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लाइफलाइन से दूर हुए बच्चे, स्क्रीन स्ट्रैस से बचाने के लिए बनायें इस तरह रूटीन

लॉकडाउन होने के बाद बच्चों का घर से निकलना बंद है। स्कूल की पढ़ाई बच्चे ऑनलाइन कर रहे हैं। इनका बहुत ज्यादा स्क्रीन पर समय बिताना सही नहीं है। घर में भी सही ढंग से कोई रूटीन न होने पर इनके ऊपर बुरा असर पड़ता है। अगर हम कुछ बातों का ध्यान रखें तो अपने बच्चों को लॉकडाउन के साइड इफेक्ट से बचा सकते हैं।

लाइफलाइन से दूर हुए बच्चे, स्क्रीन स्ट्रैस से बचाने के लिए बनायें इस तरह रूटीनकोरोना वायरस (फाइल फोटो)

लॉकडाउन ने हम सभी के रूटीन वर्क को तहस-नहस कर दिया है। फिर भी जिंदगी तो हर हाल में जीना है। इसलिए सबने जैसे-तैसे अपना रूटीन सेट कर लिया है। लेकिन बच्चों का रूटीन सेट नहीं हो पा रहा है। बच्चे बाहर जाकर खेलने के लिए तरस रहे हैं। वे अपने दोस्तों के घर भी नहीं जा पा रहे हैं। स्कूल बंद हैं ही। इससे वे कहीं न कहीं मानसिक रूप से प्रभावित हो रहे हैं।

लाइफलाइन से दूर हुए बच्चे

स्कूल बच्चों के लिए लाइफलाइन होता है। क्लास में बच्चे की प्रत्यक्ष उपस्थिति और टीचर का संबोधन बच्चों को आकर्षित और प्रभावित करता है। ढेर सारे दोस्तों की मौजूदगी में बच्चे तरोताजा फील करते हैं। उन्हें स्कूल जाना इसलिए पसंद होता है कि तमाम रिस्ट्रिक्शन के बावजूद स्कूल में वे अपने दोस्तों के साथ बातचीत कर सकते हैं। थोड़े अंतराल में पल, दो पल ही सही खेल सकते हैं। ये बातें बच्चे को बच्चा बनाए रखने के लिए काफी हैं। लेकिन आजकल स्कूल लॉकडाउन की वजह से बंद हैं। कुछ स्कूलों में ऑनलाइन क्लासेज शुरू की गई हैं।

स्क्रीन का स्ट्रेस

ऑनलाइन क्लासेस शुरू होने के बाद पढ़ाई से बच्चों का सीमित संपर्क तो बन गया लेकिन लगातार पांच या छह क्लासेस मोबाइल या लैपटॉप पर अटैंड करने के बाद बच्चों में एक अजीब सी, थकान और चिड़चिड़ेपन का भाव देखा जा रहा है। बच्चे अभी तक मोबाइल का इस्तेमाल अपने मनोरंजन के लिए करते थे, लेकिन अब चार-पांच घंटे तक वे उन चीजों के लिए मोबाइल पर समय बिताते हैं, जिसमें उसकी ज्यादा रुचि नहीं है।

ऑनलाइन क्लासेस के बाद बच्चे फिर से मोबाइल में कोई गेम खेलने में लग जाते हैं या टीवी देखने में। इस तरह स्क्रीन टाइम का बढ़ना किसी के लिए भी ठीक नहीं है, बच्चों के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। ऐसे में पैरेंट्स बच्चों के लिए एक लर्निंग टाइम तय कर लें। उस टाइम में वे बच्चों को फिजिकल एक्टिविटी से जुड़ी कोई कला सिखा सकते हैं, जैसे डांस या योगा। इससे बच्चा एक्टिव रहेगा। याद रखें, ये बातें खेल-खेल में होनी चाहिए। उसके ऊपर सीखने का स्ट्रेस नहीं होना चाहिए।

स्क्रीन टाइम कम करें

माना कि बच्चों को ऑनलाइन पढ़ना आज की मजबूरी है। लेकिन स्क्रीन टाइम बढ़ने से बच्चों में चिड़चिड़ापन, सिरदर्द जैसी परेशानियां बढ़ रही हैं। ऐसे में जहां तक संभव हो रीडिंग पीरियड को कम कर एक्टिविटी के जरिए सिखाएं। बच्चों को कविता बोलकर याद कराएं। पढ़ाई को थोड़े-थोड़े पार्ट्स में कराया जाए। ऐसा करने से बच्चा लगातार स्क्रीन की ओर नहीं देखेगा और उसकी आंखों और दिमाग को रिलैक्स मिलेगा। क्लास के बाद होमवर्क ऐसा हो, जिसे वह किताब कॉपी के सहारे से करे, न कि मोबाइल के। सब कुछ ऑनलाइन ही करने पर जोर नहीं होना चाहिए।

बच्चों का रूटीन बनाएं

आज जब लॉकडाउन में बच्चे घर पर बोर हो रहे हैं, बाहर खेलने नहीं जा पा रहे हैं तो सबसे जरूरी है कि हम उन्हें घर पर बिजी रखें। उनका एक रूटीन बनाएं। सोने-जागने, नाश्ता करने, नहाने और सभी अन्य कामों का टाइम फिक्स करें। ऐसा करने से बच्चा खुद को बिजी महसूस करेगा, वह फिजूल की बातें सोचकर किसी तनाव में नहीं आएगा।

बच्चों के साथ समय दें

कुछ पैरेंट्स ने अपने बच्चों के लिए घर पर लूडो या कैरम या इसी तरह का इनडोर गेम का इंतजाम कर रखा है। लेकिन बैठकर खेलना बच्चों की प्रवृत्ति के विपरीत है। बच्चे जब तक घर से बाहर निकलकर उछल-कूद न कर लें, कोई खेल न खेल लें, तब तक उनको चैन नहीं मिलता। लेकिन लॉकडाउन के चलते वे खेलों से दूर हो चुके हैं। ऐसे में पैरेंट्स अपने बच्चों को समय दें।

वे बच्चों के साथ छिपम-छिपाई, पकड़म-पकड़ाई या रस्सी कूदना जैसे गेम खेल सकते हैं। पैरेंट्स आर्ट एंड क्राफ्ट में भी बच्चों का मन लगा सकते हैं। यदि बच्चा थोड़ा समझदार है तो किचेन में उससे कुछ काम लिया जा सकता है। बच्चे को कुछ नया सिखाए, जैसे- सैंडविच, सूप बनाना आदि।

घरों में जरूरी है बच्चों के लिए स्पेस : हाल के दशकों में हमारे घर, घर न रहकर दड़बे बन गए। घरों में जरूरत से ज्यादा सामान रहता है। बच्चे के लिए कहीं स्पेस बचा ही नहीं है। महानगरों में आधी से अधिक आबादी छोटे-छोटे घरों में रहने के लिए मजबूर है। जिनके बड़े घर हैं, उन्होंने ने भी बच्चों के लिए कोई आंगन नहीं छोड़ा है। बड़ा ड्रॉइंगरूम बना दिया जाता है, लेकिन वहां कीमती-सजावटी सामान रहता है।

अब बच्चा ड्रॉइंगरूम में खेलता है तो सामान टूटने का डर बना रहता है कि कहीं कोई सामान टूट न जाए। हमारी बाल्कनियां, संकरी गैलरी और सीढ़ियां बच्चों को खेलने-कूदने से रोकती हैं। घर से बाहर न निकल पाने की तात्कालिक समस्या आने वाले दिनों में समाप्त हो जाएगी, लेकिन सच तो यह है कि बच्चे हर समय न पार्क में खेल सकते हैं और न ही मैदानों में। इसलिए आपका घर छोटा हो या बड़ा, उसमें बच्चों के लिए स्पेस जरूर रखें।

(सर गंगाराम हॉस्पिटल नई दिल्ली में एसोसिएट कंसल्टेंट रिहैब्लिटेशन साइकोलॉजिस्ट डॉ.नीलम मिश्रा से बातचीत पर आधारित)

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