इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच चली 21 घंटे की शांति वार्ता बिना किसी नतीजे फेल हो गई। इस बैठक में 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' की सुरक्षा और ईरान के 'फ्रीज एसेट्स' जैसे मुद्दों पर गहरा गतिरोध बना रहा।

Islamabad Fail: दुनिया को उम्मीद थी कि इस्लामाबाद की सरजमीं पर दशकों पुरानी नफरत की दीवार ढह जाएगी, लेकिन 21 घंटे के हाई-वोल्टेज ड्रामे के बाद हाथ आई तो सिर्फ 'नाकामी'। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी डेलीगेशन के बीच चली इस ऐतिहासिक वार्ता का बिना किसी नतीजे के खत्म होना, मिडिल-ईस्ट में शांति की कोशिशों के लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं है।

डोनल्ड ट्रंप के 'प्रेशर गेम' और ईरान की 'ईगो कूटनीति' के बीच फंसी यह वार्ता अब पूरी दुनिया को एक नए संकट की ओर धकेल रही है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तेल के टैंकर रुकेंगे या कूटनीति के दरवाजे दोबारा खुलेंगे, यह अब भविष्य के गर्भ में है।

21 घंटों का तनावपूर्ण घटनाक्रम और कूटनीतिक गतिरोध 
इस्लामाबाद के अति-सुरक्षित गलियारों में जब शनिवार दोपहर बातचीत शुरू हुई, तो शुरुआती कुछ घंटों में सकारात्मक संकेत मिले थे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख की मौजूदगी में दोनों देशों ने एक-दूसरे की बात सुनने पर सहमति जताई थी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया और रात गहराती गई, बंद कमरे के अंदर का माहौल तनावपूर्ण होता चला गया।

अमेरिकी पक्ष ने अपनी शर्तों की एक लंबी फेहरिस्त ईरान के सामने रख दी, जिसमें परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह बंद करना और क्षेत्रीय मिलिशिया को फंडिंग रोकना शामिल था। वहीं, ईरानी डेलीगेशन ने इन शर्तों को अपनी संप्रभुता पर हमला बताया। 21 घंटों तक चली इस लंबी खींचतान में कई बार ब्रेक लिए गए और पर्दे के पीछे से तेहरान और वॉशिंगटन से निर्देश लिए गए, लेकिन अंततः दोनों पक्षों के बीच की खाई इतनी चौड़ी निकली कि उसे पाट पाना असंभव हो गया।

​फ्रीज एसेट्स और फंड्स की रिहाई पर फंसा पेंच 
इस पूरी बातचीत के विफल होने का एक बड़ा कारण ईरान की वह मांग रही, जिसे उसने 'प्रि-कंडीशन' यानी बातचीत की पूर्व शर्त के तौर पर पेश किया था। ईरान चाहता था कि अमेरिका तुरंत अंतरराष्ट्रीय बैंकों में फंसे उसके अरबों डॉलर के 'फ्रीज एसेट्स' को अनफ्रीज करे ताकि उसकी चरमराती अर्थव्यवस्था को सहारा मिल सके।

ईरानी प्रतिनिधियों का तर्क था कि बिना किसी आर्थिक राहत के वे अपने देश की जनता और सेना को किसी समझौते के लिए राजी नहीं कर सकते। हालांकि, जेडी वेंस ने ट्रंप प्रशासन के कड़े रुख को दोहराते हुए साफ कर दिया कि जब तक ईरान जमीन पर ठोस बदलाव नहीं दिखाता, तब तक उसे एक भी डॉलर की राहत नहीं दी जाएगी। अमेरिका ने इसे ईरान की 'ब्लैकमेलिंग' कूटनीति करार दिया, जिसके बाद बातचीत के इस सबसे महत्वपूर्ण बिंदु पर पूरी डील पटरी से उतर गई।

​हॉर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक तेल मार्ग का संकट 
​वार्ता की मेज पर सबसे ज्यादा चर्चा 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' को लेकर हुई, जो दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है। अमेरिका ने मांग की थी कि ईरान इस मार्ग को 'इंटरनेशनल न्यूट्रल जोन' के रूप में सुरक्षित रखे और वहां से अपने सैन्य ठिकानों को पीछे हटाए। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि ईरान इस मार्ग का इस्तेमाल दुनिया को डराने के लिए कर रहा है।

इसके जवाब में ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया कि हॉर्मुज उनकी रक्षात्मक दीवार है और वे इसे किसी भी कीमत पर अमेरिकी प्रभाव में नहीं आने देंगे। समझौते की विफलता के बाद अब डर यह है कि ईरान इस मार्ग को पूरी तरह बाधित कर सकता है, जिससे दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में आग लग सकती है और वैश्विक सप्लाई चेन ठप हो सकती है।

​डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य धमकी और कूटनीतिक दबाव 
​वार्ता के दौरान वॉशिंगटन से आ रहे बयानों ने आग में घी डालने का काम किया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया और आधिकारिक माध्यमों से यह संदेश बार-बार भेजा कि अमेरिका समझौते के लिए झुकने वाला नहीं है। ट्रंप ने साफ़ चेतावनी दी कि यदि ईरान कूटनीतिक रास्ते को ठुकराता है, तो अमेरिका उसे 'सैन्य रूप से पराजित' करने में संकोच नहीं करेगा। जेडी वेंस इसी कड़े संदेश के साथ इस्लामाबाद में मौजूद थे। ट्रंप के इस 'मिलिट्री ऑप्शन' वाले बयान ने ईरानी डेलीगेशन के भीतर असुरक्षा और गुस्से की भावना पैदा कर दी।

जानकारों का कहना है कि जब एक तरफ शांति की मेज सजी हो और दूसरी तरफ से सैन्य हमले की धमकियां आ रही हों, तो कूटनीति के लिए बहुत कम जगह बचती है। ट्रंप की इसी 'प्रेशर टैक्टिक्स' ने वार्ता के अंतिम घंटों में बातचीत को पूरी तरह खत्म कर दिया।

​लेबनान-इजरायल युद्ध और परमाणु कार्यक्रम का भविष्य 
​इस डील के टूटने का सबसे तत्काल और बुरा असर लेबनान और इजरायल के बीच जारी युद्ध पर पड़ने वाला है। अमेरिका को उम्मीद थी कि ईरान के जरिए वह हिजबुल्लाह को सीजफायर के लिए मना लेगा, लेकिन अब यह संभावना पूरी तरह खत्म हो गई है। इसके साथ ही, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी सस्पेंस बढ़ गया है।

ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अपनी परमाणु तकनीक को अपनी सुरक्षा की गारंटी मानता है और वह इसमें किसी भी तरह की कटौती तब तक नहीं करेगा जब तक अमेरिका अपनी शत्रुतापूर्ण नीति नहीं बदलता। इस विफलता के बाद अब इस बात की प्रबल आशंका है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन की गति और तेज कर सकता है, जिससे मिडिल-ईस्ट में एक नई परमाणु रेस शुरू हो सकती है और इजरायल के साथ उसका सीधा टकराव अपरिहार्य हो सकता है।

​विफलता के बाद के परिणाम और वैश्विक शांति पर असर 
​21 घंटे की इस मैराथन मीटिंग के बिना किसी साझा बयान के खत्म होने से पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली भूमिका को भी झटका लगा है। जेडी वेंस ने हालांकि पाकिस्तान की मेजबानी की सराहना की, लेकिन उन्होंने सीधे तौर पर ईरान को इस विफलता का जिम्मेदार ठहराया। ईरानी विदेश मंत्रालय ने भी जवाबी हमला करते हुए अमेरिका को 'गैर-यथार्थवादी' और 'धौंस दिखाने वाला' बताया। अब आगे का रास्ता बेहद पथरीला नजर आ रहा है।

अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि अब बातचीत का दौर खत्म हो चुका है और आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच कड़े प्रतिबंधों, साइबर हमलों और छद्म युद्धों का नया दौर शुरू होगा। इस्लामाबाद की यह विफलता लंबे समय तक दुनिया को याद रहेगी क्योंकि यहां शांति का एक बहुत बड़ा अवसर नफरत और अविश्वास की भेंट चढ़ गया।