बदल गई कांवड़गांव की किस्मत: 45 साल तक नक्सल कब्जे में रहा इलाका, अब मिल रहीं सभी सरकारी सुविधाएं

बस्तर संभाग में नक्सलियों के खात्में के बाद अब विकास के लिए 45 सालों के इंतजार खत्म हो चुका है। ग्रामीणों को अब देश की नागरिकता का प्रमाण मिल चुका है।

Updated On 2026-01-07 13:06:00 IST

कावड़गांव के समस्त ग्रामीण

गणेश मिश्रा- बीजापुर। 45 सालों तक बंदूकों के साय में खून खराबे के बीच अगर आपको सुविधाओं के लिए तरसना पड़े तो यह जिंदगी किसी नरक से कम नहीं होगी। आज हरिभूमि आप सब तक एक ऐसे ही गांव की दास्तान लेकर आ रहा है, जिसे पढ़कर या जानकर आप भी दंग रह जाएंगे।

इस तरह इतने वर्षों तक आजाद भारत में भी ग्रामीण लाल आतंक के गुलामी की बेड़ियों में जकड़े रहे। उन्हें ना तो शहर आने की अनुमति थी और ना ही शहर के लोगों को उस गांव तक जाने की अनुमति थी। इस इलाके में नक्सली अपनी सरकार चलाते थे। वे खुद लोकतंत्र को नहीं मानते थे और ग्रामीणों को भी लोकतंत्र से दूर रखा करते थे। परंतु अब ग्रामीणों का 45 वर्षों का इंतजार खत्म हो चुका है, क्योंकि नक्सलियों की राजधानी कहे जाने वाले गंगालूर इलाके के कावड़गांव तक अब बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हो चुका है।


ग्रामीणों के बैंक अकाउंट भी खोले जा रहे
यही नहीं बल्कि इस इलाके के ग्रामीणों के पास भारत के नागरिक होने का कोई भी प्रमाण नहीं था। परंतु अब सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति के कारण उन्हें देश की नागरिकता के प्रमाण भी मिल रहे हैं। यहां शिविर लगाकर ग्रामीणों के राशन कार्ड, आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड भी बनाए जा रहे हैं। जो कभी घर के खपरैल में या मिट्टी के बर्तनों में पैसे रखा करते थे, उन सभी ग्रामीणों के बैंक अकाउंट खोले जा रहे हैं।


अब सारी सुविधाएं गांव में ही
अब इस इलाके के ग्रामीण 45 सालों के बाद सरकार की मुख्य धारा से जुड़ चुके हैं और शासन की योजनाओं का लाभ ले रहे हैं। गांव में अब स्कूल, आंगनवाड़ी ,राशन दुकान, सड़क, पानी, बिजली सभी सुविधाएं सुरक्षा के साथ कराई जा रही है। कावड़गांव तक अब चमचमाती सड़क बन चुकी है। कभी इस गांव तक जाने के लिए पगडंडी और जंगल के रास्ते पैदल सफर तय करना पड़ता था। राशन के लिए 30 किलोमीटर तक पैदल सफर और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए दो पहाड़ियों को पार करने के बाद इलाज के लिए किरंदुल या बचेली पहुंच पाते थे। परंतु अभी सारी सुविधाएं इन्हें अपने गांव में ही मिलने लगी हैं, क्योंकि अब बीजापुर नक्सलगढ़ नहीं बल्कि विकसित और नया बीजापुर बनने की ओर अग्रसर है।


डर के साय में बीत रहा था ग्रामीणों का जीवन
बता दें कि, पूरे 50 बरस तक माओवाद के प्रभाव और आईईडी धमाकों की गूँज ने यहाँ के ग्रामीणों के दिलों में ऐसा भय भर दिया था कि, सुख, शांति और निडर होकर अपनी रोजी-रोटी कमाते हुए जीवन जीना मानो एक अधूरा सपना बनकर रह गया था। हर रात डर के साथ और सन्नाटे की चादर गांव को घेर लेती थी। लेकिन नियद-नेल्लानार ग्राम में सम्मिलित होने के बाद कावड़गांव फिर से साँस ले रहा है। जहाँ कभी खामोशी ही डर का रूप लेकर छाई रहती थी, वहीं आज हलबी-गोंडी गीतों की मधुर धुनों के बीच ग्रामीण श्रमिक महात्मा गांधी नरेगा योजना के कार्यों में जुटकर सम्मानजनक रोजगार प्राप्त कर रहे हैं।


सभी परिवारों के शत-प्रतिशत जॉब कार्ड भी बनाए गए
सड़क और परिवहन व्यवस्था, बिजली एवं ऊर्जा, जल आपूर्ति, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा, पक्के आवास और अन्य बुनियादी सुविधाओं का लगातार विस्तार हुआ है। ग्रामीण स्वच्छता एवं जल संरक्षण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रयास किए गए हैं। नई उमंग, नए विश्वास और नए सपनों के साथ यहाँ की जिंदगी एक बार फिर से खिल उठी है। बीजापुर विकासखंड के अंतर्गत नियद-नेल्लानार ग्राम के कावड़गांव में पहले माओवाद के प्रभाव के कारण प्रशासनिक योजनाओं का क्रियान्वयन संभव नहीं हो पाता था। लेकिन अब शिविर लगाकर गांव के सभी परिवारों के शत-प्रतिशत जॉब कार्ड बनाए जा चुके हैं।


गांव में ही मिल रहा नियमित रोजगार
आज गांव में स्कूल भवन, उचित मूल्य की दुकान, सोलर ड्यूल पंप, मोबाइल टॉवर, विद्युतीकरण, नल-जल योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना और उज्ज्वला योजना जैसी सुविधाओं का लाभ ग्रामीणों तक पहुँच रहा है। महात्मा गांधी नरेगा योजना के तहत तालाब निर्माण और खेल मैदान का निर्माण पूर्ण कर लिया गया है। वहीं जल संरक्षण की दिशा में बोल्डर चेक निर्माण के माध्यम से ग्रामीणों को गांव में ही नियमित रोजगार मिल रहा है। इन कार्यों ने केवल हाथों को काम नहीं दिया, बल्कि दिलों में भरोसे का दीपक जला दिया है।

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