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अनुज लुगुन की दो कविताएं

दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की रैली में एक किसान की आत्महत्या के बाद लिखी गई ऐसी ही एक कविता

अनुज लुगुन की दो कविताएं
युवा कवि अनुज लुगुन अपनी धारदार कविताओं के लिए जाने जाते हैं और जब भी कभी उन्हें लगता है कि कोई भी व्यवस्था आम आदमी के विरुद्ध जा रही है उनकी कलम बरबस उठ जाती है विरोध करने के लिए। दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की रैली में एक किसान की आत्महत्या के बाद लिखी गई ऐसी ही एक कविता आत्महत्या के विरुद्ध और साथ ही उनकी एक और कविता मेट्रो मुलाकात।
आत्महत्या के विरूद्ध
वे तुम्हारी आत्महत्या पर अफ़सोस नहीं करेंगे
आत्महत्या उनके लिए दार्शनिक चिंता का विषय है
वे इसकी व्याख्या में सवाल को वहीँ टांग देंगे
जिस पेड़ पर तुमने अपना फंदा डाला था
यह उनके लिए चिंता का विषय नहीं होगा
वे जानते हैं गेंहूँ की कीमत लोहे से कम है
और इस वक्त वे लोहे की खेती में व्यस्त हैं
लोहे की खेती के लिए ही उन्होंने आदिवासी गाँवों में
सैन्य छावनी के साथ डेरा डाला है
लोहे की खेती के विरूद्ध ही आदिवासी प्रतिघाती हुए हैं
उसी खेती के बिचड़े के लिए उन्हें तुम्हारी जमीन भी चाहिए
तुम आत्महत्या करोगे और उन्हें लगेगा
इस तरह तो वे गोली चलाने से बच जायेंगे
और यह उनकी रणनीतिक समझदारी होगी
वे तुम्हारी आत्महत्या पर अफ़सोस नहीं करेंगे
उन्हें सिर्फ़ प्रतिघाती हत्याओं से डर लगता है
और जब तुम प्रतिघात करोगे
तुम्हारी आत्महत्या को वे हत्याओं में बदल देंगे |
अनुज लुगुन
(शीर्षक के लिए रघुवीर सहाय का आभार लेकिन यह ठीक उसी रूप में उद्धृत नहीं है |)
मेट्रो-मुलाकात

हम एक-दूसरे से मिले और मिलते ही
हमने एक-दूसरे को सूंघना शुरू किया ,
उन्होंने मुझे आँखों से बातों से कुत्ते की तरह
सूँघना शुरू किया कि मैं उनकी सोच और मंशा की
गली का हूँ या नहींमैंने भी उन्हें
अपने सवालों से उत्तरों से सूअर की तरह
नथूने उठा-उठा कर सूंघने लगा कि
वह इस कचरे में स्वादिष्ट और खाने लायक वस्तु है या नहीं
और हमसे बाहर की दुनिया हम दोनों से बेखबर
खुद भी यही क्रियासंचालित करती हुई व्यस्त थी |
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