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राष्ट्रपति चुनाव: निर्विरोध ही बने देश के राष्ट्रपति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष ने इस मामले में काफी सोच समझकर फैसला लिया है।

राष्ट्रपति चुनाव: निर्विरोध ही बने देश के राष्ट्रपति
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देश के अगले राष्ट्रपति कौन होंगे यह जानने की उत्सुकता लगभग सभी को है। यूं तो पिछले काफी दिनों से नए राष्ट्रपति के संभावित नामों को लेकर बहुत सी अटकलें लगाई जा रही हैं,

लेकिन राष्ट्रपति चुनाव की अधिसूचना जारी होने और नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के बाद अब सत्ता और विपक्ष दोनों खेमों में मुलाकातों और चर्चाओं के दौर तेजी से चल रहे हैं।

हालांकि राष्ट्रपति चुनाव के वर्तमान समीकरण देखते हुए यह कहा जा सकता है कि एनडीए को अपनी पसंद के उम्मीदवार को राष्ट्रपति बनवाने में कोई मुश्किल नहीं होगी,

फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष इस मामले में काफी सोच समझकर और फूंक फूंक कर कदम इसलिए रख रहे हैं कि ऐसा न हो कि हाथी निकल जाए और पूंछ अटक जाए,

इसीलिए सत्ता पक्ष द्वारा ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं कि राष्ट्रपति पद के लिए सर्वसम्मति बनाकर एक साझा उम्मीदवार ही मैदान में आए। इसके लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने केन्द्रीय मंत्रिमंडल के तीन वरिष्ठ भाजपा नेताओं की एक समिति भी बना दी है,

जिसमें राजनाथ सिंह, अरुण जेटली और वेंकेया नायडू हैं। सरकार की मंशा तो यह भी लगती है कि राष्ट्रपति का चयन निर्विरोध ही हो जाए, लेकिन विपक्ष के पिछले दिनों के तेवर देखते हुए ऐसी सम्भावना बहुत ही क्षीण हैं कि राष्ट्रपति का चुनाव निर्विरोध हो जाए।

हालांकि अभी तक विपक्ष ने इस मुद्दे पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन लग रहा है कि विपक्ष के कुछ दल भाजपा-एनडीए के उम्मीदवार को अपना समर्थन दे देंगे, लेकिन समूचा विपक्ष ऐसा नहीं करेगा और आदतन सत्ता पक्ष को टक्कर देने के लिए कुछ दल मिलकर अपना कोई न कोई उम्मीदवार मैदान में उतारेंगे ही।

यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह चमत्कार ही होगा। हम यदि साल 1950 से लेकर सन 2012 के अब तक के राष्ट्रपति के चुनावों पर नजर डालें तो अब तक इस पद पर आसीन 13 राष्ट्रपति में से सिर्फ एक राष्ट्रपति निर्विरोध चुने गए।

वह राष्ट्रपति थे नीलम संजीव रेड्डी जो इस पद पर जुलाई 1977 में तब निर्विरोध चुने गए जब केंद्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार थी, लेकिन उससे पहले या बाद में कभी निर्विरोध

राष्ट्रपति नहीं चुने जा सके। असल में भाजपा के पास अपने एनडीए के अन्य सहयोगी दलों सहित राष्ट्रपति चुनाव के लिए जो मत हैं उसे सीधे रूप में कुछ ऐसे समझा जा सकता है कि एनडीए के पास 49 प्रतिशत मत हैं और उसे अपनी पसंद का राष्ट्रपति बनवाने के लिए कुछ 51 प्रतिशत मत चाहिए।

आगामी 17 जुलाई को राष्ट्रपति चुनाव होने पर कुल 776 सांसद और 4120 विधानसभा सदस्य अर्थात कुल 4896 व्यक्ति नया राष्ट्रपति चुनेंगे। राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपनाई गई प्रणाली के अनुसार निर्वाचन मंडल के इन 4896 मतों का मत मूल्य 10 लाख 98 हज़ार 882 है।

इनमें सांसदों का मत मूल्य 5 लाख 49 हज़ार 408 और विधायकों का मत मूल्य 5 लाख 49 हज़ार 474 है। एनडीए दलों के पास अपने सांसदों और विधायकों के जो कुल मत हैं उनका मत मूल्य 5 लाख 32 हज़ार है, जबकि राष्ट्रपति के अपने उम्मीदवार को जीतने के लिए सत्ता पक्ष को 5 लाख 49 हज़ार 442 मतों की आवश्यकता है,

क्योंकि राष्ट्रपति चुनाव में विजयी होने के लिए कुल मतों के आधे से एक अधिक मत की आवशयकता होती है। इस हिसाब से सत्तापक्ष के पास कुल 17442 मतों की कमी है,

लेकिन दो गैर एनडीए दलों वाईएसआर कांग्रेस और टीआरएस द्वारा एनडीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार को अपना समर्थन देने से इन कम मतों की आवश्यकता आराम से पूरी हो जाती है।

इस प्रकार भाजपा को अपने उम्मीदवार को राष्ट्रपति बनवाने में कोई समस्या नहीं है, लेकिन इस सबके बाद दो समस्याएं हैं। एक यह की एनडीए के कुल मतों में शिवसेना के 25893 मत भी शामिल हैं।

शिवसेना राष्ट्रपति चुनाव में अपना अलग रुख अपना सकती है । इस बात के संकेत रह रह कर मिल रहे हैं। शिवसेना राष्ट्रपति पद के लिए कभी मोहन भागवत और कभी शरद पवार के नाम पर अपना समर्थन देने की बात के साथ अब इस पद के लिए हरित क्रांति के जनक माने जाने वाले 91 वर्षीय एमएस स्वामीनाथन का नाम आगे कर चुकी है,

हालांकि लग रहा है कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की नितिन गडकरी और अमित शाह से मुलाकात के बाद शिवसेना, भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार के समर्थन के लिए तैयार हो जाएगी, लेकिन पक्के तौर पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।

फिर जिस प्रकार चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति की अधिसूचना जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति चुनाव मे कोई भी दल अपने सदस्यों को किसी व्यक्ति विशेष को मत देने के लिए व्हिप जारी करके बाध्य नहीं करेगा।

ऐसे में यदि कुछ मतदाता पार्टी लाइन से अलग हटकर अपने पसंद के व्यक्ति को मत देते हैं तब भी भारतीय जनता पार्टी के लिए थोड़ी बहुत समस्या हो सकती है, इसलिए भारतीय जनता पार्टी की तीन सदस्यी समिति विपक्ष के सभी प्रमुख दलों से अलग-अलग मिलकर अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहती है।

इससे यह सन्देश भी जाता है कि भाजपा ने सत्ता में मजबूत स्थिति में रहते हुए भी शिखर व्यक्तित्व के चुनाव के लिए सभी दलों के सुझाव और सभी को साथ लेने का प्रयास किया।

भारतीय जनता पार्टी इस पद पर अपने किस उम्मीदवार को उतारती है यह अभी तक स्पष्ट नहीं है, जबकि मोहन भागवत,लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुमित्रा महाजन, सुषमा स्वराज, थावर चंद गहलोत, मनोहर परिकर और द्रौपदी मुर्मू जैसे कई नाम सामने आ रहे हैं।

यूं झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू का नाम लोगों को चौंकाता है, लेकिन उनका नाम इसलिए सामने आ रहा है कि वह अपनी बेहद सादगी, ईमानदारी और अपनी साफ़ सुथरी छवि के लिए जानी जाती हैं।

इससे बढ़कर यह भी कि वह आदिवासी हैं और अभी तक कोई भी आदिवासी भारत का राष्ट्रपति नहीं बना है, लेकिन कौन बनेगा राष्ट्रपति इसका सटीक परिणाम तो 20 जुलाई को आएगा,

लेकिन इसका संकेत 23 जून के आसपास मिल जाएगा। क्योंकि उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी अमेरिका यात्रा से पहले ही एनडीए के अपने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का नामांकन करा देंगे।

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