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अफगान से रक्षा सहयोग की ओर बढ़ सकता है भारत !

भारत अब तक अफगानिस्तान को सैन्य मदद देने से दूरी बनाए रखी है।

अफगान से रक्षा सहयोग की ओर बढ़ सकता है भारत !
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी दो दिनों के भारत दौरे पर आए हैं। इस दौरान वे भारत के साथ फिर से अहम रक्षा सहयोग की बात करेंगे। सालों से पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई समेत कई अफगान नेता और अधिकारी भारत से सैन्य संबंधी उपकरणों की मांग करते आए हैं। अफगानिस्तान की फौज को तालिबान के खिलाफ लड़ने के लिए और अधिक सैन्य उपकरणों की जरूरत है। पिछले कुछ सालों में तालिबान ने अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों में अपना दखल बढ़ाने में कामयाबी हासिल की है। इसके अलावा देश की सुरक्षा पर इस्लामिक स्टेट का खतरा भी मंडरा रहा है।
अफगानिस्तान को खास तौर पर अपनी एयर फोर्स को मजबूत बनाने की जरूरत है। हालांकि भारत ने पहले से ही अफगानिस्तान को चार हैलिकॉप्टर दे रखे हैं लेकिन अफगान फौज को अपनी ताकत बढ़ाने के लिए और उपकरणों की जरूरत है। लेकिन भारत कई कारणों से अफगानिस्तान के अनुरोध को अब तक टालता रहा है। भारत अब तक अफगानिस्तान में अपनी छवि सॉफ्ट पावर के तौर पर बनाए रखने की नीति पर चल रहा है। भारत ने आंतरिक युद्ध झेल रहे इस देश में मुख्य तौर पर अपनी भूमिका अधारभूत संरचना और सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र के विकास तक सीमित रखी है।
पश्चिमी देशों के सैन्य गठबंधन में शामिल होने के बजाए भारत ने साल 2001 से अफगानिस्तान में सड़क, स्कूल, पावर लाइन्स, संसद की इमारत और बांध बनाने जैसे कामों को अंजाम दिया है। भारत ने अफगानिस्तान को किसी भी तरह की सैन्य मदद देने से दूरी बनाए रखी है। वह अब तक केवल अफगान फौज के अफसरों को भारत में प्रशिक्षिण देता रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अफगानिस्तान और भारत का संबंध सिर्फ दो देशों के बीच का मसला नहीं है। यह उससे कहीं बढ़कर है।
पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अपना दखल बना रखा है और वो सुरक्षा संबंधी मामलों में भारत की भूमिका का जमकर विरोध करता है। भारत पाकिस्तान को नाराज करने से बचता रहा है। हो सकता है कि अमरीका यह चाहता हो कि भारत पाकिस्तान को ज्यादा परेशान न करे। भारत और अफगानिस्तान दोनों ही देशों में मीडिया को इस रवैए में बदलाव की संभावनाएं नजर आ रही हैं लेकिन देखना यह होगा कि भारत इस बार क्या रूख अपनाता है। हालांकि अब अफगानिस्तान के सुरक्षा मामलों में और सहयोग देने के लिए भारत को अमरीका का कहीं अधिक सर्मथन हासिल है।
हाल तक अमरीका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और चीन का एक समूह तालिबान को शांति वार्ता में शामिल करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन यह उनकी यह कोशिश कामयाब नहीं हो पाई। पाकिस्तान इस पहल का एक अहम सदस्य था। लेकिन जानकारों का मानना है कि अमरीका और पाकिस्तान का मनमुटाव इस नाकामयाबी की एक वजह बनी। कुछ महीने पहले तक अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को लेकर अमरीका सजग था लेकिन इस साल की शुरुआत से जब से अमरीका और पाकिस्तान के बीच तल्खी बढ़नी शुरू हुई, ये परिस्थितियां बदलनी शुरू हो गई हैं। तब से अमरीका ने भारत की अफगानिस्तान में बढ़ी हुई भूमिका को सर्मथन देना शुरू कर दिया।
नैटो के रिसॉलुट सपोर्ट मिशन और अफगानिस्तान में अमरीकी फौज के कमांडर जनरल जॉन निकोलसन ने हाल में अपने दौरे के दौरान कहा है कि भारत को अफगानिस्तान को और हैलिकॉप्टर देने चाहिए। पाकिस्तान के अखबार डॉन के मुताबिक पाकिस्तान ने इस पर अपनी नाखुशी जाहिर करते हुए चेतावनी दी- इस तरह का सहयोग पाकिस्तान को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं होना चाहिए। भारत चरमपंथियों और अपराधियों के प्रत्यर्पण को लेकर अफगानिस्तान से होने वाले समझौते पर सहमति बनने की उम्मीद कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, कई चरमपंथी समूह अफगान-पाक सीमा पर सक्रिय हैं, इसलिए अफगानिस्तान के साथ समझौता अहम होगा।
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