सनातन मिटाओ' मतलब नरसंहार का संकेत: मद्रास हाईकोर्ट की उदयनिधि पर तल्ख टिप्पणी, अमित मालवीय पर दर्ज FIR रद्द
कोर्ट ने इस टिप्पणी के आधार पर भाजपा नेता अमित मालवीय के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया और मंत्रियों को संवैधानिक मर्यादा में रहने की सख्त हिदायत दी है।
न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन की पीठ ने इस मामले में धर्म और अभिव्यक्ति की मर्यादा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
चेन्नई : मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन द्वारा सनातन धर्म के खिलाफ दिए गए विवादित बयान पर बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 'सनातन धर्म को मिटाने' का आह्वान करना सीधे तौर पर एक विशेष समुदाय के 'नरसंहार' का संकेत देने जैसा है।
इसी के साथ, अदालत ने भाजपा नेता अमित मालवीय के खिलाफ दर्ज उस FIR को भी रद्द कर दिया है, जिसमें उन पर उदयनिधि के बयान को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाया गया था।
न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन की पीठ ने इस मामले में धर्म और अभिव्यक्ति की मर्यादा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
'मिटाने' का आह्वान करना अभिव्यक्ति नहीं, हिंसा का बीज
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि जब कोई सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति किसी धर्म को मच्छर या डेंगू की तरह 'मिटाने' की बात करता है, तो इसका अर्थ केवल वैचारिक विरोध नहीं होता।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी भाषा का इस्तेमाल करना यह दर्शाता है कि आप उस धर्म को मानने वाले लोगों के अस्तित्व को ही खत्म करना चाहते हैं, जो कि नरसंहार की मानसिकता को प्रेरित करता है।
हाईकोर्ट ने इसे समाज की शांति और सद्भाव के लिए एक खतरनाक संकेत करार दिया है।
अमित मालवीय पर दर्ज FIR को बताया 'राजनीति से प्रेरित'
भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय के खिलाफ तमिलनाडु पुलिस ने मामला दर्ज किया था, क्योंकि उन्होंने उदयनिधि के बयान का अनुवाद करते हुए इसे 'नरसंहार का आह्वान' बताया था।
कोर्ट ने इस FIR को रद्द करते हुए कहा कि मालवीय ने केवल उदयनिधि के तमिल बयान का निष्कर्ष निकाला था, जो कि गलत नहीं था।
अदालत ने माना कि उदयनिधि के शब्दों का जो प्रभाव समाज पर पड़ सकता था, मालवीय ने उसी की व्याख्या की थी, जिसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
संवैधानिक शपथ और मंत्रियों की जिम्मेदारी पर सवाल
हाईकोर्ट ने उदयनिधि स्टालिन की आलोचना करते हुए याद दिलाया कि एक मंत्री के रूप में उन्होंने संविधान की शपथ ली है। कोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति कानून के शासन और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करने की शपथ लेता है, वह खुद किसी धर्म के खिलाफ ऐसी घृणित टिप्पणी कैसे कर सकता है?
न्यायाधीश ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों को अपने शब्दों के चयन में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए, अन्यथा उनके बयान देश के ताने-बाने को नुकसान पहुचा सकते हैं।
सनातन धर्म और समावेशी संस्कृति का बचाव
सुनवाई के दौरान अदालत ने सनातन धर्म की ऐतिहासिकता और उसकी समावेशी प्रकृति का भी जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि सनातन धर्म सदियों से अस्तित्व में है और इसने विभिन्न विचारधाराओं को अपने भीतर समाहित किया है।
इसे मिटाने की बात करना न केवल एक धर्म का अपमान है, बल्कि यह उन करोड़ों लोगों की भावनाओं को आहत करना है जो इसकी शिक्षाओं का पालन करते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का अर्थ नफरत फैलाना कतई नहीं है।
पुलिस की कार्यप्रणाली और भेदभावपूर्ण कार्रवाई पर प्रहार
अदालत ने तमिलनाडु पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि पुलिस ने उस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय, जिसने विवादित बयान दिया था, उस व्यक्ति पर केस दर्ज कर लिया जिसने उस बयान की आलोचना की थी।
हाईकोर्ट ने इसे पुलिस की एकतरफा और भेदभावपूर्ण कार्रवाई बताते हुए स्पष्ट किया कि सत्ता का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों की आवाज दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।