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प्रदूषण रिपोर्ट / दिलवालों की नहीं मास्क वालों की बन गई दिल्ली

दिल्ली एक समय दिलवालों की हुआ करती थी, लेकिन आज मास्क वालों की बनकर रह गई है। कल तक लेखक अपने घर के बाहर खड़े होकर आसमां में पत्थर फेंक सुराख करने की धमकी देता था, लेकिन वही लेखक आज माइक्रोस्कोप लेकर आसमान खोजने में लगा हुआ है। जो लेखक, पत्रकार को वैज्ञानिक बना दे, प्रदूषण उस बला का नाम है।

प्रदूषण रिपोर्ट / दिलवालों की नहीं मास्क वालों की बन गई दिल्ली
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दिल्ली एक समय दिलवालों की हुआ करती थी, लेकिन आज मास्क वालों की बनकर रह गई है। कल तक लेखक अपने घर के बाहर खड़े होकर आसमां में पत्थर फेंक सुराख करने की धमकी देता था, लेकिन वही लेखक आज माइक्रोस्कोप लेकर आसमान खोजने में लगा हुआ है। जो लेखक, पत्रकार को वैज्ञानिक बना दे, प्रदूषण उस बला का नाम है।

बताया जा रहा है कि दृश्यता मात्र तीन मीटर तक ही रह गई है। अब वक्त है मन की आंखों से दुनिया को देखने का क्योंकि तन की आंखों पर धुंध की परतों ने मस्तिष्क की केबल में फाल्ट कर दिया है, उसी का नतीजा है कि चहुं और धुंआ ही धुआं है। सारा सियापा पटाखे की बत्ती सुलगाने से शुरू होता है।

सबसे बड़े न्याय के मंदिर ने जाहिर चेतावनी के माध्यम से समय सीमा का निर्धारण कर दिया था, लेकिन हमारे देश में बच्चा-बच्चा चेतावनी को चुनौती मान कर उसे पूरा करने बैठ जाता है! साहब यह आज कल की औलादें हैं, ये अपने मां-बाप की नहीं सुनती सुप्रीम कोर्ट की क्या ख़ाक सुनेंगी?

किकी चेलेंज पूरा करने वाली पीढ़ी जब गेम में मौत का आलिंगन करने से हिचकिचाती नहीं है तो फिर यह तो प्राण वायु के प्रवाह का प्रश्न चिन्ह है इसमें वे कैसे पीछे रह सकते थे? चाहे हवा में घुलते जहर को पी लेंगे लेकिन पटाखो से कॉम्प्रोमाइज किसी कीमत पर न होगा! चाहे बेहाल होकर फेफड़े खस्ताहाल क्यों न हो जाएं!

इंसान वो अद्भुत प्राणी है जो पीने का पानी तो फिल्टर करके पीता है, लेकिन हवा स्वयं के क्रिया कलापों से दूषित करके पीने में भी तनिक संकोच नही करता। पटाखे अपने ऊपर इनविटेशन टैग लगा कर नहीं बैठे थे कि मैं बम हूं आओ मुझे फोड़ लो! यदि सीमित मात्रा में खुशियां मनाई होती तो मानव को भी आनंद आता और प्रकृति को भी,

लेकिन विधाता भी न जान पाया कि इंसान की रजा क्या है? यह हिन्दुस्तां है यहां लोग वही करते हैं जो नहीं करना होता है। जहां प्रवेश निषेध का बोर्ड लगा हो सबसे ज्यादा प्रवेश वहीं से किया जाता है। यह आम रास्ता नहीं है लिखी हुई जगह से हर आम गुजर कर अनुभव प्राप्त करता है।

हॉर्न न बजाएं वाली जगहों पर हॉर्न बजा कर आज की पीढ़ी जैसे गंगा स्नान करने सा सुख भोगने वाली फीलिंग प्राप्त करती है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि जिन स्थलों पर यह लिखा जाता है कि यहां लघुशंका करना मना है उसी स्थल पर व्यक्ति अपनी शंकाओं के समाधान करने पहुंच जाता है।

कुल मिलाकर हिंदुस्तान के लोग चेतावनियों को चैलेंज समझ कर एक्सेप्ट कर लेते है। नेताओं ने तो मास्क लगा कर अपनी सेल्फियां सोशल मीडिया अकाउंट पर अपलोड कर भी दी है। यही एक वर्ग है जो सबसे जल्दी रूप बदल लेता है। अब भविष्य के चुनावों में पार्टियों के घोषणा पत्रों में हमारी सरकार बनने पर प्रदूषण फ्री दिवाली होगी जैसे वादों को शामिल करने की संभावनाएं प्रबल हो गई है।

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