गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से राहत मिलने की उम्मीद जगी है। 1.2 अरब डॉलर की अगली किस्त जारी करने को लेकर आईएमएफ और पाकिस्तान के बीच स्टाफ-लेवल समझौता हो गया है। हालांकि, इस फंड को जारी करने से पहले आईएमएफ बोर्ड की अंतिम मंजूरी जरूरी है, जिससे यह साफ है कि राहत अभी पूरी तरह तय नहीं हुई है।
दो अलग-अलग सुविधाओं के तहत मिलेगी मदद
आईएमएफ की मिशन प्रमुख इवा पेट्रोवा के अनुसार, यह समझौता दो अलग-अलग व्यवस्थाओं की समीक्षा के बाद हुआ है। इसमें 'एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी' (EFF) की तीसरी समीक्षा के तहत लगभग 1 अरब डॉलर और 'रेजिलिएंस एंड सस्टेनेबिलिटी फैसिलिटी' (RSF) की दूसरी समीक्षा के तहत 210 मिलियन डॉलर दिए जाएंगे।
इस नई किस्त के साथ ही वर्तमान ऋण कार्यक्रम के तहत पाकिस्तान को मिलने वाली कुल राशि बढ़कर 4.5 अरब डॉलर हो जाएगी। इससे पहले दिसंबर 2025 में भी पाकिस्तान को 1.2 अरब डॉलर की सहायता प्रदान की गई थी।
कड़ी शर्तों और सुधारों के बाद मिली मंजूरी
आईएमएफ से इस 'भीख' को हासिल करना पाकिस्तान के लिए आसान नहीं रहा। इसके लिए पाकिस्तान को अपनी अर्थव्यवस्था में कड़े और अक्सर अलोकप्रिय सुधार करने पड़े हैं। इसमें बिजली और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी, टैक्स बेस का विस्तार और सरकारी खर्चों में कटौती शामिल है।
आईएमएफ ने स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान को अपनी वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए बाजार आधारित विनिमय दर और सख्त मौद्रिक नीति जारी रखनी होगी। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में महंगाई दर फरवरी 2026 में 7 फीसदी तक पहुँच गई है, जिससे आम जनता पर बोझ बढ़ा है।
ईरान-इजरायल युद्ध का पाकिस्तान पर असर
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर मौजूदा वैश्विक स्थितियों, विशेष रूप से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का गहरा असर पड़ा है। इस तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं, जिससे पाकिस्तान का आयात बिल और बढ़ गया है।
स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान का अनुमान है कि साल 2026 में महंगाई 5 से 7 फीसदी के बीच रह सकती है। पाकिस्तान वर्तमान में अपना वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है और उसकी जीडीपी ग्रोथ 3.6% रहने का अनुमान है, जो उसकी विशाल जनसंख्या और जरूरतों के मुकाबले काफी कम है।
भविष्य की चुनौतियां और चीन का कर्ज
आईएमएफ की यह मदद अस्थायी राहत तो दे सकती है, लेकिन पाकिस्तान के ऊपर कुल विदेशी कर्ज का पहाड़ अभी भी बरकरार है। उसे केवल चीन और सऊदी अरब जैसे मित्र देशों का ही नहीं, बल्कि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का भी अरबों डॉलर का कर्ज चुकाना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पाकिस्तान अपनी निर्यात क्षमता नहीं बढ़ाता और ऊर्जा क्षेत्र की अक्षमताओं को दूर नहीं करता, तब तक वह कर्ज के इस जाल से बाहर नहीं निकल पाएगा। फिलहाल, शहबाज शरीफ सरकार की पूरी कोशिश आईएमएफ बोर्ड से जल्द से जल्द औपचारिक मंजूरी हासिल करने पर टिकी है।