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प्रमोद जोशी का लेख : अमेरिकी बीरबल की खिचड़ी

अमेरिका में हुए राष्ट्रपति के चुनाव का परिणाम आने में अभी और समय लग सकता है। जॉर्जिया ने फिर से गिनती करने की घोषणा की है। इसके साथ ही कुछ दूसरे राज्यों में भी ट्रंप की टीम ने अदालतों में अर्जियां लगाई हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि न्यायिक प्रक्रिया में कितना समय लगेगा। फ्लोरिडा विवि के प्रोफेसर माइकेल मैक्डोनाल्ड ने ट्वीट किया है कि 120 साल बाद अमेरिका में सबसे ज्यादा मतदान हुआ है। अनुमान है कि करीब 16 करोड़ यानी 66.9 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाले हैं। सन 1900 में 73.2 फीसदी वोट पड़े थे। इस बार इन 16 करोड़ में से 10 करोड़ से ज्यादा वोट डाक से आए हैं। चुनाव परिणाम आने में हो रही देरी के कारण तो अमेरिकी चुनाव-व्यवस्था बीरबल की खिचड़ी ही साबित हो रही है।

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अमेरिका चुनाव

प्रमोद जोशी

अमेरिकी चुनाव-व्यवस्था बीरबल की खिचड़ी साबित हो रही है। लगता है कि अंतिम परिणाम आने में अभी और समय लगेगा। जॉर्जिया ने फिर से गिनती करने की घोषणा की है। कुछ दूसरे राज्यों में ट्रंप की टीम ने अदालतों में अर्जियां लगाई हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि न्यायिक प्रक्रिया में कितना समय लगेगा, पर वर्ष 2000 में केवल फ्लोरिडा का मामला अदालत में गया था, जिसका फैसला 12 दिसंबर को हो पाया था। इस बार तो ज्यादा मामले हैं।

यह भी करीब-करीब साफ है कि डोनाल्ड ट्रंप चुनाव हार रहे हैं। परिणाम आने में देर इसलिए भी हुई, क्योंकि डाक से भारी संख्या में मतपत्र आए हैं। ऐसा कोरोना के कारण हुआ है। डाक से आए ज्यादातर वोट बिडेन के पक्ष में हैं, क्योंकि ट्रंप ने अपने वोटरों से कहा था कि वे कोरोना से घबराएं नहीं और मतदान केंद्र में जाकर वोट डालें, जबकि बिडेन ने डाक से वोट देने की अपील की थी।

सवाल है कि डाक के वोट कब तक स्वीकार किए जाएंगे। इस मामले में राज्यों के अलग-अलग नियम हैं। अमेरिका चूंकि वास्तविक अर्थ में संघ है, इसलिए वहां केंद्रीय नियम कम होते हैं, इसीलिए ट्रंप को अलग-अलग राज्यों की अदालतों में अपील करनी पड़ रही है। इस बार भारी संख्या में मतदान हुआ है। फ्लोरिडा विवि के प्रोफेसर माइकेल मैक्डोनाल्ड ने ट्वीट किया है कि 120 साल बाद अमेरिका में सबसे ज्यादा मतदान हुआ है। अनुमान है कि करीब 16 करोड़ यानी 66.9 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाले हैं। सन 1900 में 73.2 फीसदी वोट पड़े थे। इन 16 करोड़ में से 10 करोड़ से ज्यादा वोट डाक से आए हैं।

जीत और हार राजनीति का हिस्सा है। चुनाव केवल राष्ट्रपति पद का ही नहीं हुआ है। प्रतिनिधि सदन और सीनेट का भी हुआ है। लगता है कि सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी की बढ़त बनी रहेगी और प्रतिनिधि सदन में डेमोक्रेट्स की। इसका मतलब है कि यदि बिडेन राष्ट्रपति बने, तो सीनेट में उन्हें दिक्कतें होंगी। इस चुनाव ने अमेरिका के ध्रुवीकरण को बढ़ाया है। मूल रूप से देहाती इलाकों में रहने वाले गोरे, हिस्पानी, क्यूबाई और लैटिन अमेरिकी देशों के यूरोपीय मूल के ज्यादातर लोग रिपब्लिकन पार्टी के साथ हैं और अश्वेत, एशियाई तथा अफ्रीकी मूल के नागरिक डेमोक्रेट्स के साथ हैं। हाल के वर्षों में मुस्लिम समुदाय डेमोक्रेट्स का कोर वोटर बना है।

बहरहाल चुनाव पूरा होने के बाद मतदान के सांख्यिकीय-विश्लेषण से पता लगेगा कि इस चुनाव का अमेरिकी सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा है। यह डेटा मतदाताओं की जातीय संरचना, आयु, लिंग और निवास के इलाके से जुड़ा होगा। उससे पता लगेगा कि अमेरिका का कौन सा समुदाय किस तरफ है। इसमे दो राय नहीं कि कोरोना इस वक्त देश की बड़ी समस्या है, पर कोरोना के बावजूद ट्रंप के खिलाफ कोई लहर नहीं बनी। ध्रुवीकरण देश की राजनीति के लिए हितकर नहीं है। ट्रंप ने अपनी राजनीति की शुरुआत अमेरिका फर्स्ट के नारे के साथ की थी। इसके आर्थिक निहितार्थ ज्यादा हैं। गोरे नागरिकों को लगता है कि उनकी नौकरियां जा रही हैं, जिनका फायदा चीन जैसे देशों ने उठाया है। ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार भी हुआ है। दूसरी तरफ उनके प्रशासन ने वैश्विक जिम्मेदारियों से हाथ खींचना शुरू कर दिया है। सीरिया और अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के पीछे ट्रंप का यही सिद्धांत काम कर रहा था।

अमेरिका में नागरिकों के बीच जातीय-विद्वेष पहले भी रहा है, पर पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ गया है। हाल में हुए ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन ने इस कटुता को बढ़ाया है। जैसी लूट उस दौरान हुई, उसे देखकर बहुत से नागरिकों ने खामोशी से अपने गुस्से को पी लिया था। बिडेन यदि जीते, तो यह केवल राजनीतिक सफलता होगी। इसे नैतिक सफलता नहीं कह सकते। उन्हें अमेरिका के उन तमाम नागरिकों को भी अपने साथ रखना होगा, जो ट्रंप का समर्थन कर रहे थे।

यह चुनाव परिणाम बेहद कांटे का रहा है। ट्रंप भले ही हार जाएं, पर उनके पीछे का समर्थन कम नहीं था। इन परिणामों का अच्छी तरह विवेचन तो बाद में होगा, पर फौरी तौर पर कुछ बातों का उल्लेख करना जरूरी है। अमेरिकी मीडिया ने करीब एकमत होकर कहा था कि ट्रंप करीब 10 फीसदी वोटों से पीछे रहेंगे। ऐसा नहीं होगा। ट्रंप के खिलाफ कोई ब्लू वेव नहीं थी। वे हारे भी तो बहुत कम अंतर से हारेंगे। 2016 में भी अमेरिकी मीडिया गलत साबित हुआ था। वह अमेरिका के एक बड़े खामोश तबके की राय को पढ़ नहीं पाया था।

बुनियादी तौर पर राजनीतिक नेता नहीं हैं। यह बात उनके पक्ष में भी जाती है और खिलाफ भी जाती है। वे किसी भी समय कुछ भी बोल सकते हैं। वे ट्वीट के माध्यम से बड़ी-बड़ी बातें कह जाते थे। इससे उनकी छवि मुंहफट व्यक्ति की बनती है, जबकि मंजे हुए राजनेता काफी सोच-समझकर बोलते हैं। जनता का एक तबका मुंहफट होता है। उसे गोल-मोल के बजाय साफ बातें पसंद आती हैं। ऐसे में जब ट्रंप का मजाक उड़ाया जाता था, तब उनके समर्थक वर्ग के मन में गुस्सा पैदा होता था। ट्रंप ने अमेरिकी मीडिया की हमेशा आलोचना की और शायद इसीलिए मीडिया भी उनके खिलाफ था।

ट्रंप ने अपनी बातों से अमेरिकी समाज का ध्रुवीकरण किया है, पर कम पढ़े-लिखे गोरों की भावनाओं को भी समझने का काम किया। यदि डेमोक्रेट्स की सरकार आई, तो उसे अब अमेरिकी हितों का ध्यान भी रखना होगा। ट्रंप की पराजय का मतलब यह नहीं है कि वे भावनाएं खत्म हो गई हैं, जो उनके समर्थन में खड़ी थीं। यदि उनकी उपेक्षा होगी, तो वे निश्चित ही और शिद्दत के साथ सामने आएंगी।

ट्रंप के खिलाफ जो बात सबसे ज्यादा सामने आती है, वह वृहत्तर नीतियों के संदर्भ में नहीं है, बल्कि यह है कि राष्ट्रपति जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को कैसा व्यवहार करना चाहिए। शालीनता उनसे दूर रहती है और सनक हावी। उनकी मुद्रा अक्सर धौंस भरी होती है। उन्होंने अपने तमाम सहयोगियों को हाथों-हाथ हटा दिया था। दूसरे वे झूठ का सहारा लेते हैं। मतदान के दौरान भी ऐसा देखने को मिला। कोरोना जैसी महामारी के असर को उन्होंने मानने से ही इनकार कर दिया। डॉ एंथनी फाउची जैसे अपने ही विशेषज्ञों की सलाह को उन्होंने नहीं माना। अक्सर वे बचकाना हरकतें करते देखे जाते हैं।

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