Meenakshi Seshadri: बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्रि ने 80 से लेकर 90 के दशक तक अपनी अदाओं से खूब राज किया है। उन्होंने फिल्म ‘पेंटर बाबू’ से 1983 में फिल्मों में कदम रखा था। उसी वर्ष मीनाक्षी और जैकी श्रॉफ स्टारर फिल्म 'हीरो' रिलीज हुई थी जिसे फिल्ममेकर सुभाष घई ने डायरेक्ट किया था। इस फिल्म ने मीनाक्षी और जैकी को रातों-रात स्टार बना दिया। इसके बाद मीनाक्षी ने कई सुपरहिट फिल्में दीं।

उन्होंने अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, जितेंद्र, ऋषि कपूर, गोविंदा, विनोद खन्ना, राजेश खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नामी स्टार्स के साथ काम किया। 1995 में मीनाक्षी ने इंवेस्टमेंट बैंकर हरीश मैसूरे के साथ शादी कर ली और उनके साथ अमेरिका में सेटल हो गईं। अब 27 साल बाद वह भारत लौटी हैं। इस दौरान उन्होंने एक फिल्म भी साइन की है। जानिए हरिभूमि से खास बातचीत में मीनाक्षी शेषाद्रि ने क्या कहा...

 

आपकी शुरुआती दो फिल्मों ने रिलीज के 40 वर्ष पूरे कर लिए हैं। विवाह के बाद आप अमेरिका में सेटल हुईं। आपकी बॉलीवुड में वापसी पूरे 27 वर्षों के बाद हो रही है। अपने कमबैक को लेकर आप क्या कहेंगी? 
हां, ‘पेंटर बाबू’ और ‘हीरो’ मेरी ये दोनों फिल्में 1983 में रिलीज हुई थीं। इनके 4 दशक पूरे होने की मुझे बहुत खुशी है। फिल्म ‘हीरो’ ने मुझे स्टारडम दिलाया। ‘पेंटर बाबू’ मुझ जैसी न्यूकमर को लाइमलाइट में लाई। इसके बाद राजकुमार संतोषी जी की 1993 में आई फिल्म ‘दामिनी’ रिलीज हुई थी, उसके बाद 1996 में ‘घातक’ रिलीज हुई। मेरे करियर की ये आखिरी दो फिल्में थीं। 1995 में मेरी शादी हुई फिर मैं अपने वैवाहिक जीवन में बिजी हो गई।

बेटी केंद्रा, जो इस वक्त 25 वर्ष की हैं, पढ़-लिखकर जॉब कर रही हैं। बेटा जोश 21 साल का है। उसने अपनी पढ़ाई अभी-अभी पूरी की है। कुल मिलाकर एक मां, एक पत्नी और गृहिणी के रूप में मैंने अपना दायित्व संतोषजनक ढंग से निभाया। जब मैं विवाह के बाद अमेरिका गई तो यह बात मेरे जेहन में हमेशा रही कि उम्र के किसी भी पड़ाव पर मैं अपने देश लौटकर अभिनय करना चाहूंगी। अभिनय मेरा पैशन है। यह पैशन अब पूरा करना चाहूंगी। हालांकि अपने परिवार को अमेरिका छोड़कर भारत आने का डिसीजन मेरे लिए आसान नहीं था। मैंने यह बहुत बड़ा कदम उठाया है। अब यहां मुंबई आई हूं तो परिवार को बेहद मिस भी करती हूं। देर रात मैं अपने बच्चों और परिवार से बात करती हूं।

 

अब आप किस तरह के रोल करना चाहेंगी?
मैं किस तरह के किरदार निभाना चाहूंगी, यह अभी तय नहीं किया है। मैंने एक प्रोजेक्ट साइन कर लिया है, उसके बारे में अभी कुछ बता नहीं सकती। बहुत जल्द इसकी अनाउंसमेंट होगी। अब फिल्म इंडस्ट्री बहुत बदल चुकी है। फिल्मों की कहानियां और किरदार भी बहुत बदल चुके हैं। मैं ऐसे किरदार करना चाहूंगी, जो मुझे एक अलग पहचान दे। मुझे अहसास हो कि मेरा कमबैक खास है, फ्रूटफुल है। मैंने यहां काम करने के लिए खुद को सरेंडर कर दिया है। अभी तो मैं कोरी स्लेट हूं। देखते हैं, फिल्म मेकर्स मुझे किस तरह के किरदार ऑफर करते हैं। आज की एक्ट्रेसेस फिल्मों में महज शो पीस नहीं बनतीं, उनके लिए स्ट्रॉन्ग रोल लिखे जाते हैं, फिर चाहे वो फिल्म, टीवी हो या ओटीटी प्लेटफॉर्म।

आप 27 साल बाद भारत लौटी हैं। इंडस्ट्री में आप किन बदलावों को महसूस कर रही हैं?
सबसे बड़ा और सुखद बदलाव सेट पर वैनिटी वैन का मौजूद होना है। मेरे दौर में वैनिटी वैन नहीं होती थी। धूप, धूल में शूटिंग के बाद ड्रेस चेंज करने की कोई प्रॉपर जगह नहीं रहती थी। बड़े नामी स्टूडियोज के मेकअप रूम गंदे रहते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। इस दौर की अभिनेत्रियों के लिए बहुत बड़ी सुविधा है वैनिटी वैन। स्टार के पेमेंट का स्तर भी बढ़ा है। इस तरह फिल्म इंडस्ट्री का पूरा ढांचा ही बदल गया है। 

ओटीटी इस वक्त फिल्मों के लिए टफ कॉम्पिटिशन बन चुका है। आप कितनी तैयार हैं ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए, जहां नेगेटिव रोल और स्टोरीज ट्रेंडिंग हैं?
मैं यहां सबको सरप्राइज देने आई हूं! मैं नेगेटिव रोल करूंगी या नहीं, यह तो रोल पर डिपेंड करेगा, अभी बातान संभव नहीं है। पॉजिटिव, नेगेटिव का कॉम्बिनेशन कर सकती हूं। ग्रे शेड्स वाले रोल भी सोच सकती हूं।

 

 आपने बॉलीवुड के कई बड़े स्टार्स के साथ काम किया, उनके साथ फिल्म करने के एक्सपीरियंस कैसे रहे? 
हर एक्टर के साथ मेमोरीज शेयर करने के लिए शायद एक इंटरव्यू कम पड़ जाएगा। हां, जिनके साथ मेरी बहुत बनी, वो थे विनोद खन्ना। जब वह शिखर पर थे, सब कुछ छोड़कर आचार्य रजनीश के आश्रम में चले गए, कुछ वक्त बाद वो वापस भी आए। इंडस्ट्री ने उनका स्वागत किया। उनकी वापसी के समय मुझे उनके साथ 5-6 फिल्में करने का मौका मिला। आश्रम से लौटने के बाद विनोद जी के पास इतना आध्यात्मिक ज्ञान हो चुका था कि उनसे बातचीत करना एक ग्रेट एक्सपीरियंस होता था।

जब मेरी शूटिंग विनोद जी के साथ होती थी। मेरे पापा भी मेरे साथ आते थे, खासतौर पर उनकी आध्यात्मिक बातें सुनने। विनोद जी, मैं और पापा घंटों बातें करते थे। उनसे हमारी बहुत अच्छी मित्रता थी। गोविंदा, इंडस्ट्री के वो सितारे हैं, जो वर्सेटाइल हैं। उनसे भी हमारा बहुत प्यारा रिश्ता रहा। ऋषि कपूर जी के साथ भी मैंने 5 फिल्में कीं। वह बहुत दिलचस्प इंसान और कमाल के एक्टर थे। आज जब मैं रणबीर को देखती हूं, मुझे लगता है उनमें अपने पिता की पूरी झलक है, लेकिन पिता पुत्र में तुलना नहीं होनी चाहिए।

'भारत और अमेरिका की लिविंग स्टाइल में है अंतर'
यूएसए का रहन-सहन चकाचौंध भरा है। डॉलर्स में मिलने वाली सैलरी से वहां के लोगों का स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग हाइ है। वहां की लेडीज काफी फैशनेबल हैं। फैशन, हाइ स्टैंडर्ड ऑफ लाइफ वहां एक कॉमन बात है। हां, अमेरिका में रहने का मेरे लिए फायदा यह रहा कि मैंने वहां काफी कुछ जाना-सीखा, जो मैं भारत में नहीं कर पाई थी। यहां तो मैंने फिल्मों में बतौर अभिनेत्री काम किया, जहां मेकअप, हेयर स्टाइल, डांस सिखाने के लिए सेट पर लोग होते हैं। कोई सीन कैसे किया जाए, यह बताने वाला डायरेक्टर होता है। घर पर मां-पिताजी होते हैं, जिस वजह से मैं पैंपर्ड होती रही।

'अमेरीका में रहकर ग्रोथ हुई'
अमेरिका में जाने के बाद अपने परिवार के लिए खाना बनाना, ड्राइविंग सीखना, अपने फाइनेंस को मैनेज करना, ये सारे काम मैंने सीखे, जो वहां के लिए जरूरी थे। मैंने वहां स्विमिंग सीखी, जो फिटनेस के लिए थेरैपी बनी, पर्सनली मेरी ग्रोथ हुई। इस तरह वहां की रूटीन लाइफ ने मुझे इंडिपेंडेंट और बहुत स्मार्ट बनाया। भारत में होती तो शायद ये सब काम नहीं सीख पाती।

'भारत से है लगाव'
एक बात की कमी मैंने वहां बहुत महसूस की, वह है अपनापन। हम सबकी मदद करें, यह अपने देश की सभ्यता-संस्कृति का हिस्सा है। भारत के लोग बिना मांगे दूसरे की मदद करते हैं। अमेरिका में किसी की मदद करने का कल्चर नहीं है। यहां तक कि वहां अपने किसी दोस्त के घर जाना है तो पहले उसकी भी अपॉइंटमेंट लेनी पड़ती है। यह सोचना पड़ता है कि कहीं उनकी प्राइवेसी में हम कोई दखलअंदाजी तो नहीं कर रहे हैं। अपने देश में कहा जाता ‘अतिथि देवो भवः’। मैं भारत में अपनी किसी भी सहेली के घर कभी भी जा सकती हूं। हक के साथ कह सकती हूं, ‘चल, यार एक कप चाय पिला।’ मैं अमेरिका में इंडियन लाइफस्टाइल, यहां की खुशमिजाजी, मददगार लोग बहुत मिस करती हूं।

 
प्रस्तुति- पूजा सामंत