नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के आईपीओ के खिलाफ दाखिल याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद एक्सचेंज की लंबे समय से अटकी लिस्टिंग प्रक्रिया को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने साफ कहा कि याचिका का उद्देश्य आईपीओ की प्रक्रिया को रोकना प्रतीत होता है, इसलिए इसमें दखल देने का कोई ठोस आधार नहीं बनता। यह मामला उस एनओसी से जुड़ा है, जिसे सेबी ने 30 जनवरी को जारी किया था। इस एनओसी के जरिए एनएसई को आईपीओ प्रक्रिया फिर शुरू करने की अनुमति मिली थी।
एनएसई को मिला लिस्टिंग का अधिकार
इसके बाद लिस्टिंग से जुड़े दस्तावेज तैयार करने के लिए एक्सचेंज को मर्चेंट बैंकर और कानूनी सलाहकार नियुक्त करने का अधिकार मिल गया। याचिका पूर्व न्यायिक अधिकारी केसी अग्रवाल ने दायर की थी। उनका आरोप था कि सेबी के कॉरपोरेट एक्शन एडजस्टमेंट फ्रेमवर्क का पालन ठीक से नहीं किया गया। यह ढांचा इसलिए बनाया गया है ताकि बोनस, स्टॉक स्प्लिट या विशेष डिविडेंड जैसी कॉरपोरेट घोषणाओं के दौरान डेरिवेटिव ट्रेडर्स को आर्थिक नुकसान न हो।
याचिकाकर्ता ने कहा सेबी ने की अनुसुनी
याचिकाकर्ता का दावा था कि कुछ मामलों में केवल कीमतों में बदलाव किया गया, जबकि अनुबंध की मात्रा में समायोजन नहीं हुआ। साथ ही, डिविडेंड के बराबर राशि सीधे डेरिवेटिव ट्रेडर्स के खातों से काट ली गई। अग्रवाल ने कहा था कानून के अनुसार डिविडेंड का अधिकार केवल शेयरधारकों को है, डेरिवेटिव ट्रेडर्स को नहीं। इसलिए इस तरह की कटौती को उन्होंने कानून से परे बताया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनकी शिकायतों पर बिना सुनवाई के कार्रवाई बंद कर दी गई और सेबी ने भी स्वतंत्र जांच किए बिना एक्सचेंज के पक्ष को स्वीकार कर लिया।
हाईकोर्ट ने तर्कों को पर्याप्त नहीं माना
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन तर्कों को पर्याप्त नहीं माना और हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के साथ ही सेबी द्वारा दी गई मंजूरी के खिलाफ तत्काल कानूनी अड़चन खत्म हो गई। गौरतलब है कि एनएसई वर्ष 2016 से शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की कोशिश कर रहा है। को-लोकेशन विवाद और अन्य नियामकीय मुद्दों के कारण इसकी योजना बार-बार टलती रही है। अब अदालत के इस फैसले के बाद बाजार की नजर इस बात पर होगी कि एनएसई अपनी आईपीओ प्रक्रिया को कितनी तेजी से आगे बढ़ाता है।











