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इन्द्र कुमार गुजराल : कभी इंदिरा गांधी के थे करीबी, बगावत करके बन गए जनता दल से पीएम

21 अप्रैल 1997 को गुजराल 78 साल की उम्र में देश के 12वें प्रधानमंत्री बने। सियासी जानकार बताते हैं कि उस वक्त हालत कुछ ऐसे थे कि हर कोई यही कह रहा था कि एक महीने भी सरकार नहीं चलाई जा सकती।

इन्द्र कुमार गुजराल : कभी इंदिरा गांधी के थे करीबी, बगावत करके बन गए जनता दल से पीएम

भारतीय राजनीति में तमाम ऐसे उलटफेर देखने और सुनने को मिले हैं जो हर भारतीय को आश्चर्य से भर देता है। हर नेता के साथ अपना एक किस्सा जुड़ा हुआ है। वर्तमान राजनीति को ही देखिए तो हर दिन कोई न कोई घटना ऐसी होती है जो आगे चलकर इतिहास बन जाएगी और हमारी आने वाली पीढ़ी इसे बड़े चांव से सुनेगी। ऐसा ही कुछ किस्सा भारत के 12वें प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के साथ भी था जिनका आज जन्मदिन है।

इंद्र कुमार गुजराल का जन्म 4 दिसंबर 1919 को पंजाब के झेलम में हुआ था। 1947 के बाद ये क्षेत्र पाकिस्तान के हिस्सें में चला गया। इंद्र कुमार निरंजन गुजराल और मां पुष्पा गुजराल के बड़े पुत्र थे। परिवार स्वतंत्रता सेनानी रहा जिसका असर इंद्र कुमार पर भी पड़ा। मां-बाप को देश के खातिर लड़ता देख वह 11 साल की उम्र में ही इस लड़ाई का हिस्सा बन गए। झेलम में ही युवा बच्चों के आंदोलन का नेतृत्व किया। पुलिस की मार खाई। गिरफ्तार हुए, जेल गए, लेकिन आजादी को लेकर जो जज्बा भीतर था वह एक फीसदी भी कम नहीं हुआ।

बचपन के साथ जवानी भी देश के लिए लगा दी। शुरुआती पढ़ाई झेलम में करने के बाद फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज व हैली कॉलेज ऑफ कॉमर्स से पूरी की। पढ़ाई के दौरान वह लाहौर छात्रसंघ के सदस्य थे बाद में संघ के अध्यक्ष बने। इसके बाद झुकाव कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ हुआ तो कार्ड धारी सदस्य भी बन गए। कॉलेज की ही दोस्त और कवि शीला भसीन से 26 मई 1945 को शादी करली। विशाल और नरेश गुजराल उनके दो बेटे हैं।


भारत आजाद हुआ तो वह दिल्ली में बस गए। जो संघर्ष उन्होंने आजादी की लड़ाई में दिखाया वही उन्होने अब दिल्ली की बेहतरी के लिए शुरू किया। साल 1959 में वह नई दिल्ली नगर निगम के उपाध्यक्ष बने। अगले साल रोटरी क्लब नई दिल्ली के अध्यक्ष बने। यहां से उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और 1964 से अगले 12 साल तक राज्यसभा के सदस्य बन गए। इंदिरा गांधी के बेहद करीबी माने जाने वाले इंद्र कुमार 1967 में पहली बार केंद्रीय संसदीय मामले व संचार मंत्री बनाए गए।

एक जिन्दगी में हजार जिन्दगी जीने वाले नेताओं की चर्चा जब होगी तब इंद्र कुमार गुजराल का नाम आएगा। साल 1980 में वह कांग्रेस को छोड़कर जनता दल में चले गए। तमाम मंत्रालयों को संभालने वाले गुजराल जनता दल में शामिल होकर विपक्ष में बैठना उचित समझा। लेकिन समय पलटा और वह 1989 की जनता दल की सरकार में विदेश मंत्री बनाए गए। साल 1996 में एचडी देवगौड़ा सरकार में भी उन्हें इस मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। पड़ोसी देशों के साथ उन्होंने भारत के रिश्तों को बेहतर किया।

21 अप्रैल 1997 को वह 78 साल की उम्र में देश के 12वें प्रधानमंत्री बने। सियासी जानकार बताते हैं कि उस वक्त हालत कुछ ऐसे थे कि हर कोई यही कह रहा था कि एक महीने भी सरकार नहीं चलाई जा सकती। पर गुजराल ने अपने राजनीतिक अनुभव का इस्तेमाल करते हुए देश के विकास की गाड़ी को आगे बढ़ाई पर कुछ ही महीनों बाद सीताराम केशरी ने इंद्र कुमार गुजराल सरकार से अपना समर्थन वापस लेने का फैसला कर लिया।

तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायण ने अगले कुछ दिन राजनीतिक उठा पटक को देखा और 4 दिसंबर को लोकसभा को भंग करने का ऐलान कर दिया। इसके साथ ही 4 दिसंबर को झेलम में जन्मे इंद्र कुमार गुजराल का प्रधानमंत्री पद भी इसी दिन उनसे छिन गया। इंद्र कुमार गुजराल को आज याद किया जाता है उनके विदेश मंत्री रहने के दौरान के फैसलों के लिए। साथ ही ये भी कहा जाता है कि उनके प्रधानमंत्री रहते हुए देश की खुफिया एजेंसियों की मजबूती को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा। 2011 में वह डायलिसिस पर चले गए और अगले एक साल तक वह फिर स्वस्थ नहीं हो सके। अपने जन्मदिन के ठीक चार दिन पहले यानी 30 नवंबर को उनकी मौत हो गई।

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