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Gen Z आंदोलन के बाद युवाओं का वोट किस करवट बैठता है, यह निर्णायक होगा।

काठमांडू : नेपाल में ऐतिहासिक आम चुनाव के बाद अब सबकी नजरें मतगणना और शुरुआती रुझानों पर टिकी हैं। शुरुआती आंकड़ों ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है, जहा पारंपरिक पार्टियों के दिग्गज पिछड़ते नजर आ रहे हैं और नए चेहरों का दबदबा बढ़ता दिख रहा है।

​शुरुआती रुझान: बालेन शाह की पार्टी ने बनाई बड़ी बढ़त

​काठमांडू के पूर्व मेयर और रैपर बलेंद्र 'बालेन' शाह की 'राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी' शुरुआती रुझानों में सबसे आगे चल रही है।

सीटों का हाल: शुरुआती 58 सीटों के रुझानों में बालेन शाह की पार्टी 45 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है।

झापा-5 हॉट सीट: पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली अपनी पारंपरिक सीट झापा-5 से बालेन शाह से करीब 1100 वोटों से पीछे चल रहे हैं। ओली को अब तक 385 वोट मिले हैं, जबकि बालेन शाह 1478 वोटों के साथ आगे हैं।

पारंपरिक दिग्गजों की खराब शुरुआत

​नेपाल की पुरानी और बड़ी पार्टियों के लिए शुरुआती रुझान चिंताजनक हैं:-

नेपाली कांग्रेस: पूर्व पीएम शेर बहादुर देउबा की पार्टी को अब तक केवल 1 सीट पर बढ़त मिली है। गगन थापा की अगुवाई में पार्टी 4 सीटों पर संघर्ष कर रही है।

CPN-UML: केपी ओली की पार्टी भी फिलहाल केवल 1 से 3 सीटों पर ही आगे दिख रही है।

नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (प्रचंड): प्रचंड की पार्टी भी मात्र 1 सीट पर बढ़त बना पाई है।

नेपाल की मिश्रित चुनाव प्रणाली (Mixed Electoral System)

एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें दो अलग-अलग चुनावी प्रणालियों को जोड़कर संसद के सदस्यों का चुनाव किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य छोटे राजनीतिक दलों और समाज के विभिन्न समूहों को संसद में जगह देना है ताकि कोई एक पार्टी पूरी तरह हावी न हो सके।

​नेपाल में प्रतिनिधि सभा (निचले सदन) की कुल 275 सीटों के लिए चुनाव दो तरीकों से होता है:-

​1. प्रत्यक्ष चुनाव (फर्स्ट पास्ट द पोस्ट - FPTP)

सीटों की संख्या: कुल 275 में से 165 सीटों पर सीधा चुनाव होता है।

प्रक्रिया: देश को 165 निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा गया है। प्रत्येक क्षेत्र के मतदाता अपने पसंदीदा उम्मीदवार को वोट देते हैं और जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वह विजयी घोषित किया जाता है।

​2. आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation - PR)

सीटों की संख्या: बाकी बची 110 सीटें इस प्रणाली के तहत भरी जाती हैं।

प्रक्रिया: इस प्रणाली में मतदाता किसी उम्मीदवार को नहीं, बल्कि अपनी पसंद की राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं।

सीटों का बंटवारा: पूरे देश में किसी पार्टी को कुल जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, उसी अनुपात में उन्हें संसद में सीटें दी जाती हैं।

​इस प्रणाली के लाभ

समावेशिता: यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि अलग-अलग सामाजिक समूहों और अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व संसद में बना रहे।

विविधता: यह छोटे दलों को भी अपनी वोट हिस्सेदारी के आधार पर संसद में पहुँचने का अवसर देती है।

लोकतांत्रिक संतुलन: इसमें किसी एक दल के लिए पूर्ण बहुमत पाना कठिन हो जाता है, जिससे अक्सर गठबंधन सरकारों का निर्माण होता है।

​वर्तमान के चुनावों में इसी प्रणाली के कारण गणना में समय लग रहा है, जहाँ प्रत्यक्ष सीटों के नतीजे 24 घंटे में आ सकते हैं, वहीं पूरी 275 सीटों की स्थिति स्पष्ट होने में दो से तीन दिन या एक सप्ताह तक का समय लग सकता है।

अंतरराष्ट्रीय नजर: भारत, चीन और अमेरिका की सक्रियता

​नेपाल की रणनीतिक स्थिति के कारण पड़ोसी देशों सहित महाशक्तियों की नजरें इन परिणामों पर हैं।

चीन का रुख: चीन ने अंतरिम पीएम सुशीला कार्की की सरकार के साथ संपर्क बनाए रखा है और हाल ही में 40 लाख डॉलर की सहायता भी दी थी।

अमेरिका का संकेत: अमेरिका ने साफ किया है कि वह नेपाल में बनने वाली किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के साथ काम करने को तैयार है।

भारत की प्राथमिकता: भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा नेपाल में शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया का संपन्न होना है।

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