की सुरक्षा खासकर, रात देर तक या रात्रि की पाली में काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा देने की मांग जोर पड़ने लगी। उसके बाद दिल्ली पुलिस ने अहम कदम उठाते हुए दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में काम करने वाली सभी कंपनियों को गाइडलाइंस जारी कर महिला कर्मचारियों को सुरक्षित घर पहुंचाने का आदेश दिया था। पुलिस ने अपने आदेश में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया था कि अंधेरे में काम के बाद जब महिला कर्मचारियों को घर छोड़ा जाए तो उनके साथ सुरक्षा गार्ड भी भेजे जाएं। पीड़ित लड़की ने इस केस के खुलासे में काफी हिम्मत दिखाई थी। बाद में उसकी नौकरी छूट गई। वह अपने घर जाने में लिए मजबूर हो गई और घटना के बाद से ही वह सदमे में है।

देखा जाए तो कोई भी सजा अब उस महिला के जख्म को नहीं भर सकती है, लेकिन ऐसे मामलों में दोषी को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए जिससे दूसरे लोगों के लिए वह नजीर बन सके। बलात्कार से पीड़ित युवती के दिमाग, शरीर व मन पर हमेशा दाग रहता है और वह पूरी जिंदगी इस प्रकार की घटना को नहीं भूला सकती। रेप से पीड़िता का मान-सम्मन दांव पर लग जाता है और सदमे में रहती है। शीर्ष अदालत ने इसे आत्मा पर चोट माना है। हालांकि, 2012 के 16 दिसंबर के दिल्ली बलात्कार कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2013 में आपराधिक कानूनों को काफी कठोर बनाया। इसमें रेप के मामलों के लिए फांसी तक की सजा का प्रावधन किया है। साथ ही ऐसे मामलों की सुनवाईफास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाने की व्यवस्था की गई है। ताकी दोषियों को जल्दी और कड़ी सजा मिल सके।

हाल के दिनों में कई बलात्कारियों को फांसी की सजा मिली भी है। इसके बावजूद बलात्कार के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है। साफ है, सिर्फ कड़े कानून से ऐसे मामले नहीं रुक सकते। अब समाज को भी आगे आना होगा। बलात्कार जैसे बर्बर और नृशंस अपराध पर रोक लगाने के लिए परिवार के स्तर पर भी सुधार की जरूरत है।

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