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संपादकीय लेख : देश में असंगठित क्षेत्र का राष्ट्रीय डाटा होना जरूरी

शीर्ष अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से वन नेशन-वन राशन कार्ड स्कीम और केंद्र से एनआईसी (नेशनल इन्फॉर्मेशन सेंटर) के साथ मिलकर असंगठित मजदूरों के रजिस्ट्रेशन के लिए 31 जुलाई तक पोर्टल डेवलप करने को कहा है। ताकि उन्हें स्कीमों का फायदा दिया जा सके।

संपादकीय लेख : देश में असंगठित क्षेत्र का राष्ट्रीय डाटा होना जरूरी
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : कोरोना की दूसरी लहर बेशक मंद पड़ रही हो, लेकिन तीसरी लहर आने की आशंका सामने है। इस बीच डेल्टा के बाद डेल्टा प्लस वैरिएंट ने भी देश में दस्तक दी है। देश में टीकाकरण मध्यम गति से चल रहा है। हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने के लिए करीब 70 फीसदी आबादी का वैक्सीनेशन जरूरी है। जिसमें बहुत समय लगने वाला है। इसका मतलब है कि देश अगले एक साल तक कोरोना के प्रभाव में रह सकता है। कोरोना प्रभाव का सबसे अधिक असर प्रवासी मजदूरों पर पड़ा है।

पहली लहर में प्रवासी मजदूरों का पलायन पूरे देश ने देखा। उस वक्त प्रवासी मजदूरों की दारूण स्थिति सामने आई थी। यह भी कि प्रवासी मजदूर किस विषम हालात में जीवन यापन करते हैं और उनके लिए सरकार स्तर पर सामाजिक सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है। लॉकडाउन के चलते जब उनके रोजगार छूटे तो उनके सामने रोटी की समसया उत्पन्न हुई। केंद्र की मोदी सरकार ने वन नेशन वन राशन योजना लागू भी की, और कोरोना काल में देश के करीब 80 करोड़ जरूरतमंदों को मुफ्त राशन देने का ऐलान भी किया, लेकिन केंद्र के पास असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूरों का प्रॉपर डाटा नहीं होने से उन्हें योजनाओं का लाभ आसानी से नहीं मिल रहा।

अब सुप्रीम कोर्ट ने मजदूरों को राहत देने की समय सीमा तय कर सराहनीय काम किया है। मजदूरों के प्रति सरकार की संवेदनहीनता लंबे समय से है। उनकी मजदूरी से लेकर सामाजिक सुरक्षा तक पर कभी उचित ध्यान नहीं दिया गया है, जबकि वे अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। शीर्ष अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से वन नेशन-वन राशन कार्ड स्कीम और केंद्र से एनआईसी (नेशनल इन्फॉर्मेशन सेंटर) के साथ मिलकर असंगठित मजदूरों के रजिस्ट्रेशन के लिए 31 जुलाई तक पोर्टल डेवलप करने को कहा है। ताकि उन्हें स्कीमों का फायदा दिया जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से कहा कि वे तब तक कम्यूनिटी किचन चलाएं, जब तक देश में महामारी से पनपे हालात खत्म नहीं हो जाते हैं। पिछली सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि हम चाहते हैं कि कोई मजदूर और उसका परिवार भूखा न रहे। पिछली सुनवाई में अदालत के सामने बंगाल ने कहा था कि आधार के सीडिंग इश्यू को लेकर हम अभी ये स्कीम अपने राज्य में लागू नहीं कर सके हैं। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की थी और कहा था, 'इस पर कोई भी बहाना नहीं बनाना चाहिए।

बंगाल को ये स्कीम लागू करनी चाहिए, क्योंकि ये उन मजदूरों की भलाई के लिए है, जिन्हें हर राज्य में राशन मिलेगा। सभी राज्यों को ये स्कीम आवश्यक तौर पर लागू करनी चाहिए।' मजदूरों के रजिस्ट्रेशन के लिए सॉफ्टवेयर बनाने में देरी पर भी अदालत नाराज थी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सवाल किया था कि सॉफ्टवेयर के न होने पर केंद्र नवंबर तक उन मजदूरों तक प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत फ्री राशन कैसे पहुंचाएगा, जिनका राशन कार्ड ही नहीं है? अभी भी सॉफ्टवेयर नहीं बन पाया है? अभी भी आपको 3-4 महीने क्यों चाहिए? प्रवासी मजदूरों के रोजगार और राशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पहले हुई सुनवाई में भी बड़ी टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा था कि दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सरकारें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आने वाले जिलों में सामूहिक रसोई खोलें ताकि मजदूर और उनके परिवार दो वक्त का खाना खा सकें। अब सरकार को चाहिए कि मजदूरों का डाटा तेजी से तैयार करें, राष्ट्रीय डाटा होना जरूरी है।

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