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Women Hormonal Imbalance: महिलाओं में हार्मोनल बदलाव के कारण उपचार

Health Tips : उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर महिलाओं में कई तरह के शारीरिक बदलाव आते हैं, ऐसा हार्मोनल चेंजेज की वजह से होता है। इस दौरान आपको अपना पूरा ख्याल रखना चाहिए। आपकी जरा सी लापरवाही कई तरह की समस्याओं का कारण बन सकती है। जानिए, अलग-अलग एज में किस तरह के हार्मोनल चेंजेज आते हैं और उन्हें कैसे हैंडल करें?

Women Hormonal Imbalance: महिलाओं में हार्मोनल बदलाव के कारण उपचार

Health Tips: लगभग हर उम्र की महिलाएं समय के साथ-साथ होने वाले शारीरिक विकास और अंदरूनी बदलावों को लेकर अकसर परेशान रहती हैं। उनमें ये बदलाव मुख्य रूप से हार्मोंस की वजह से आते हैं, जो फिजिकल डेवलपमेंट और रिप्रोडक्टिव सिस्टम को कंट्रोल करते हैं। महिला की उम्र और विकास के हिसाब से इन हार्मोंस कारिसाव होता है। कुछ हार्मोंस ब्रेन के हाइपोथैलेमस हिस्से में बनते हैं और कुछ पिट्यूटरी ग्रंथि में बनते हैं।

जहां से ये ब्लड के जरिए लक्षित अंग तक पहुंचते हैं। पिट्यूटरी ग्रंथि से ल्युटिनाइजिंग हार्मोन (एलएच) और फॉलिकिल-स्टीमुलेटिंग हार्मोन (एफएसएच) का स्राव होता है। ये ओवल्यूशन को बढ़ावा देते हैं और प्रेग्नेंसी के लिए बॉडी को तैयार करते हैं। साथ ही ये ओवरी में पहुंचकर एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टरॉन नाम के सेक्स हार्मोन के स्राव को बढ़ावा देते हैं। गर्भवती महिलाओं में ऑक्सीटॉसिन और प्रोलैक्टिन हार्मोन का स्राव पिट्यूटरी ग्रंथि से होता है। ये हार्मोन बच्चे के जन्म और स्तनपान के समय एक्टिव होते हैं।




प्यूबर्टी एज स्टेज

हार्मोंस के प्रभाव से ही 10-12 साल की उम्र यानी प्यूबर्टी स्टेज से लड़कियों में पीरियड्स शुरू होता है। पहले 3-6 महीने में ब्लीडिंग में हार्मोंस तो होते हैं, लेकिनओवरी में एग्स का प्रोडक्शन शुरू नहीं होता। शारीरिक परिपक्वता आती है, कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं। ब्रेस्ट का डेवलपमेंट होता, अंडर आर्म्स औरप्यूबिक एरिया (जननांगों) पर बाल आना, उसके बाद मेनार्ची यानी मासिक चक्र शुरू हो जाता है। हड्डियों का विकास होने से लंबाई में वृद्धि होती है। मसल्स बढ़नेसे बॉडी में सेक्सुअल कर्व्स आते हैं, बॉडी शेप लेती है यानी ब्रेस्ट के साथ हिप्स और थाईज भारी हो जाती हैं।

क्या होती हैं परेशानियां : पीरियड्स के दौरान ज्यादा ब्लीडिंग होना या पेट दर्द की शिकायत होना, ब्लड की कमी, कमजोरी महसूस होना, पर्सनल हाइजीन की कमीसे स्किन इंफेक्शन होना, समुचित जानकारी न होने से गुस्सा, तनाव, चिड़चिड़ापन, आक्रामकता होना, हार्मोनल डिस्बैलेंस, फिजिकल एक्टिविटीज और एक्सरसाइजन होने के कारण उनमें मोटापा, डायबिटीज, थायरॉयड, ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

क्या है उपचार : जरूरी है कि इस उम्र में लड़कियों की काउंसलिंग की जाए। घर पर मां या करीबी लोगों को इस फेज के लिए उसे तैयार करना चाहिए। उन्हें समझाना चाहिए कि मासिक चक्र नेचुरल प्रोसेस है और हर महिला को होता है। शारीरिक बदलावों से घबरा कर घर बैठने के बजाय सामान्य जीवन बिताने, घर से बाहर दोस्तों के साथ फिजिकल एक्टिविटीज करने के लिए मोटिवेट करना चाहिए।

पर्सनल हाइजीन को लेकर अलर्ट रहना चाहिए। दर्द ज्यादा होने पर पेनकिलर लेने या गर्म पानी की बोतल से पेट की सिंकाई करने से परहेज नहीं करना चाहिए। परेशानियों को कम करने के लिए डाइट पर ध्यान देना जरूरी है। जंक फूड के बजाय आयरन, कैल्शियम और प्रोटीन रिच बैलेंस डाइट लेनी चाहिए। जरूरी हो तोएनीमिया लेवल की जांच की जानी चाहिए। हीमोग्लोबिन लेवल 12-12 होना चाहिए यानी 12 साल की उम्र में हीमोग्लोबिन 12 से कम नहीं होना चाहिए।

रिप्रोडक्टिव एज स्टेज

18-19 साल के बाद लड़कियों में रिप्रोडक्टिव या प्रजनन उम्र शुरू हो जाती है और 35-40 साल तक रहती है। इस दौरान ओवरी, यूटरस जैसे सेक्सुअल ऑर्गंस का पूर्ण विकास हो जाता है। इस दौरान हार्मोन असंतुलन की वजह से महिलाएं अकसर प्री-मेंसट्रुएल सिंड्रोम (पीएमएस) से परेशान रहती हैं। पीरियड साइकल में हार्मोंस का उतार-चढ़ाव हो सकता है, जिसका असर महिलाओं के स्वास्थ्य और मूड पर भी पड़ता है।

क्या होती है परेशानियां : इस दौरान कुछ महिलाएं बॉडी में ब्लॉटिंग (गैस या सूजन) महसूस करने लगती है, पेट बढ़ा हुआ महसूस होता है, ब्रेस्ट का साइज बढ़ा हुआ और भारीपन महसूस होता है। चिड़चिड़ापन, थकान, सिरदर्द, घबराहट, अत्यधिक पसीना आना, पेल्विक एरिया में दर्द, मूड स्विंग होना, तनाव, जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ज्यादा मीठी या नमकीन चीजें खाने का मन करता है, जो थायरॉयड, शुगर जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है।

क्या है उपचार : पीएमएस की स्थिति से बचने के लिए जरूरी है हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं और न्यूट्रीशन से भरपूर हेल्दी डाइट लें। इच्छा होने पर भी ज्यादामीठी चीजें खाने से परहेज करना चाहिए। दिन में कम से कम आधा घंटा व्यायाम, एरोबिक्स, योगा या वॉक जरूर करनी चाहिए। पीएमएस की वजह से अगर निजी जिंदगी पर असर पड़ता है तो महिलाओं को तुरंत डॉक्टर को कंसल्ट करना चाहिए।




प्री-मैच्योर मेनोपॉज स्टेज

पीरियड्स पूरी तरह बंद होने के 5-6 साल पहले और उसके एक साल बाद की अवधि इसमें आती है। 40 साल की उम्र के बाद हमारे शरीर में रिप्रोडक्टिव हार्मोंसका स्राव धीरे-धीरे कम होने लगता है। ओवरी भी हार्मोंस बनाना बंद कर देती है और उसका साइज छोटा हो जाता है। मेनोपॉज के दौरान ओवरी में अंडे बनना बंदहो जाते हैं। पीरियड्स होना बंद हो जाते हैं या बहुत कम हो जाते हैं। इस वजह से महिला कंसीव नहीं कर पाती हैं। इसके बाद उनमें धीरे-धीरे कई तरह के शारीरिक बदलाव आने लगते हैं।

क्या होती हैं परेशानियां: मानसिक रूप से इसके लिए तैयार न होने के कारण महिलाओं में टेंशन, डिप्रेशन जैसे इमोशनल डिजीजेज होने लगती हैं। ऑस्टियोपोरोसिस और हृदय रोगों का खतरा बढ़ना। रक्त धमनियों में एस्ट्रोजन हार्मोंस का लेवल कम होने और लिपिड ब्लड फैट बढ़ने के कारण महिलाओं को हार्टअटैक का खतरा बढ़ जाता है। हड्डियों में कैल्शियम की कमी होने लगती है।

बोन डेंसिटी या हड्डियों में सघनता कम होने से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, जिससे फ्रैक्चर के चांस बढ़ जाते हैं। जोड़ों में दर्द या आर्थराइटिस की संभावना भी बढ़ जाती है। बहुत गर्मी लगना, पसीना आना, रात को सोने में दिक्कत होना,स्वभाव में चिड़चिड़ापन आना, मूड स्विंग होना, ब्रेस्ट में सूजन और हल्का दर्द रहना, चेहरे पर अनचाहे बाल आना, वैजाइनल पार्ट में ड्रायनेस आने से बहुत ज्यादाईचिंग होना। पार्टनर के साथ सेक्सुअल ड्राइव में कमी आना।

क्या है उपचार : इस स्टेज में महिलाओं को कैल्शियम आयरन और प्रोटीन से भरपूर डाइट लेनी चाहिए। फिट रहने के लिए नियमित रूप से व्यायाम, योगा,एक्सरसाइज या वॉक करना जरूरी है। अगर आपको वैजाइनल एरिया में ज्यादा ईचिंग हो या 2-3 महीने में ब्लीडिंग ज्यादा हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। रूटीन चेकअप जरूर कराते रहना चाहिए।

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