विदेश में पढ़ाई का सपना: एजुकेशन लोन लेने से पहले ये सच्चाई जान लें, क्यों जल्दबाज़ी पड़ सकती भारी?

Education Loan: विदेश में पढ़ाई के लिए एजुकेशन लोन जरूरी हो सकता है लेकिन जोखिम भी कम नहीं। नौकरी, करंसी और EMI की हकीकत अक्सर उम्मीदों से अलग होती है।

Updated On 2026-01-25 18:30:00 IST

Funding overseas education with a loan

Education Loan: भारत में बड़ी संख्या में परिवारों के लिए विदेश में पढ़ाई का सपना बिना लोन के पूरा होना मुश्किल। ट्यूशन फीस, रहने का खर्च, इंश्योरेंस, यात्रा और रोजमर्रा की जरूरतें मिलकर खर्च को इतना बढ़ा देती हैं कि सेविंग्स नाकाफी पड़ जाती। यही वजह है कि बैंक विदेशी शिक्षा के लिए आसानी से लोन देने को तैयार रहते हैं, खासकर जब यूनिवर्सिटी और देश उनके लिए परिचित हों। लेकिन बैंक की यह तत्परता आपके फैसले की जगह नहीं ले सकती।

सबसे पहले चुकाने की क्षमता पर सोचें

ज्यादातर बातचीत लोन की पात्रता और कितनी रकम मंजूर होगी, इसी पर होती है। यह सबसे आसान हिस्सा है। असली सवाल है कि लोक चुकाया कैसे जाएगा? एजुकेशन लोन में पढ़ाई के दौरान और उसके बाद कुछ समय तक मोराटोरियम मिलता है लेकिन उसके खत्म होते ही ईएमआई शुरू हो जाती। नौकरी लगी या नहीं, ईएमआई को इससे फर्क नहीं पड़ता। कई परिवार मान लेते हैं कि पढ़ाई खत्म होते ही अच्छी नौकरी मिल जाएगी लेकिन जब ऐसा नहीं होता तो लोन तनाव का बड़ा कारण बन जाता है।

एजुकेशन लोन के ब्याज पर आयकर की धारा 80ई के तहत टैक्स छूट मिलती है। इससे कुल लागत कम जरूर होती है लेकिन हर महीने की ईएमआई कम नहीं होती। शुरुआती करियर में आमदनी अक्सर अस्थिर रहती है, कभी इंटर्नशिप, कभी कॉन्ट्रैक्ट जॉब। ऐसे में टैक्स छूट कागजों में अच्छी लगती है लेकिन कैश फ्लो की समस्या जस की तस रहती है।

नौकरी के मौके ज्यादा अहम

एजुकेशन लोन का सबसे बड़ा जोखिम पढ़ाई से नहीं, नौकरी से जुड़ा है। किस देश में किस कोर्स के बाद नौकरी के मौके हैं, वीज़ा नियम क्या हैं? पोस्ट-स्टडी वर्क की सुविधा है या नहीं-यह सब बहुत मायने रखता है। सिर्फ यूनिवर्सिटी की रैंक देखकर लोन लेना खतरनाक हो सकता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भी बार-बार चेतावनी देता रहा है कि भविष्य की अनुमानित कमाई के भरोसे भारी उधारी से बचना चाहिए।

करेंसी का जोखिम अक्सर नजरअंदाज हो जाता

कई छात्र मानते हैं कि वे विदेश में कमाई करके लोन चुका देंगे। लेकिन हालात बदल सकते हैं कि भारत लौटना, देश बदलना या काम में देरी। अगर ईएमआई रुपये में चुकानी पड़ी और रुपया कमजोर हुआ, तो लोन का बोझ चुपचाप बढ़ जाता है।

कोलैटरल मतलब पूरे परिवार की जिम्मेदारी

बड़े एजुकेशन लोन में अक्सर प्रॉपर्टी गिरवी रखनी पड़ती है या माता-पिता को को-बॉरोअर बनना होता है। यानी जोखिम सिर्फ छात्र का नहीं, पूरे परिवार का होता है। ईएमआई चूकने से परिवार की क्रेडिट हिस्ट्री और संपत्ति दोनों पर असर पड़ सकता है।

एजुकेशन लोन लेना गलत नहीं है लेकिन यह आसान फैसला भी नहीं होना चाहिए। मंजूरी मिलना खुशी की बात है, पर असली परीक्षा चुकाने के वक्त होती है। नौकरी के मौके, शुरुआती कमाई, करंसी रिस्क और परिवार पर असर, इन सब पर सोचकर लिया गया फैसला ही लंबे तनाव से बचा सकता है।

(प्रियंका कुमारी)

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