प्रशासनिक चूक से संकट में आदिवासी किसान: बिना अनुमति कर दिया गया रकबा समर्पण, धान बिक्री से वंचित होने की वजह से आर्थिक तंगी में फंसा
करदा गांव के आदिवासी किसान संजय कुमार पैकरा प्रशासनिक लापरवाही की वजह से टोकन नहीं कट रहा है। जिसको लेकर उसने प्रशासन से टोकन जारी करने की मांग की है।
पीड़ित किसान
कुश अग्रवाल- बलौदाबाजार। छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले के करदा गांव के आदिवासी किसान संजय कुमार पैकरा प्रशासनिक लापरवाही का शिकार होकर गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति तिल्दा द्वारा बिना किसान की अनुमति के उसका रकबा समर्पण कर दिया गया, जिससे अब उसका धान बिक्री का टोकन नहीं कट पा रहा है।
किसान संजय पैकरा के नाम कुल खसरा 23 एवं रकबा 8.517 हेक्टेयर भूमि दर्ज है। उन्होंने 2 जनवरी को केवल 130 क्विंटल धान बेचा, जबकि 289 क्विंटल धान अब भी शेष है। टोकन नहीं कटने के कारण वह समर्थन मूल्य पर धान बेचने से वंचित हो गया है। यह मामला न सिर्फ एक किसान की आजीविका से जुड़ा है, बल्कि यह प्रशासनिक तंत्र की बड़ी चूक को भी उजागर करता है। समिति द्वारा भूलवश रकबा समर्पण किए जाने की बात कही जा रही है, लेकिन इस भूल का खामियाजा एक गरीब आदिवासी किसान भुगत रहा है।
किसान पर करीब 3 लाख 65 हजार रुपये का है बैंक ऋण
धान नहीं बिकने से किसान पर करीब 3 लाख 65 हजार रुपये का बैंक ऋण है। यदि समय रहते धान नहीं बेचा गया, तो किसान डिफॉल्टर की श्रेणी में आ सकता है, जिससे भविष्य में उसे कोई भी बैंक ऋण नहीं मिल पाएगा। पीड़ित किसान अपनी व्यथा लेकर तहसील कार्यालय, एसडीएम कार्यालय और जिला कलेक्टर कार्यालय के चक्कर काट चुका है। लेकिन अब तक उसे केवल आश्वासन ही मिला है, कोई ठोस समाधान नहीं। यह मामला प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक ओर सरकार किसानों के हित में योजनाएं चला रही है। वहीं दूसरी ओर ऐसी लापरवाही से किसान आत्मनिर्भर बनने की जगह कर्ज में डूबने को मजबूर हो रहे हैं।
प्रशासन से टोकन जारी करने की मांग
किसान संजय पैकरा ने प्रशासन से मांग की है कि उसकी स्थिति को गंभीरता से लेते हुए तत्काल उसका टोकन जारी किया जाए। ताकि वह अपना धान बेचकर कर्ज चुका सके और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके।