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सेना : महिलाओं को मिला अधिकार

अदालत ने सरकार की सोच को नकारते हुए महिला अफसरों को कंमाड पोस्टिंग देने के रास्ते खोल दिए हैं। इस तरह सर्वोच्च अदालत ने बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओं वाले सरकारी सामाजिक नारे में बेटी आगे बढ़ाओं भी जोड़ दिया है। यानी बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं व बेटी आगे बढ़ाओं का सामाजिक नारा

सेना में महिलाओं को भी मिलेगा स्थाई कमीशन का लाभ, जानें आखिर क्यों पहुंचा था ये मामसा सुप्रीम कोर्टसुप्रीम कोर्ट ने सेना में महिलाओं को बराबर अधिकार का दिया आदेश

हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने सेना में महिला अफसरों को कमांड पोस्टिंग देने के रास्ते खोल दिए और इस अहम फैसले से महिलाओं ने सेना में बराबरी के हक की 17 साल लंबी कानूनी लड़ाई जीत ली। इसी के साथ-साथ सर्वोच्च अदालत ने पुरुष प्रधान सोच वाले सरकारी अफसरों को सैन्य महिला शक्ति से भी रूबरू करवा दिया। वैसे जिस सरकार की महत्वाकांक्षी योजना बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओं है, वही सरकार सर्वोच्च अदालत में महिलाओं को नियुक्ति नहीं देने के पीछे उनकी शारीरिक क्षमताओं और सामाजिक मानदंडों की दलील देती है। सरकार की यह दलील कि महिलाओं को कंमाड पोस्ट का जिम्मा नहीं दिया जा सकता क्योंकि पुरुष उनका आदेश नहीं मानेंगे। मगर अदालत ने सरकार की सोच को नकारते हुए महिला अफसरों को कंमाड पोस्टिंग देने के रास्ते खोल दिए हैं।

इस तरह सर्वोच्च अदालत ने बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओं वाले सरकारी सामाजिक नारे में बेटी आगे बढ़ाओं भी जोड़ दिया है। यानी बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं व बेटी आगे बढ़ाओं का सामाजिक नारा। सर्वोच्च अदालत ने अपने एक आदर्श फैसले में सरकार को आदेश दिया कि उन सभी महिला अफसरों को तीन माह में स्थायी कमीशन दिया जाए जो यह विकल्प चुनना चाहती हैं। सैन्य बलों में लंैगिक भेदभाव खत्म करने पर जोर देते हुए अदालत ने केंद्र की दलील खारिज करते हुए कहा कि मानसिकता बदलनी होगी। सरकार की इस दलील को परेशान करने वाला बताया कि शारीरिक और सामाजिक स्थितियों के कारण महिला अफसरों को सेना में कंमाड पोजिशन नहीं दी जा सकती। जस्टिस धनंजय वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि महिला अफसरों ने पहले भी देश का सम्मान बढ़ाया है व कई वीरता पदक मिले हैं। सैन्य बलों में लैंगिक दुराग्रह खत्म करने के लिए सरकार को सोच बदलनी होगी। पीठ ने केंद्र सरकार की यह कह कर भी खिंचाई की कि महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने संबंधी उच्च अदालत के फैसले पर रोक नहीं होने के बावजूद सरकार ने निर्देश लागू करने के प्रति नाममात्र सम्मान दिखाया। केंद्र को उच्च अदालत के फैसले के अनुरूप्ा काम करना चाहिए था। सर्वोच्च अदालत ने साफ किया कि महिलाओं को स्थायी कमीशन दे सकते हैं। चाहे उनकी सेवा अवधि कितनी भी क्यों हो।

जो महिलाएं स्थायी कमीशन का विकल्प नहीं चुनतीं, उनकी 20 साल तक की पेंशन वाली नौकरी होगी। दरअसल यह फैसला लंबे वक्त से अटका था। महिलाओं को स्थायी कमीशन देने की मांग बावत 2003 में पहली जनयाचिका डाली गई थी। 2010 में दिल्ली उच्च अदालत ने महिला अफसरों के पक्ष में फैसला सुनाया, मगर उस समय केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार इस फैसले को लेकर सर्वोच्च अदालत चली गई। यहां तक कि सर्वोच्च अदालत ने भी उच्च अदालत के फैसले पर रोक नहीं लगाई थी। सर्वोच्च अदालत के महिलाओं को बराबरी का हक देने वाले इस फैसले पर अब राजनीति भी शुरू हो गई है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी ने भाजपा को घेरते हुए इस मुद्दे पर सरकारी दलील को महिला विरोधी व देश की हर महिला का अपमान बताया तो उधर भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि कंमाड पोस्ट से इनकार का मुद्दा कांग्रेस की विरासत था। बहरहाल अब तक महिला अधिकारियों को सिर्फ न्यायाधीश एडवोकेट जनरल और सेना शिक्षा की कोर में स्थायी कमीशन की अनुमति थी। अब सिग्नल, इंजीनियर, आर्मी एयर डिफेंस, इलेक्ट्राॅनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर,आर्मी सर्विस काॅप्र्स,आर्मी आडिॅनेंस काॅप्र्स और इंटेलीजेंस में भी स्थायी कमीशन मिलेगा। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि महिलाओं को युद्धक भूमिका देने का फैसला अदालत ने सरकार व सेना पर छोड़ दिया है।

दरअसल, युद्ध में शुत्रओं से मुकाबला करने वाली भूमिकाओं में महिलाओं की स्थिति में फिलहाल कोई बदलाव नहीं हुआ है। लिहाजा वे पैदल सेना, तोपखाने और बख्तरबंद कोर में शमिल नहीं हो सकेंगी। अब सर्वोच्च अदालत का यह फैसला यह उम्मीद भी जगाता है कि आने वाले वक्त में महिलाओं की युद्धक भूमिका वाले सरकारी स्टेंड में बदलाव देखने को मिले। क्योंकि यह बदलाव सेना में महिलाओं को और आगे ले जाने वाला साबित होगा। 21वीं सदी के भारत की पहचान महज स्मार्ट सिटी योजना, बुलेट ट्रेन योजना, 5जी से ही नहीं होगी बल्कि इस मुल्क की सरकार, समाज व संस्थाएं लैंगिक बराबरी के लिए क्या अंदरुनी, जमीनी स्तर पर बदलाव करते हैं और उनका क्या असर दिखाई देता है, ऐसे ठोस प्रयासों से भी होगी। बहरहाल सर्वोच्च अदालत ने अपने इस फैसले से सेना में कार्यरत महिला अफसरों के अलावा मुल्क की स्कूल में जाने वाली लड़कियों से लेकर अपना कॅरियर बनाने वाली लड़कियों के सामने पुरुषों के समान ही कार्यअवधि का मौका यानी बराबरी का हक देकर उनके लिए सेना ज्वाइन करने के अवसरों का विस्तार कर दिया है। उम्मीद है कि इससे देश में एनसीसी ज्वाइन करने वाली लड़कियों की संख्या में इजाफा होगा और यही नहीं अब देश की आर्मी भी कंमाड पोजीशन पर प्रोन्नति के लिए नियुक्ति के नियम बदलने के लिए विवश होगी।

(वरिष्ठ लेखिका अलका आर्य की कलम से)

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