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आजादी को 70 साल: गरीबी-जातिवाद मिटाने का संकल्प लेना जरूरी

इस वर्ष हमारी आजादी को 70 साल हो रहे हैं।

आजादी को 70 साल: गरीबी-जातिवाद मिटाने का संकल्प लेना जरूरी
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आजादी के 70 साल हो जाने के बाद भी भारतीय समाज और राजव्यवस्था की कुछ बुनियादी समस्याएं हैं, जो वर्तमान में भी व्यापकता के साथ विद्यमान हैं। जातिवाद, सांप्रदायवाद, क्षेत्रवाद, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, अलगावावाद, नक्सलवाद, उग्रवाद आदि ऐसी समस्याएं हैं, जो देश की तरक्की की राह में बाधा बनी हुई हैं। देश अभी तक गरीबी, आर्थिक विषमता, बेरोजगारी जैसी आर्थिक समस्याओं का सटीक समाधान नहीं कर सका है।

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इस वर्ष हमारी आजादी को 70 साल हो रहे हैं। अगर हम इन सत्तर सालों में अपनी समस्याओं पर काबू नहीं पा सके हैं, निश्चित ही यह हमारी और सरकारों की कमजोरियों के नतीजे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से 2017 को संकल्प वर्ष के रूप में मनाने की अपील की है। इतिहास को देखें तो अगस्त संकल्प का माह रहा है। एक अगस्त 1920 को असहयोग आन्दोलन प्रारंभ हुआ था।

9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ हुआ, जिसे ‘अगस्त क्रांति' के रूप में जाना जाता है। 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हुआ। इसलिए अगस्त माह का भारत के लिए बेहद महत्व है। पीएम ने कहा कि इस माह में हम नया संकल्प ले सकते हैं।

अपनी समस्याओं के समाधान के लिए। जैसे महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया, ठीक वैसे ही हम गंदगी भारत छोड़ो, ग़रीबी भारत छोड़ो, भ्रष्टाचार भारत छोड़ो, आतंकवाद भारत छोड़ो, जातिवाद भारत छोड़ो, सम्प्रदायवाद भारत छोड़ो जैसे संकल्प ले सकते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि ऐसे संकल्प लेने जरूरी हैं। इनमें जातिवाद, सांप्रदायवाद और भ्रष्टाचार को भारत से मिटाने के संकल्प ऐसे हैं, जो जनता के स्तर पर लेने वाले हैं।

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जनता अगर ठान ले कि उसे देश से जातिवाद का खत्मा करना है, सांप्रदायवाद को मिटाना है, तो कोई ताकत उन्हें रोक नहीं सकती है। देश के नागरिक अगर तय कर लें कि हमें किसी भी काम के लिए सरकार के किसी भी अमले को घूस नहीं देना है, तो यकीन मानिये भ्रष्टाचार की कमर टूटते देर नहीं लगेगी। 15 अगस्त को हम स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे।

यह दिवस सभी देशवासियों के लिए आत्ममंथन करने हेतु है कि हमें आजादी कितनी कुर्बानियों के बाद मिली। हमने आजादी एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर, खुशहाल और समानता पर आधारित देश के निर्माण के लिए हासिल की थी, लेकिन चाहे आम आदमी हों या सरकार में बैठे लोग, आजादी के सपनों को पूरा करने की दिशा में हम सभी ने ईमानदारी से काम नहीं किया है।

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हमने जातिवाद, सांप्रदायवाद, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, नक्सलवाद, उग्रवाद, गरीबी, आर्थिक विषमता जैसी समस्याओं के समाधान के लिए शिद्दत से पहल नहीं की है। आजादी के बाद से ही सरकारें अगर सही दिशा में राष्ट्र और नागरिक निर्माण के लिए काम करती रहतीं तो ये तमाम समस्याएं खड़ी ही नहीं होतीं। डा. भीमराव अंबेडकर ने संविधान के जरिये देश में राजनीति लोकतंत्र, सामाजिक लोकतंत्र और आर्थिक लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त किया,

लेकिन देश ने राजनीतिक लोकतंत्र को अधिक अपनाया और हमारी सरकारें नीतियों के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में अधिक काम नहीं किया। इन दोनों में ही जातिवाद, सांप्रदायवाद, भ्रष्टाचार, गरीबी और आतंकवाद जैसी समस्याओं के समाधान के बीज हैं। प्रधानमंत्री ने जिन-जिन संकल्पों का आह्वान किया है, वे सराहनीय हैं और ये हमारे संविधान की मूल भावना के अनुरूप भी हैं।

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इन्हें पूरा करने में सरकार की भूमिका भी अहम हैं। पीएम मोदी भी इस बात को भलीभांति समझते हैं। उम्मीद कर सकते हैं कि सरकारें इन संकल्पों पर ईमानदारी से काम करेंगी और 2022 में जब हम आजादी के 75 साल पूरे होने पर उत्सव मना रहे होंगे, उस समय देश इन समस्याओं से पार पा चुका होगा। जीएसटी आने वाले समय में देश से गरीबी मिटाने और अर्थव्यवस्था को पारदर्शी बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।

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