मानवाधिकारों का उल्लंघन: 1 लाख रुपये की नाजायज डिमांड... हॉस्पिटल ने शव को कब्जे में रख परिजनों को किया ब्लैकमेल!

यह आरोप राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने लगाया है। उन्होंने कहा कि डेड बॉडी रखकर परिजनों को ब्लैकमेल करना मानवाधिकारों के खिलाफ है। यूजर्स भी उनकी बात का समर्थन कर अनुभव शेयर कर रहे हैं। पढ़िये पूरा मामला?

Updated On 2026-01-25 13:45:00 IST

डेड बॉडी रख परिजनों को ब्लैकमेल करने वाले स्टाफ को फटकार लगाते एनएचआरसी सदस्य प्रियंक कानूनगो। 

देश की राजधानी दिल्ली अपनी बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के लिए जानी जाती है। सरकार की तरफ से प्राइवेट हॉस्पिटल में भी गरीब लोगों के लिए इलाज के उचित इंतजाम किए गए हैं। इसके बावजूद कई अस्पताल ऐसे हैं, जो कि मानवीय संवेदनाओं को भी भूल जाते हैं। ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसमें एक हॉस्पिटल ने मरीज की मौत के बाद परिजनों से एक लाख रुपये का बिल न चुकाने पर डेड बॉडी को कब्जे में रखा। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो को जब इसकी जानकारी मिली तो स्वयं मौके पर पहुंचे और संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई।

प्रियंका कानूनगो ने एक्स पर लिखा कि अस्पतालों का भी इलाज करना पड़ता है। दिल्ली के BLK Max अस्पताल में भर्ती होने के 24 घंटे के भीतर मरीज की मृत्यु हो गई। 2 लाख रुपया जमा कर चुके मध्यप्रदेश के मरीज की मौत के बाद 1 लाख रुपये की नाजायज डिमांड के लिए अस्पताल ने मरीज की लाश को अपने कब्जे में रख कर परिजनों को ब्लैकमेल किया।'

उन्होंने आगे लिखा कि आज सरकारी छुट्टी का दिन था। आयोग का कार्यालय बंद था इसलिए सूचना मिलने पर मैंने स्वयं अस्पताल पहुंच कर अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारियों को कानूनी समझाइश व भारत सरकार के निर्देशों की जानकारी दे कर मृतक का शरीर हैंडओवर करने के लिए निवेदन किया।

उन्होंने बताया कि उनके साथ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के असिस्टेंट रजिस्ट्रार बृजवीर सिंह, सहयोगी राहुल जी, डीसीपी सेंट्रल दिल्ली हर्षवर्धन मित्तल और एसएचओ सुभाष चंद्र ने तत्परता से सहयोग कर परिजनों को मृत देह दिलवाने की कार्यवाही की। उन्होंने मृत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हुए अंत में लिखा कि अस्पताल के संचालकों को सद्बुद्धि प्रदान कर पाश्विक वृत्ति से मुक्ति प्रदान करें।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा वीडियो

यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। ज्यादातर लोगों का कहना है कि सरकारी हॉस्पिटल में परेशानी होती है और उचित इलाज भी नहीं मिल पाता है। अगर प्राइवेट हॉस्पिटल जाएं तो वहां इलाज से ज्यादा इस बात का प्रयास रहता है कि ज्यादा से ज्यादा पैसे कमा लें। रोहिणी निवासी शालू ने लिखा कि मैंने एक बड़े हॉस्पिटल से ईडब्ल्यूएस के तहत रसौली का ऑपरेशन कराया। ऑपरेशन मुफ्त में हुआ, लेकिन जांच में ही 10-12 हजार का खर्चा आ गया।

वहीं सैयद मुमताल ने लिखा, इलाज के नाम पर वसूली और मौत के बाद शव को बंधक बनाना घोर अमानवीय अपराध है। स्वास्थ्य विभाग व संबंधित एजेंसियों को तत्काल जांच कर दोषी अस्पताल प्रबंधन पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसी घटनाएं पूरे हेल्थ सिस्टम की साख पर सवाल खड़े करती हैं। इसी प्रकार यूजर्स विभिन्न प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर रहे हैं।

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