तेहरान : पश्चिम एशिया में जारी भीषण जंग अब अपने 13वें दिन में प्रवेश कर चुकी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक हलचल और अधिक तेज हो गई है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने बहरीन की अगुवाई में लाए गए एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्ताव को पारित कर दिया है।
इस प्रस्ताव के माध्यम से ईरान से स्पष्ट मांग की गई है कि वह खाड़ी देशों के तेल टैंकरों और व्यापारिक मार्गों पर किए जा रहे अपने हमलों को तत्काल प्रभाव से रोके। यह प्रस्ताव वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पर वोटिंग और चीन-रूस की रणनीतिक दूरी
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस प्रस्ताव पर हुई वोटिंग के दौरान दुनिया के शक्तिशाली देशों के बीच वैचारिक मतभेद भी उभर कर सामने आए। यह प्रस्ताव 13 वोटों के भारी समर्थन के साथ पारित किया गया, जो दर्शाता है कि अधिकांश राष्ट्र खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव को लेकर चिंतित हैं।
हालांकि, सुरक्षा परिषद के दो स्थायी सदस्य देशों, रूस और चीन ने इस मतदान की प्रक्रिया से खुद को दूर रखा। इन दोनों देशों की अनुपस्थिति ने वैश्विक कूटनीति में एक नया विमर्श पैदा कर दिया है, जबकि प्रस्ताव में बहरीन, कुवैत, कतर और सऊदी अरब जैसे देशों की सुरक्षा पर मंडरा रहे खतरे की कड़े शब्दों में निंदा की गई है।
ईरान की ओर से प्रस्ताव पर कड़ी प्रतिक्रिया और भेदभाव का आरोप
संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत अमीर सईद इरावानी ने सुरक्षा परिषद द्वारा पारित इस प्रस्ताव को पूरी तरह से 'पक्षपाती' और 'एकतरफा' करार दिया है। उन्होंने अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया में कहा कि यह कदम युद्ध की जमीनी हकीकत को तोड़-मरोड़कर पेश करने की एक सोची-समझी कोशिश है।
ईरान का तर्क है कि सुरक्षा परिषद ने उन मूल कारणों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है जिनकी वजह से यह संकट पैदा हुआ। इरावानी ने आरोप लगाया कि प्रस्ताव में अमेरिका और इजरायल की आक्रामक भूमिका का कोई जिक्र नहीं किया गया है और इसका एकमात्र उद्देश्य हमलावर को पीड़ित के रूप में पेश करना है।
ओमान के सलालाह पोर्ट पर ड्रोन हमला और वैश्विक चिंताएं
युद्ध की आग अब उन क्षेत्रों तक भी पहुँचने लगी है जिन्हें अब तक सुरक्षित माना जाता था। ओमान के दक्षिणी शहर सलालाह के पोर्ट पर स्थित तेल स्टोरेज टैंकों पर ड्रोन के जरिए किए गए हमले ने दुनिया को चौंका दिया है।
इस हमले की गंभीरता को देखते हुए ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक अल-सईद ने तत्काल ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से फोन पर संपर्क किया और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की। वहीं दूसरी ओर, 29 देशों के एक समूह ने संयुक्त बयान जारी कर इजरायल पर हमलों के लिए हिजबुल्लाह की निंदा की है, साथ ही इजरायल से घनी आबादी वाले इलाकों को निशाना न बनाने की अपील भी की है।
युद्ध का बढ़ता आर्थिक बोझ और अमेरिका का भारी सैन्य खर्च
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने अपनी संसद में युद्ध के आर्थिक प्रभावों की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के साथ जारी इस संघर्ष के शुरुआती महज छह दिनों के भीतर अमेरिका ने 11.3 अरब डॉलर की भारी-भरकम राशि खर्च कर दी है। इस राशि का सबसे बड़ा हिस्सा आधुनिक हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति सुनिश्चित करने में व्यय हुआ है। व्हाइट हाउस अब युद्ध के बढ़ते खर्चों को संभालने के लिए अमेरिकी कांग्रेस से अतिरिक्त अरबों डॉलर की 'इमरजेंसी फंडिंग' की मांग करने की तैयारी कर रहा है, जो इस युद्ध के लंबे खिंचने के संकेतों को और पुख्ता करता है।
बेरूत में इजरायली वायुसेना का कहर और भारतीयों की वतन वापसी
लेबनान की राजधानी बेरूत में इजरायली वायुसेना ने हिजबुल्लाह के संदिग्ध ठिकानों पर अब तक के सबसे भीषण हमले किए हैं, जिसमें कई नागरिकों के हताहत होने की पुष्टि हुई है। इन हमलों के बीच फंसे विदेशी नागरिकों को निकालने का सिलसिला भी तेज हो गया है।
कतर और लेबनान जैसे अशांत क्षेत्रों से अब तक सैकड़ों भारतीय नागरिक सुरक्षित रूप से अपने वतन वापस लौट आए हैं। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिति जल्द ही सामान्य हो जाएगी, लेकिन वर्तमान जमीनी हालात अभी भी किसी बड़ी वैश्विक ऊर्जा किल्लत की ओर इशारा कर रहे हैं।