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इलाहाबाद विश्वविद्यालय न्यूज: हॉस्टल के लिए और कितने 'रजनीकांत' को अपनी जान देनी पड़ेगी?

योगेंद्र मिश्रा | UPDATED Feb 2 2019 5:08PM IST
इलाहाबाद विश्वविद्यालय न्यूज: हॉस्टल के लिए और कितने 'रजनीकांत' को अपनी जान देनी पड़ेगी?

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आने वाला हर छात्र अपनी आंखों में सपनों के साथ ही हाथ में आटा और चावल की बोरी भी लेकर आता है। कई छात्रों की आंखों में अधिकारी और बड़ा साहेब बनने के सपने होते हैं। तो वहीं कइयों की इच्छा होती है कि नेता वाला ड्रेस कोड फॉलो करेंगे यानी सफेद शर्ट, सफेद पैंट और सफेद जूता पहन कर नेताही करेंगे। छात्र हितों की बात कहकर चुनाव लड़ेगे। जीत गए तो राजनीति में चले जाएंगे। हार गए तो लोगों को चुनाव लड़वाकर मठाधीशी करेंगे। 

अगर प्रवेश के समय आप इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जाएं तो छात्र हितों की बात करने वाले ऐसे नेता दर्जनों के भाव में मिलेंगे। अपना विजिटिंग कार्ड बांटते हुए ये छात्र नेता यही कहेंगे कि 'अगर कोई दिक्कत हो तो जरूर बताना'। लेकिन अफसोस छात्र हितों की बात करने वाले इन सफेद शर्टधारी नेताओं के होते हुए भी बीए प्रथम वर्ष के छात्र रजनीकांत यादव की जान चली गई। रजनीकांत बीए प्रथम वर्ष का छात्र था। उसने हाल ही में सुसाइड कर लिया। हॉस्टल न मिलने के कारण उसने सुसाइड किया है। सुसाइड नोट में उसने इन बातों का जिक्र किया है।

रजनीकांत ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि- 'मैने ये सब अपनी मर्जी से किया, घर वालों मुझे माफ करना। भाई लोगों ने हमारे लिए बहुत कुछ किया, लेकिन मैं ही नहीं कर पाया। असली दिक्कत मकान मालिकों से है, हमें 4-5 महीने से कह रहा था कि तुम विश्वविद्यालय के हो तुमको नहीं रखेंगे। रोज-रोज यही सुनते कि कब जाओगे, कब मरोगे, उधर हॉस्टल के लिए पता करता तो हौसला सर रोज डांट कर भगा देते थे। कल मैं गया बताया कि तबियत खराब है हमारी, तो कहे कि हम क्या करें जाओ कहीं मरो। भाईयों, अपने भाई के मौत की चिता को शांत मत रखना, उदय, अंकित यादव, राहुल भैया, अखिलेश इसका बदला जरूर लेना।' 

कभी पूरब का ऑक्सफोर्ड बोला जाने वाला इलाहाबाद विश्वविद्यालय आज सिर्फ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की हैसियत रखता है। जो बचा खुचा सम्मान है वो उनकी वजह से है जो बहुत पहले डीएम-एसडीएम बन गए हैं। इविवि में हॉस्टल पाना कितना मुश्किल है मुझे पता है।

पहले लिस्ट में नाम लाने के लिए शिफारिश करो, नाम आ जाए तो किस्मत ही होगी कि उस कमरे में कोई अवैध न रह रहा हो। अगर ऐसा हुआ तो ग्रेजुएशन कंप्लीट हो जाएगा पर कमरा नहीं मिलने वाला। दूर-दराज के जिलों से पढ़ने आए छात्रों को कमरा मिले यह विश्वविद्यालय और वार्डन की जिम्मेदारी है।

इस विषय पर एक छात्र से बात की तो उसने बताया कि 'हॉस्टल के लिए केवल ऑफिसों के चक्कर लगाए जाते हैं। DSW ऑफिस वहां से प्रॉक्टर ऑफिस, वीसी साहब के ऑफिस में नहीं जाते क्योंकि वह छात्रों से नहीं मिलते हैं।'

उसकी यह बात सुन कर मुझे आज से तीन साल पहले वाला अपना समय याद आ रहा है। जब हॉस्टल में साफ पानी नहीं मिलता था। तब हमारे हॉस्टल के कुछ छात्र अगल बगल के हॉस्टलों से पानी भर के लाते थे। कुछ पानी खरीदते थे, तो कुछ टंकी का पानी पीने को मजबूर रहते थे। कई बार पूरे हॉस्टल ने शिकायत की लेकिन कुछ नहीं हुआ।

एप्लीकेशन पर एप्लीकेशन देते रहे पर कुछ नहीं हुआ। दो बार वीसी साहब के ऑफिस मिलने गए पर वो हमसे नहीं मिले। जब पानी की प्यास से नाराज हमने खूब शोर मचाया तो तत्कालीन प्रॉक्टर हर्ष कुमार मौके पर पहुंचे। मुझे याद है समस्याएं सुनने के बजाय वो हम ही लोगों पर चढ़ गए थे। बोले 'मैं क्लास ले रहा था और आप यहां शोर मचा कर डिस्टर्ब कर रहे हैं'। हालांकि उसके बाद जब वो शांत हुए तो हमसे मिले, हमारा प्रार्थना पत्र भी बड़े प्यार से स्वीकार कर लिया। लेकिन हुआ कुछ नहीं। 

इविवि छात्रसंघ के चुनाव को बड़ी ही करीबी से देखा है जहां छात्र नेता विश्वविद्यालय के मुद्दे इस तरह से बताएंगे जैसे अमेरिका का चुनाव लड़ रहे हैं। खास बात यह है कि चुनाव में हर साल मुद्दे नहीं बदलते हैं और न ही नेताओं के भाषण। हर साल हॉस्टल से अवैध छात्रों को हटाने, हॉस्टल में साफ पानी, हॉस्टल आवंटन और क्लासेज में प्रोफेसरों का न आना ही मुद्दा रहता है।

इन समस्याओं का कभी भी समाधान नहीं हो पाता। छात्र नेताओं का भाषण दुष्यंत कुमार की कविता 'हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए' से होता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पीर तो पर्वत सी हो गई लेकिन कोई गंगा नहीं निकली। 

विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रतन लाल हांगलू (Rattan Lal Hangloo) ने आज से 2 साल पहले सभी हॉस्टलों को पूरी तरह खाली करवाया था। जिसे आम भाषा में छात्र 'वॉश आउट' कहते हैं। तब उम्मीद जगी थी कि शायद अब दोबार हॉस्टल पर अवैध छात्रों का कब्जा नहीं होगा। शायद अब एडमिशन के साथ ही हॉस्टल भी मिल जाए।

वॉशआउट के बाद हॉस्टलों की तो हालत सुधर गई, डेंट-पेंट हो गया, पानी के लिए आरओ (RO) की व्यवस्था हो गई, लेकिन अवैध कब्जे नहीं छूटे। अवैध रूप से जो लोग रहते थे उनसे बात की तो उनका कहना था कि 'हमारा कोई शौक नहीं है हॉस्टल में इस तरह रहना, लेकिन विश्वविद्याल के करीब के इलाकों में कमरे महंगे हैं, मतलब दिल्ली-मुम्बई का किराया फेल है। घर वालों के पास इतना पैसा है नहीं कि डेलीगेसी में (बाहर) रह सकें, तो हॉस्टल में ही रह लेते हैं, मकान मालिक किराया इस तरह बढ़ा देते हैं जैसे हनुमान जी की पूछ।' तेलियरगंज, अल्लापुर, गोविंदपुर, सलोरी, बघाड़ा जैसे इलाके में सीलन वाले कमरे भी 4 हजार से पांच हजार रुपए तक मिलते हैं। बहुत सी समस्याएं हैं। किन-किन का जिक्र करें।

सवाल यह है कि अपने घर से दूर पढ़ने के लिए आए छात्र रजनीकांत की मौत का जिम्मेदार कौन है। वो मकान मालिक जो उसे मानसिक रूप से परेशान करता रहा। या वो इलाहाबाद प्रशासन जो सत्र खत्म होने तक भी हॉस्टल आवंटित न कर सका। या वो छात्र नेता या मठाधीश जो छात्र हितों की बात कहते हैं पर हर बार के इस मुद्दे को खत्म नहीं करवा पाते। या वो अवैध कब्जेदार जो कमरे को अपना घर समझ बैठे हैं और हर साल चुनावी कार्यालय के रूप में उसे इस्तेमाल करते हैं। इविवि में पढ़ने के लिए आए हर छात्र को इस बात पर विचार करने की जरूरत है। शायद विचार करने से ही यह फिर पूरब का ऑक्सफोर्ड बन जाए।


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