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बांग्लादेश की अदालत के फैसले का कड़ा संदेश

दुनिया के बड़े विद्रोहों में शुमार की जाने वाली बांग्लादेश राइफल्स के जवानों द्वारा 2009 में अंजाम दिए गए खून-खराबे की घटना के खिलाफ वहां की विशेष अदालत ने 152 विद्रोही जवानों को मौत सजा दी गयी है।

बांग्लादेश की अदालत के फैसले का कड़ा संदेश

दुनिया के बड़े विद्रोहों में शुमार की जाने वाली बांग्लादेश राइफल्स (अब बॉर्डर गॉर्ड बांग्लादेश) के जवानों द्वारा 2009 में अंजाम दिए गए खून-खराबे की घटना के खिलाफ वहां की विशेष अदालत ने 152 विद्रोही जवानों को मौत, 158 को उम्रकैद और करीब ढ़ाई सौ विद्रोही जवानों को तीन से दस साल की सजा सुनाई है। बांग्लादेश राइफल्स के पूर्व उपसहायक निदेशक तौहीद अहमद को भी फांसी की सजा मिली है, तौहीद विद्रोहियों के लीडर थे। देखा जाए तो यह फैसला दुनिया भर में होने वाली ऐसी घटनाओं के लिए एक कड़ा संदेश दे रहा है। ऐसी घटनाओं में वैसे लोगों की निर्ममता से हत्या कर दी जाती है, जो निदरेष होते हैं। मौके पर मौजूद साथी जवान या आम नागरिक दूसरों की गलतियों, तनावों या असंतोषों का शिकार हो जाते हैं, जो कि काफी दुर्भाग्यपूर्ण है। यह घटना 25-26 फरवरी 2009 की है जब बांग्लादेश के पैरामिलिट्री बॉर्डर गार्ड के जवानों ने वेतन और अन्य शिकायतों को लेकर उच्च अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। शेख हसीना के बांग्लादेश का प्रधानमंत्री बनने के दो महीने बाद ही घटी इस घटना ने सरकार के सामने बड़ी चुनौती पेश कर दी थी। यह बगावत बांग्लादेश राइफल्स के ढाका मुख्यालय से शुरू हो कर बड़ी तेजी से महज तीस घंटों के अंदर क्षेत्रीय यूनिटों को अपनी चपेट में ले लिया था। इसमें अधिकांश बड़े अधिकारी मारे गए थे। इस घटना ने दुनिया को सन्न कर दिया था। इसमें विद्रोहियों ने मानवाधिकारों के उल्लंघन का ऐसा शर्मनाक और वहशियाना खेल खेला था, जिसे देखने वालों के लिए बयान करना कठिन हो रहा था। इस दौरान बांग्लादेश राइफल्स के विद्रोही जवानों के रास्ते में जो भी आया उसे गोली मार दी गई, जिंदा जला दिया गया और कई को तो गंभीर यातनाएं दे कर मार दिया गया। शवों को नालों और कब्रों में फेंक दिया गया। दो दिनों तक बांग्लादेश की सड़कों पर मानवता का नंगा नाच उन लोगों द्वारा किया जा रहा था, जिनके ऊपर देश की सुरक्षा और मानवता की रक्षा का भार होता है। आरोपियों, गवाहों और मारे गए लोगों की दृष्टि से इसे सामूहिक रूप से आपराधिक मुकदमा चलाए जाने के विश्व के सबसे बड़े मामलों में से एक माना गया है। निस्संदेह इस फैसले से जिन्होंने अपनों को खोया है, उन्हें कुछ सांत्वना जरूर मिली होगी। परंतु दुनिया में अभी भी सेना व अर्धसैनिक जवानों की अमानवीय कार्रवाई में मारे गए लोगों को न्याय का इंतजार है। पहले इराक और अब अफगानिस्तान में मौजूद अमेरिकी सेना द्वारा संदिग्ध आतंकवादियों की धर पकड़ के क्रम में निदरेष नागरिकों की जानें गई हैं। और वहां अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन आम बात है। इसी प्रकार श्रीलंका में 2009 में कथित तौर पर एलटीटीई के खिलाफ युद्ध के अंतिम दिनों में श्रीलंकाई सैन्य अभियान में हजारों निदरेष तमिल नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया गया था। तिब्बत में चीनी सेना के खिलाफ भी मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले आते रहे हैं। भारत में भी थोड़े अंतरालों में साथी जवानों को गोली मारे जाने की घटना सामने आती रहती है। अब इन सैनिकों के शिकार हुए निर्दोष लोगों को भी जल्दी से न्याय मिलना चाहिए।

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